Bhojpuri Special: रऊआ एह भोजपुरिया मिठाइन के चीखले बानीं...

बलिया से पूरब चलबि त करीब पच्चीस किलोमीटर एगो गांव बा रामगढ़. रामगढ़ के टिकरी आताना मसहूर बा कि बलिया के का कहीं, आसपास के जिला चाहे बिहार के आरा, बक्सर, छपरा भा सीवान होखे, चाहे उत्तर प्रदेश के गाजीपुर, मऊ, कुशीनगर आदि,रामगढ़ के टिकरी के फरमाइश जरूर कइल जात रहल हा.

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जब आजु-काल्हु नियर प्रिजर्वेटिव ना रहे, तबो हमनी के समाज में खाए-पीए वाला अइसन-अइसन-अइसन आइटम बनत रहे, जवन कई दिनन तकले खराबे ना होखत रहे. मिठाई-नमकीन के देसी आइटम एही कैटेगरी में रहे. अइसन-अइसन कारीगर रहले, जवन बिना कवनो रसायन डलले अइसन मिठाई-नमकीन बनावत रहले, जवना कई दिन तक ना सिर्फ स्वादिष्ट रहत रहे, बल्कि खराबो ना होत रहे. आजु त गांवे-गांवे फ्रिज पहुंचि गइल बा. एह फ्रिजो के एगो सीमा बा, अगर देरी ले बिजली ना रहल, ओह में राखल खाए-पिए वाला आइटम महकि उठि.

ओइसे त अइसन आइटम समूचा भारते में मिली. एकर वजह ई बा कि भारतीय समाज हजारन साल से खेती-किसानी वाला समाज रहल हा. हालांकि भोजपुरी इलाका में मिले वाला कुछु आइटम के देखबि त रऊंआ कहि सकेनीं कि भोजपुरिया मनई अपाना कारीगरी में कुछु ज्यादे ही कमाल कइले बाड़े. खाली बलिया जिले के ही देखीं. बलिया जिला मुख्यालय से लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी के गांवे जाए वाली सड़क के बान्ह कहल जाला. ओइसे ई बान्हे ह. एह सड़क के दखिन से कुछुए दूरी से गंगा माई भरि बरसात हाहारात बहेली त गरमी में आस्ते-आस्ते. बारिश के दिन में उनुकर बिकराल रूप से लोगन के बनावे खातिर ई बान्ह बनल रहे. अब एह बान्हो के के दखिन रिंग बांधा बनि गइल बा.

बहरहाल एह बान्ह पर जब बलिया से पूरब चलबि त करीब पच्चीस किलोमीटर एगो गांव बा रामगढ़ बा. रामगढ़ के टिकरी आताना मसहूर बा कि बलिया के का कहीं, आसपास के जिला चाहे बिहार के आरा, बक्सर, छपरा भा सीवान होखे, चाहे उत्तर प्रदेश के गाजीपुर, मऊ, कुशीनगर आदि, इहवां के लोग जब बलिया से पूरूब बैरिया साइड में जाई त ओकरा से रामगढ़ के टिकरी के फरमाइश जरूर कइल जात रहल हा. रामगढ़ में बंसरोपन हलुवाई के दोकानि के टिकरी मसहूर बिया. मैदा के बनल एह मिठाई के ई खासियत ह, कि ओकरा अंदर रसाई भरल रहेला. जे रामगढ़ के बंसरोपन के टिकरी के खासियत ना जानी त समझीं कि ओकर कपड़ा खराबे होखे बा. पहिलका काटा कटनीं आ सावधान ना रहनीं त समझिं की टिकरी के अंदर के रसाई कपड़ा पर गिरहीं के बा.

रामगढ़ से करीब दस-बारह किलोमीटर दक्षिण पूरब में एगो गांव बा मुरारपट्टी. मुरारपट्टी के चट्टी पर गइनीं आ उहां के मदनघचाक ना खइनीं त आजुकाल्हु रऊंआ के लोग अइसे मानीं, जइसे रऊंआ कुछु महत्वपूर्ण चीजु से वंचित रहि गइनीं. मदनघचाक दरअसल रसगुल्ला के ही एगो रूप ह, जवन मुरारपट्टी के हलुवाई लोग इजाद कइले बा. ओकर साइज बाकि जगह के रसगुल्ला ले बड़ होला. बलिया से छपरा जाए वाली रेल लाइन के किनारे पूरूब में अठारह किलोमीटर पर सहतवार कस्बा बा. इहवां के रामरतन के गजरा के हलुआ आ खस्ता टिकरी के शोहरत भारत छोड़िं, विदेश ले बा. रामरतन के खानदान के लोगन के बंटवारा हो गइल बा. सहतवार में जाइबि त रऊंआ सामने रामरतन के नाम से मिठाई के कइ गो दोकानि लउकिहें स. लेकिन घबराईं मति, सबका किहां एगो प्रोटोकाल समान मिली. सबके इहां खालिस देसी घीवे में बनल मिठाई मिलिहें.

