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सत्ता पs काबिज रहले के बाद भी उपचुनाव हार गय रहे उत्तर प्रदेश क मुख्यमंत्री, पढ़ीं किस्सा

उपचुनाव हारय वाला उत्तर प्रदेश क मुख्यमंत्री, पढ़ीं किस्सा

उपचुनाव हारय वाला उत्तर प्रदेश क मुख्यमंत्री, पढ़ीं किस्सा

त्रिभुवन नारायण सिंह उत्तर प्रदेश के पहिले सीएम रहले, जे कुर्सी पर रहे के बाद भी विधानसभा उपचुनाव हारे रहे. इहे ना ही ब ...अधिक पढ़ें

किस्सा आज के 50 साल पहिले क हौ, जब उत्तर प्रदेश क एक सिटिंग मुख्यमंत्री त्रिभुवन नारायण सिंह विधानसभा उपचुनाव हारि गइलन अउर बिना कवनो बजट पेश कइलय ओन्हय चार महीना में ही कुर्सी छोड़य के पड़ल। देश में एह तरह क दूसर घटना झारखंड में शिबू सोरेन के साथे घटल, जब जनवरी 2009 में सोरेन तमार विधानसभा सीट से उपचुनाव हारि गइलन अउर ओन्हय मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देवय के पड़ल।

गांधीवादी त्रिभुवन नारायण सिंह स्वतंत्रता सेनानी रहलन अउर जवाहरलाल नेहरू क खासमखास रहलन। सन 1057 के लोकसभा चुनाव में उ दिग्गज समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया के चंदौली से हराइ चुकल रहलन। लेकिन बनारस क इ दिग्गज कांग्रेसी नेता जनवरी 1971 में मणिराम विधानसभा सीट के उपचुनाव में एक मामूली पत्रकार रामकृष्ण द्विवेदी से चुनाव हारि गयल। हार भी छोटी-मोटी नाहीं, लगभग दुगुना क अंतर रहल। त्रिभुवन नारायण सिंह के 17,137 वोट मिलल रहल, अउर रामकृष्ण द्विवेदी के हिस्से 33,230 वोट आयल रहल। बनारस क तीन कांग्रेसी नेता मुख्यमंत्री के कुर्सी तक पहुंचलन -सबसे पहिले डॉ. संपूर्णानंद, फिर त्रिभुवन नारायण सिंह अउर ओकरे बाद कमलापति त्रिपाठी। तीनों नेतन के संघे दुर्भाग्य इ रहल कि आपन कार्यकाल पूरा नाहीं कइ पइलन, अउर सबके बीच में ही पद छोड़य के पड़ल। लेकिन तीनों में त्रिभुवन सिंह क दुर्भाग्य सबसे जादा रहल, काहें से कि ओन्हय साढे़ चार महीना में ही कुर्सी छोड़य के पड़ल।

त्रिभुवन नारायण सिंह मुख्यमंत्री भी इत्तेफाक से ही बनल रहलन। सन् 1969 के विधानसभा चुनाव में कुल 425 सीट में से कांग्रेस के 211 सीट पर जीत मिलल रहल। तब 25 फरवरी, 1969 के चंद्रभानु गुप्ता चौथी बार मुख्यमंत्री क शपथ लेहले रहलन। लेकिन एही बीच राष्ट्रपति चुनाव आइ गयल, अउर कांग्रेस क अधिकृत उम्मीदवार नीलम संजीवा रेड्डी चुनाव हारि गइलन। कांग्रेस क बागी उम्मीदवार वी.वी. गिरि चुनाव जीति गइलन। गिरि के इंदिरा गांधी क गुप्त समर्थन रहल। इंदिरा ओह समय प्रधानमंत्री रहलिन अउर एकरे जरिए उ पार्टी में अपने ताकत क अहसास करउलिन। राष्ट्रपति चुनाव के बाद कांग्रेस दुइ फाड़ होइ गइल। के. कामराज के नेतृत्व में इडियन नेशनल कांग्रेस (आर्गनाइजेशन) जवने के पुरानी कांग्रेस अउर सिंडीकेट गुट भी कहल जाय, अउर इंदिरा गांधी के नेतृत्व में इंडियन नेशल कांग्रेस (रिक्विसिशनिस्ट्स), जवने के नई कांग्रेस कहल जाय। कांग्रेस कार्यकारिणी में ओह समय कुल 705 सदस्य रहलन, अउर 446 सदस्य इंदिरा गांधी के संघे चलि गइलन।

