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Bhojpuri: जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन भोजपुरिया रंग में रंगाइल एगो अंगरेज भाषाविज्ञानी

Bhojpuri: जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन भोजपुरिया रंग में रंगाइल एगो अंगरेज भाषाविज्ञानी

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आजु जब देश में आजादी के अमृत महोत्सव मनावल जा रहल बा,त किछु अइसन अंगरेज अफसर सुरता प चढ़त बाड़न,जे अपना काम का अलावा भारतीय लोकसंस्कृति के कुशल पारखी रहलन आ भाषाविज्ञान का हलका में इतिहास रचिके अमर हो गइलन. सन् 1784 में एगो शोध संस्थान के स्थापना कोलकाता में भइल रहे, जवना के नांव रहे 'एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल' आ ओह ऐतिहासिक संस्था के संस्थापक रहलन सर विलियम जोन्स.

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सन् 1868 में दक्खिनी भारत के लोककथा प केन्द्रित किताब ‘ओल्ड डेकन डेज’ शीर्षक से प्रकाशित भइल, जवना के लेखिका अंगरेज महिला मिस फेयर रहली. लोकगीतन के पहिल संकलन मानल जाला ‘फोकसांग्स ऑफ सदर्न इण्डिया’ के,जवन सन् 1871 में छपल रहे आ संपादन कइले रहलन चार्ल्स ई ग्रोवर.एमें दक्खिनी भारत के लोकगीतन के संकलित-संपादित कइल गइल रहे.जवना शख्स के आधुनिक भारतीय भाषाविज्ञान के जनक मानल जाला,उहो अंगरेजेअफसर रहलन जाॅन बीम्स,जेकराके भाषाविज्ञानी का संगहीं भोजपुरी के अनन्य सेवको का रूप में इयाद कइल जाला.जाॅन बीम्स ना खाली ‘भोजपुरी डायलेक्ट ऑफ हिन्दी’ के सिरिजना कइलन,बलुक ‘ऐन कम्परेटिव डिक्शनरी ऑफ द बिहारी लैंग्वेज’ जइसन शोधपरक ग्रंथो लिखलन आ भोजपुरी के ध्वनि पर यादगार काम कइलन.

एही कड़ी के एगो महान शख्सियत रहलन जाॅर्ज अब्राहम ग्रियर्सन,जे चढ़त जवानी में मजिस्ट्रेट बनिके भारत अइलन आ भोजपुरी संस्कृति में अइसन रचि-बसि गइल रहलन कि ताजिनिगी एही संस्कृति में रंगाइल रहि गइलन. इहे कारन रहे कि स्वदेश लवटिओ के उन्हुकर रोज दिन के भोजन चिउरा-दही आ गूर रहे आ भोजपुरी में ऊ धाराप्रवाह बोलत रहलन.देखे-सुनेवाला अचरज में डूबि जात रहे.ग्रियर्सन साहेब ना खाली भाषा सर्वेक्षण कइलन,बलुक भोजपुरी लोकगीत,लोककथा आ लोकगाथा के संग्रहीत करे आ अंगरेजी में अनूदित-व्याख्यायित कऽके इतिहास रचलन.

जॉर्ज ए ग्रियर्सन के जनम 07 जनवरी,1851 का दिने भइल रहे आ नब्बे बरिस के उमिर में 08 मार्च,1941 के उन्हुका एह असार संसार से मुकुती मिलि गइल रहे, बाकिर उन्हुकर भोजपुरी सेवा कबो भुलाइल ना जा सके. भोजपुरी बोलेवालन खातिर ऊ सभसे पहिले ‘भोजपुरिया’ शब्द के इस्तेमाल कइले रहलन आ एगो पांती उद्धृत कइलन-

कस-कस कसगर केना मगहिया,
का भोजपुरिया,का तिरहुतिया!

जवना घरी जॉर्ज ग्रियर्सन पटना के मजिस्ट्रेट रहलन,ऊ उन्हुका शोध आ सिरिजना के सोनहुला समय रहे.डॉ ग्रियर्सन बिहार के सात गो बोलियन आ उपबोलियन के गहिर पड़ताल आउर अध्ययन कइलन आ इन्हनीं के व्याकरण के किताब लिखलन.उन्हुकर लिखल ग्रंथ ‘लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया’ के त अइसन अगहर भूमिका रहल बा कि ओकरा चरचा के बिना भाषाविज्ञान प बाते नइखे कइल जा सकत. ऊ खाली बिहार के बोलियन पर ना,मगहिया डोमन के भाषा प खास अध्ययन कऽके ओकर प्रकाशन करवलन. ‘लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया’ कोलकाता के ‘जर्नल ऑफ़ द राॅयल एशियाटिक सोसाइटी’ में आ ‘जर्नल ऑफ़ एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल’ में छपल.बिहार के रहवैया के जिनिगी, आल्हा, कुंवर विजयमल,गोपीचंद, मानिकचंद वगैरह लोकगाथा-गीतन पर ऊ कबो ना भुलाएवाला लेखन आ प्रकाशन कइलन,जवन ‘बिहार पीजेंट लाइफ’,’द सांग ऑफ आल्हा’,’गीत विजयमल’,’टू वर्सन्स ऑफ गोपीचंद’,’द सांग ऑफ मानिकचंद’ के रूप में चर्चित भइल.

