Bhojpuri: देशभर में होता जनसंख्या नियंत्रण कानून के बात, जानीं केतना तेजी से बढ़ल जनसंख्या!

1951 में भारत के आबादी 36.1 करोड़ रहे जवन 2011 में बढ़े के 1.21 अरब हो गइल। सत्तर साल में चौगुना आबादी बढ़ल। आदिमी बढ रहल बा अउर खेत घट रहल बा। अतना मुड़ी के पेट भरे के अनाज कहां से आई ?

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झलक बाबा के बात बनावे में कवनो जोड़ा ना रहे। गंभीर से गंभीर बात भी हंसी मजाक में कह जात रहन। आजो मूड में रहन। कहले, बिहार होखे, यूपी होखे, सगरे देश में एह घरी जनसंख्या नियंत्रण कानूने के बात हो रहल बा। ई चर्चा सुन के हमरा कौलेज के दिन इयाद आ रहल बा। 1970 में एगो सिनेमा आइल रहे ‘यादगार’। मनोज कुमार हीरो रहन। एक फिलिम में एगो गीत रहे- एकतारा बोले तुन तन... कुछ ऐसे लोग भी होते हैं, जो अपनी गलती पर रोते हैं, अपना तो पेट नहीं भरता लेकिन दस दस बच्चे होते हैं, हर साल कलेंडर छाप दिया, परिवार नियोजन साफ किया, तो फिर उसके बाद... फिलिम सुपरिहट रहे।

पब्लिक के सिनेमा तs निमन लागल लेकिन हर साल कलेंडर छापल ना रुकल। कलेंडर छापत छापत आज भारत के आबादी सवा सौ करोड़ के पार हो गइल बा। झलक बाबा के बात सुने के मंडली में बइठल सभे ठठा के हंस देल। गोबरधन गुरु जी हंसी रोक के कहले, झलक बाबा 1970 से ना बलिक एकरो से बहुत पहिले परिवार नियोजन के कोशिश शुरू हो गइले रहे। दुनिया में भारते पहिला देश हs जहां सबसे पहिले परिवार नियोजन के सरकारी पोरगराम लागू कइल गइल रहे।

फैमली प्लानिंग लागू करे वला भारत दुनिया में पहिला देश
कामतानाथ, गोबरधन गुरू जी से पूछले, आच्छा बताईं पहिले गांव-समाज में परिवार नियोजन के केहू बात करत रहे ? जे करे, ओकर के केतना फूहर अदिमी समझल जात रहे ? गोबरधन गुरु जी कहले, एही समझबूझ के चलते तs देश में आबादी के बाढ़ ना रुकल। एकर नतीजा का होई ? केहू ना सोचलस। गोबरधन गुरू जी एकनौमिक्स के बहुत जानकार रहन। ऊ कहले, इंगलैंड के अर्थशास्त्री माल्थस कहले रहन कि जवन हिसाब से आबादी बढ़ी ओकरा अनुपात में संसाधन हरमेसा कम बढ़ी। मतलब जतना आबादी बढ़ी ओह मोतिबाक हवा, जगह, जमीन, अनाज, पानी अउर दोसर सुविधा कम से कम होत जाई। ऊ कहले, हम इकोनोमिक एंड पोलिटिकल विकली ‘इन्गेज’ में पढ़ले रहीं कि कइसे भारत के अर्थशास्त्री गरीबी के संबंध जनसंख्या से जोड़ले रहन। भारत के आजाद होखे के पहिले देश में स्वास्थ्य सुविधा के हालात जाने खातिर सर जोसेफ विलियम भोरे के अगुवाई में कमेटी बनल रहे। भोरे कमेटी कहले रहे कि कुपोषण अउर दोसर स्वास्थ्य समस्या के समाधान खातिर संतुलित भोजन अउर दवा के जरूरत बा लेकिन ओकरो से अधिक जरूरी बा परिवार के सीमित राखल। एह कमेटी के सलाह के धेयान में राख के 1952 में पहिला बेर भारत में परिवार नियोजन के सरकारी कार्जक्रम शुरू कइल गइल। ओह घरी दुनिया के कवनो देश में फैमली प्लानिंग के बेबस्था लागू ना रहे।

नेहरू के जमाना में बर्थ कंट्रोल के पहिला विज्ञापन
झलक बाबा के फेन मजाक सूझल। कहले, हमनी के जमाना में तs देवाल पs बड़का-बड़का बिज्ञापन पेंट कइल रहत रहे जवना में पुरुष परिवार नियोजन के उपाय बतावल रहत रहे। गोबरधन गुरू जी कहले, ई बिज्ञापन भी बहुत पहिले शुरू हो गइल रहे। लेकिन ओह गरी पढ़ल लिखल लोग के धेयान में रख के पहिले अंगरेजी में छापल गइल रहे। नेहरू जी के जमाना में पहिला बेर 1962 में पुरुष परिवार नियोजन के बिज्ञापन छपल रहे। नेहरू सरकार दू बच्चा के जनम में अंतर राखे के खतिर अउर बर्थ कंट्रोल खातिर ई बिज्ञापन तइयार करवले रहे। लेकिन जागरुकता के कमी के चलते एह अभियान के कामयाबी ना मिलल। लोग एह बिषय में बात कइल भी खराब समझत रहन। सरकार बहुत कोशिश कइलस कि लोग अपना मर्जी से परिवर के छोटा राखस। पहलि तs कहात रहे कि दो या तीन बच्चे, होते हैं अच्छे। लेकिन एकरा बादो आबादी के रफ्तार ना रुकल। जब 1975 में संजय गांधी जबरिया नसबंदी करावे खातिर अत्याचार कइले तs ओकर नतीजा कंगरेस के 1977 में भोगे के पड़ल।

1967 में महाराष्ट्र अउर केरल में जनसंख्या बिस्फोट के बिरोध
कामतानाथ पूछले, इंदिरा जी के जमाना में राज्य के मुखमंतरी लोग जनसंख्या नियंत्रण के बारे में का सोचत रहन ? गोबरधन गुरु जी जबाब देले, 1967 में महाराष्ट्र सरकार प्रस्ताव पेश कइले रहे कि जेकरा तीन से अधिक संतान बा ओकरा फ्री में इलाज के सरकारी सुविधा ना दिहल जाई। एकरा अलावा तीन से अधिक संतान वला सरकारी कर्मचारी के मातृत्व लाभ पs रोक लगावे के बात भइल। केरल जइसन पढ़ लिखल राज्य भी तीन से अधिक संतान वला सरकारी कर्मचारी के मैटरनिटी लिव (मातृत्व अवकाश) देवे से इंकार कर देले रहे। मैसूर राज्य (करनाटक) में भी इहे बेबस्था लागू कइल रहे। पहिले करनाटर प्रांत के मैसूर राज्य कहल जात रहे। 1973 में मैसूर राज्य के करनाटक नांव दिहल गइल रहे। जब जनसंख्या के हिसाब से सुविधा कम होखे लागत तs अपना-अपना तरफ से राज्य सरकार फैसला लेबे खातिर मजबूर हो गइल। शुरू में ई बिषय पाटी-पोलटिक्स के मुद्दा ना रहे। लेकिन बाद में राजनीतिक कारण से ई कड़ाई लागू ना रहल। अब तs जनसंख्या नियंत्रण के विषय राजनीतिक बाद-बिबाद के अउर बड़का मुद्दा बन गइल बा। (अशोक कुमार शर्मा वरिष्ठ स्तंभकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

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