कांग्रेस के विभाजन क असर उत्तर प्रदेश सरकार पर भी पड़ल। मुख्यमंत्री चंद्रभानु गुप्ता कामराज गुट में रहि गइलन। कमलापति त्रिपाठी इंदिरा गांधी के संघे चलि गइलन अउर ओनके नेतृत्व में विधायकन क एक गुट सरकार से अलग होइ गयल। चद्रभानु गुप्ता क सरकार गिरि गइल। फिर कमलापति गुट के समर्थन से चौधरी चरण सिंह मुख्यमंत्री बनलन। लेकिन सात महीना में ही कमलापति समर्थन वापस लेइ लेहलन। चरण सिंह क सरकार भी गिरि गइल। राज्य में राष्ट्रपति शासन लगि गयल। एकरे बाद ही 18 अक्टूबर, 1970 के त्रिभुवन नारायण सिंह मुख्यमंत्री पद क शपथ लेहलन। त्रिभुवन कामराज गुट से रहलन अउर जनसंघ सहित कई विपक्षी पार्टीन के समर्थन से ओनकर सरकार बनल रहल। ओह समय त्रिभुवन सिंह राज्य में कवनो सदन क सदस्य नाहीं रहलन। छह महीना के भीतर ओन्हय हरहाल में सदस्यता लेवय के रहल। हिंदू महासभा क नेता अउर गोरक्षनाथ पीठ क महंत अवैद्यनाथ मुख्यमंत्री के मणिराम सीट से उपचुनाव लड़य बदे नेवता देहलन। अवैद्यनाथ गोरखपुर के मणिराम सीट से 1962, 1967 अउर 1969 में लगातार चुनाव जीतल रहलन। लेकिन एही बीच गोरखपुर लोकसभा सीट से उपचुनाव भयल अउर अवैद्यनाथ सांसद बनि गइलन। अब ओन्हय मणिराम सीट छोड़य के पड़ल।

मणिराम सीट एक तरह से अवैद्यनाथ क गढ़ रहल। लेकिन इंदिरा गांधी उपचुनाव में अइसन बिसात बिछउलिन कि गढ़ बालू की नाईं ढहि गयल। मुख्यमंत्री के नाते त्रिभुवन सिंह चुनाव प्रचार करय नाहीं गइलन। ओन्हय भरोसा रहल कि इंदिरा गांधी भी प्रधानमंत्री के नाते चुनाव प्रचार न करिहय। लेकिन इंदिरा अपने उम्मीदवार रामकृष्ण द्विवेदी के पक्ष में प्रचार करय पहुंचि गइलिन। त्रिभुवन सिंह के पूरे विपक्ष क समर्थन रहल। कुल विपक्षी नेता ओनके पक्ष में जाइ के प्रचार कइलन। लेकिन इंदिरा के आगे केहूं क नाहीं चलल, अउर परिणाम आयल त सिंह बुरी तरह चुनाव हारि गइलन। खास बात इ कि जवने दिना चुनाव परिणाम घोषित भयल ओही दिना से विधानसभा क सत्र शुरू होत रहल। राज्यपाल क सदन में अभिभाषण चलत रहल। एही दौरान मुख्यमंत्री के उपचुनाव हारय क खबर आइल। राज्यपाल के अभिभाषण पर धन्यवाद ज्ञापन के समय ही त्रिभुवन नारायण सिंह मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा क घोषणा कइ देहलन। भारतीय राजनीति के इतिहास क अपने आप में इ अनोखी अउर अकेली घटना हौ।

मुख्यमंत्री पद छोड़ले के बाद त्रिभुवन सिंह राजनीतिक अज्ञातवास में चलि गइलन। राजनीति में ओनकर वापसी तब भइल जब केंद्र में जनता पार्टी क सरकार बनल। त्रिभुवन नारायण सिंह के पश्चिम बंगाल क राज्यपाल नियुक्त कयल गयल। जनता पार्टी क सरकार चलि गइल, अउर 1980 में भारी बहुमत के साथ इंदिरा गांधी फिर से सत्ता में लउटलिन। लेकिन इंदिरा गांधी त्रिभुवन सिंह के राज्यपाल पद से नाहीं हटउलिन अउर उ छह नवंबर 1977 से 12 सितंबर, 1981 तक पद पर बनल रहलन। त्रिभुवन सिंह आठ अगस्त, 1904 के बनारस में पैदा भयल रहलन, अउर तीन अगस्त, 1982 के 77 साल के उमर में बनारस में ही प्राण त्यागि देहलन.

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