डॉ जॉर्ज ग्रियर्सन के साफ-साफ कहनाम रहे कि भोजपुरी लोकगीतन के आदि रचयिता मेहरारुए लोग रहल होई आ ओही लोग का बदउलत लोकगीत पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगा बढ़त आ रहल बा. अतने ना,नारिए समाज एह गीतन के बचाके जिन्दा रखले बा आ जियतार बनवले बा. ऊ अपना अधीन काम करेवाला भोजपुरी के जानकार लोगन का संगें आरा,छपरा के गांवन में घूमि-घूमिके किसिम-किसिम के लोकधुनन में रचाइल लोकगीतन के देवनागरी लिपि में लिखिके उन्हनीं के अनुवाद अंगरेजी में कइलन आ गीतन के आत्मा में पइसिके विशद व्याख्या कइलन.

‘सम भोजपुरी फोकसांग्स’ शीर्षक से ऊ लेखमाला सन् 1884-85 में पहिले ‘जर्नल ऑफ़ द राॅयल एशियाटिक सोसाइटी’ में आ फेरु पुस्तकाकार प्रकाशित भइल,जवना से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भोजपुरी लोकगीतन के प्रतिष्ठा मिलल आ शोध के दिसाईं संभावना के नया-नया दुआर खुलल.ओह गीतन में बियाह के गीत त रहबे कइलन स, संगें-संगें शोहरत के बुलंदी छूवे वाला लोकधुन सोहर,बिरहा,झूमर,पूरबी,जंतसार,बारहमासा वगैरह में विविधता भरल गीत शामिल रहलन स. कतहीं अपना परदेसी के विरह-वियोग के गीत रहलन स, त कतहीं करुना आ भक्तिभाव से लबरेज़ गीत.

लोकगीत का बाद ओइसने गम्हीर काम ग्रियर्सन साहेब लोककथा आउर लोकगाथा के दिसाईं कइलन आ लोकप्रिय लोकगाथा आउर लोककथा के सहेजे का संगहीं उन्हनीं के विवेचित-विश्लेषित कऽके अंगरेजी में छपववलन.सन् 1884 से लेके 1886 तक डॉ ग्रियर्सन के भोजपुरी विषयक अतना रचनात्मक आ गवेषणात्मक प्रकाशन भइल कि आजुओ देखि-पढ़िके हैरत होला.ओही घरी 1884 में ‘सेवन ग्रामर्स ऑफ द डायलेक्ट्स एण्ड सबडायलेक्ट्स ऑफ द बिहारी लैंग्वेज’ के प्रकाशनो भइल रहे,जवन पांच खंड में आइल रहे.एह व्याकरण के मार्फत बोली से भाषा बनेके दुआर ओही घरी खुलि गइल रहे आ लोकभाषा के व्याकरण के एगो ठोस आउर पुख्ता जमीन भेंटाइल रहे. ग्रियर्सन साहेब आरा,बलिया आ छपरा के बोली के मानक भोजपुरी भाषा बतवले रहलन आ ओकरा बादे भोजपुरी के ‘ए बी सी’ के मान्यता मिलल रहे.फेरु त ई पांती लोकप्रिय हो गइल रहे –

आरा,बलिया, छपरा
भोजपुरी के अंचरा!

डॉ जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन खाली एगो भाषाविज्ञानिए भर ना रहलन.ऊ साहित्य के गहन-गम्हीर अध्येता रहलन आ जवना घरी ऊ पटना में रहलन,कई गो यादगार कृतियन के ऊ समीक्षा सांगोपांग ढंग से कइले रहलन, जवन तब के ‘सर्चलाइट’ अखबार में प्रमुखता से प्रकाशित भइल रहे. भोजपुरी के ओह गहिर अध्येता आ दृष्टिसम्पन्न भाषाविज्ञानी के ऐतिहासिक अवदान के कबो भुलावल ना जा सके.अंगरेज होके भोजपुरी के इतिहास-भूगोल देबेवाला,भाषाविज्ञान के आधार भूंइ ठाढ़ करेवाला, भोजपुरी के ओह नेही-छोही मूर्धन्य रचनाकार का प्रति सरधांजलि!

(भगवती प्रसाद द्विवेदी वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

Tags: Article in Bhojpuri, Bhojpuri News

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