भोजपुरी व‍िशेष: बर-पीपर के छांह

अइसने संवेदना से भरल-पुरल कलाकार रहलन भिखारी ठाकुर अउर भोजपुरी के शेक्सपियर आ भारतेन्दु.
अइसने संवेदना से भरल-पुरल कलाकार रहलन भिखारी ठाकुर अउर भोजपुरी के शेक्सपियर आ भारतेन्दु.

भोजपुरी में खाली भाषा के मस्ती ना होला. जीवन में भी मस्ती आ ओहू से आगा बढ़िके फक्कड़ई आ कहल जाऊ मलंग नियर जीये के उत्साह मिलत रहेला. इहे कारण ह कि भोजपुरी के साहित्यकार खाली परोपकार के बात ना करेला लो बहुत सारा लोग एके जियले बा. जइसे भारतेंदु जी, महेंदर मिसिर जी अउरी भिखारी ठाकुर.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 30, 2020, 2:09 PM IST
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हवां फेंड़ ना खूंट, उहवां रेंड़ परधान! ई कहाउत रहे ओह जगहा के, जहवां गांछ-बिरिछ के टोटा रहे.  बाकिर भोजपुरी इलाका त बाग-बगइचा से भरल-पुरल रहत रहे.  पहिले हरेक गांव में बर-पीपर के झगांठ-छतनार फेंड़ जरूर होखे,जवना के शीतल छंहरी में राही-बटोही आ गंवई मनई आपन मए हलकानी-परेशानी, दुख-तकलीफ भुला जासु आ बड़ा सुकून महसूस करसु. गांव के जब कवनो बटोर होखे, सभ केहू उहवें जुटे आ चुटकी बजावत मए मर-मोकदिमा उहवें के पंचाइत में फरिया जात रहे.  ओही फेंड़ पर चिरई-चुरुंग आपन खोंता बनावे आ उन्हनीं के चहचहात देखिके मन अजबे उमंग, उछाह, हुलास से भरि जात रहे.

पीपर त रातियो में प्रान-वायु छोड़े आ ओकर पूजो होखे.  ओह फेंड़न के काटल पाप बूझल जात रहे.  बर के अनगिनत बरोह लटकिके धरती में आपन जरि जमा लेत रहे.  लरिकनो के खेले-कूदे के उहवां निमनाह सरंजाम सहजे भेंटा जात रहे.  शीतल छांह में सुस्तात लोग-लुगाई अइसन रसगर बतकही के मोटरी खोलि के बइठि जासु कि सउंसे गांव-जवार के हालचाल, सुख-दुख के समाचार मुफुते मिलि जात रहे.  तमाम चहल-पहल आ हलचल के साखी रहे ऊ बर-पीपर.

ओह बर-पीपर के फेंड़े लेखा समरथ छतनार आ झगांठ होत रहलन किछु मनई, जेकरा के लछिमी जी छप्पर फारिके देले रहली, बाकिर ऊ सुखी-सम्पन्न, धनी-मानी लोग खाली अपने खातिर ना जीयत रहे.



उन्हुकर दिल दरियाव रहे आ दूनों हाथ से उबीछि के लुटावे में उन्हुका आत्मतोष होत रहे.  ओइसन लोग सार्वजनिक जगहन पर फलदार फेंड़ लगवावे, इनार-पोखरा खोनवावे, इनार का लगे माल-मवेशी-पाखी खातिर हउदा बनवाके पानी भरवावे.  चउतरा, गली-सड़क,स्कूल, लाइब्रेरी आउर एह किसिम के ना जाने कतना जनहित के कामन में तन-मन-थन से मदत खातिर अगहर भूमिका निबाहत रहे.  केहू कवनो गरीब के होनहार लरिका के पढ़ावे के जिम्मा लेत रहे, त केहू कवनो अनेरिया, अलचार के गोद लेके परवरिश करत रहे. बाकिर ओइसना लोगन में आत्मप्रचार के कवनो भूख ना रहे.  आंतर में बस इहे मकसद रहे--'परहित सरिस धरम नहिं भाई--!'
आजु ना त ऊ बर-पीपर के झगांठ फेंड़ लउकत बा, ना ओइसन झगांठ शख्सियत वाला मनई.  अब त ओह बर-पीपर आउर फलदार फेंड़न के नेस्तनाबूत क के सीसो, सागौन आ युकलिप्टस के फेंड़न के खेती हो रहल बा जवना से खूब दाम मिलो आ ऊ अदिमी रातो-रात मालदार बनि सके. भलहीं धरती के सत निचोड़ि-गारि के ऊसर-बंजर बना दिहल जाउ, बाकिर ओकर मालिक मालामाल हो जासु आ खुद आउर अपना परिवार खातिर सरग के सीढ़ी लगा लेसु.  कइसन भयावह रावणी सोच बा ई!अइसना लोग के लछिमी जी से कहनाम बा:'दानी घर होती तो कदर तेरी जानी जाती.

आई हौं भले घर, बधाव तूं बजाओ री!
खानन-तहखानन में आइ के बसेरा लेहु,
होहु ना उदास, चित्त चौगुना बढ़ाओ री!
खइहों ना खिअइहों, मरि जइहों तो सिखाइ जइहों,
इहे पूत-नातिन के आपनो सुभाव री!
दमरी ना दैहों एक जानन में भिखारिन को,
सूम कहे सम्पत्ति से बैठी गीत गाओ री!'