सहतवार में एगो सिद्ध पुरूष चैनराम बाबा के समाधि बा. पंडित परशुराम चतुर्वेदी एगो किताबि लिखले बाड़े. गहरा शोध के बाद लिखल एह किताब ‘उत्तर भारत की संत परंपरा’ के प्रेरणा पुरूष शांतिनिकेतन के प्रोफेसर आचार्य क्षितिमोहन सेन रहले. जे क्षितिमोहन सेन के ना जानत होई, ओकरा के बता दीं कि ऊ भारत के नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के नाना रहले आ भारतीय संस्कृति के गहरा जानकार. परशुराम चतुर्वेदी जी के एह किताब में चैनराम बाबा के विस्तार से वर्णन बा. उनुका समाधि के सिद्ध के दर्जा हासिल बा. उहां रोजाना सिर्फ रामरतन के ही दोकानि के मिठाई चढ़ेला. ओह मिठाई के दोकानि के टिकरी एकदम खास्ता होला, जइसे हमनीं के घरी बहरवासूं लोगन खातिर खस्ता बनेला. जे खइले बा, उहे ओकर कुरकुरापन के जानीं.

एही तरी रामरतन के दोकानि के गाजारा के हलुआ अलगे होला. ओकर सोन्हापन जीभि के मोहि लेला. सहतवार से दू किलोमीटर दखिन वाला गांव खानपुर के निवासी रहले कांग्रेस नेता बाचा पाठक. बाचा पाठक के खासियत ई बा कि जब 1977 में जनता पार्टी के लहरि चललि, ओहू घरी जनता पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर के संसदीय क्षेत्र बलिया के अंदर के बांसडीह विधानसभा सीट जीति लेले रहले. बाकि चारो सीट पर जनता पार्टी के कब्जा रहे. एह वजह से ऊ इंदिरा गांधी के नजरि में चढ़ि गइल रहले. ऊ जब दिल्ली जासु, अगर जाड़ के दिन रहे त रामरतन के गाजर के हलुआ जरूर लेके जात रहले. भोजपुरिया इलाका के मसहूर जगहि बा बक्सर. बक्सर जाए वाला आदमी अगर उहां के सोनपापड़ी ना खइलसि त समझिं कि ओकर जीवन बेकार हो गइल. बक्सर के सोनपापड़ी अइसन ना होला, जइसन आजु-काल्हु नामी-गिरामी ब्रांड वाला निर्माता बनावतारे, जवना के हर साल दीवाली में बड़का शहरन के लोग मजाक उड़ावे ला. बक्सर के सोनपापड़ी सोन्ह आ घीव से भरल होले.

अभी तक पूरा देश उरिद के दालि के बनल दही भल्ला खाला. भोजपुरिया लोग ओके दही भल्ला ना फुलवरा कहेला. तीज-त्योहार के अलावा मरन-जीयन के भाई भोज के ई महत्वपूर्ण आइटम ह. बाकिर गाजीपुर के सैदपुर से छेना के दही भल्ला के अइसन खोज भइल कि लोगन के जीभ ओकर दीवाना हो गइल. बनारस से गाजीपुर जात खानी मेन सड़कि पर अगर सैदपुर शहर से पहिले कहीं भीड़ देखिं त समझिं कि छेना के दही-भल्ला के दोकानि आ गइल. अब त बलिया शहरियों में कई गो दोकानि एह के बनावतारी स आ खासकर गरमी के दिन में लोग खूबे घूमि-घूमि के खा ता. ई आइटम दरअसल रसगुल्ले ह, अंतर एतने बा कि ऊ दही में डुबावल जाला, जवना में चीनी-नून आ भूंजल जीरा के पाउडर होला. ओइसे त सांझि होते, भोजपुरिया इलाका में कवनो अइसन चट्टी-चौराहा ना होई, जहां सिंघाड़ा, कचरी, जिलेबी ना बनति होई आ लोग ओकरा के खाए खातिर मचलत ना होइहें. गांवा-गाईं खोजबि त भोजपुरिया इलाका में अइसन ढेरे आइटम मिलिहें, जेकर आपन खासियत बा, स्वाद बा आ ना जल्दी खराब होखे वाला क्वालिटी बा. (लेखक उमेश चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार हैं. और ये उनके निजी विचार हैं.)

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