नतीजा ई होत बा कि अइसन अरब-खरबपति अपना लोग-लरिकन खातिर सभ किछु छोड़िके खाली हाथ दुनिया से विदा हो जात बाड़न आ अगिली पीढ़ी सभे किछु तहस-नहस क के धऽ देत बिया.  अइसन लोग छोट-मोट जुझनिहारन के मटियामेट करे में अपना धन,बल-बेंवत के इस्तेमाल करत बा. ठीक ओइसहीं, जइसे बरगद का नीचे कवनो छोट-मोट पउधा-झाड़ी पनपे ना पावे. बाकिर पहिले अइसन ना होत रहे. जइसे राणा प्रताप खातिर भामाशाह रहलन, ओइसहीं भोजपुरियो हलका के कई लोग आजादी के लड़ाई लड़ेवालन के दिल-जान से मदतगार रहलन.  पूरबी के पुरोधा महेन्दर मिसिर के जाली नोट छापे के किस्सा त सभ केहू जानेला, बाकिर ओह मार्फत अंगरेजी सल्तनत के अर्थव्यवस्था के नेस्तनाबूत करे के मकसद के जानकारी कमे लोग के होई.

ऊ साफे लिखले रहलन---'हमरा नीको नाहीं लागे राम, गोरन के करनी.

रुपया ले गइले, पइसा ले गइले, ले गइले सभ गिन्नी,
ओकरा बदला में दे गइले ढल्ली के दुअन्नी,
हमरा नीको नाहीं लागे राम ,गोरन के करनी!'

इहे कारन रहे कि मिसिर जी गीत-गवनई के बरियार जलसा करावसु आ परदा का पाछा सेनानी-क्रांतिकारियन के हर मुमकिन मदत करसु. भोजपुरी क्षेत्र से आवेवाला भारतेन्दु हरिश्चन्द्र नवजागरण के अग्रदूत रहलन आ उन्हुकर अतना यादगार अवदान बा कि ऊ जुगे भारतेन्दु जुग के नांव से जानल जाला.  भारतेन्दु के दरियादिली मशहूर रहे आ ऊ अभावग्रस्त साहित्यसाधकन, कलाकारन के हरसंभव सहायता ताजिनिगी करत रहलन.  ऊ अक्सर कहसु-'ई धन हमरा परिवार के खा घललस, अब हम एकरा के खा जाइबि.'

अइसने संवेदना से भरल-पुरल कलाकार रहलन भिखारी ठाकुर.  भोजपुरी के शेक्सपियर आ भारतेन्दु.  शोहरत अइसन कि एक रात के साटा होत रहे एक हजार रुपया के. ओह घरी, जब सोना रहे डेढ़ सौ रुपया भरी.  बाकिर उन्हुकर आपन कुतुबपुर के घर रहे फूस पलानी के.  कवनो कलाकार के बेटी के बियाह के खरचा उठा लेसु, त केहू जरूरतमंद खातिर आपन सभे किछु लुटा देसु आ खुद भिखार हो जासु.  उन्हुकर दिली तमन्नो रहे--'सदा भिखारी रहसु भिखार!' एकदम संत सुभाव.

बाकिर आजुओ इक्के-दुक्के सही, अइसन लोग बा, जे अपना औकात-हद में अपना संगहीं समाजो खातिर जी रहल बा, किछु करि रहल बा आ हारल-थाकल बेबस लोगन के बर-पीपर के छांह दे रहल बा.  हमरा गांव के पांड़े जी एगो अइसने इंसान बानीं.  इहां के रोजी-रोटी का जोगाड़ में कोलकाता में जाके एगो काठगोला में महज साठ रुपया माहवारी के नोकरी धइलीं आ अपना दिन-रात के मेहनत-मशक्कत, प्रतिभा के बदउलत ओह काठगोला के ना खाली मालिक बनि गइनीं, बलुक पच्छिम बंगाल, बिहार, आसाम, उत्तराखंड वगैरह सूबन में लकड़ी के कारोबार के विस्तार करत बस आगे आउर आगे बढ़ते चलि गइनीं.

बाकिर अपना गांव-जवार के कबो ना भुलइनीं आ अनेकानेक नवहिन के नोकरी-चाकरी, तरक्की देत सुदूर गांव में स्कूल, कालेज खोले के दिसाईं प्रयासरत बानीं.  सबसे बड़ बात ई बा कि उहांके अपना गांव-जवार से पहिलहीं नियर नेह-नाता बना के रखले बानीं.

समाज में बर -पीपर के छांह के शीतलता देबेवाला झगांठ व्यक्तित्व ना खाली पूजा होखे के चाहीं, बलुक ओह परिपाटी के आगा बढ़ावे के उतजोग करत समरथी लोगन के अपना आंतर में पइसल आदमियत के सबूत पेश करे के चाहीं.  जब नाव में पानी के बाढ़ आ जाउ आ घर में धन-दउलत के, त सज्जन पुरुष के इहे फर्ज बनेला कि दूनों हाथ से उबीछि के मानवता के बचाईं, रक्षा करीं.  तबे नू जन-मन में बर-पीपर के शीत छांह के एहसास बनल रही.
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