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Bhojpuri: राजनीति छूटल त सांस भी टूटि गइल, पुण्यतिथि पर पढ़ीं हेमवती नंदन बहुगुणा क कहानी

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हेमवती नंदन बहुगुणा भारतीय राजनीति क एक अइसन किरदार रहलन, जेकरे रग रग में राजनीति भरल रहल. उ 24 घंटा वाला राजनेता रहलन. न राजनीति ओन्हय चैन लेवय देय, न उ राजनीति के चैन लेवय देयं. राजनीति अउर बहुगुणा एक-दूसरे क पर्याय रहलन. दिवंगत कांग्रेसी नेता चंद्रभानु गुप्ता ओन्हय राजनीति क नटवरलाल कहयं. जब राजनीति बहुगुणा क साथ छोड़लस तब उ भी ओकर साथ छोड़ि के जिनगी से विदा लेइ लेहलन.

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हेमवती नंदन 1971 के चुनाव में पहिली दइयां सांसद बनल रहलन. एकरे पहिले उ उत्तर प्रदेश विधानसभा में रहलन, मंत्री भी रहि चुकल रहलन. संसदी के चुनाव में कांग्रेस के जीतावय में बड़ी मेहनत कइले रहलन. ओन्हय उम्मीद रहल कि इंदिरा गांधी कैबिनेट में कवनो बढ़ियां मंत्री बनइहयं. लेकिन इंदिरा अइसन गुड़ नाहीं रहलिन जवने के बहुगुणा जइसन चिउटा असानी से खाइ लेयं. इंदिरा बहुगुणा के संचार विभाग में राज्यमंत्री बनाइ देहलिन. बहुगुणा मुंह फुलाइ लेहलन. पंद्रह दिन तक कोप भवन में रहलन, चार्जय नाहीं लेहलन. अंत में इंदिरा स्वतंत्र प्रभार देहलिन, तब जाइ के मुंह सोझ भयल. मतलब बहुगुणा जेतना चतुर रहलन, ओतनय ओनके भीतर धीरज क कमी रहल. एकरे नाते कई दइयां ओनकर बड़ा नुकसान भयल.

उत्तर प्रदेश में पीएसी विद्रोह के बाद मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी के इस्तीफा देवय के पड़ल. मुख्यमंत्री बदे नए आदमी क तलाश रहल. बहुगुणा अपने काम के बल पर तबतक इंदिरा क विश्वासपात्र बनि गयल रहलन. इंदिरा बहुगुणा के मुख्यमंत्री बनाइ के लखनऊ भेजि देहलिन. आठ नवंबर, 1973 के बहुगुणा शपथ लेहलन. इंदिरा के उम्मीद रहल कि बहुगुणा ओनके मर्जी से काम करिहय. लेकिन बहुगुणा दूसरे मट्टी क रहलन. ओन्हय खुलल मैदान चाहत रहल, मौका मिलल रहल त पूरा फायदा उठावल चाहत रहलन. इंदिरा क भृगुटी चढ़ि गइल, 29 नवंबर, 1975 के बहुगुणा से इस्तीफा लेइ लेहलिन. बहुगुणा क धीरज फिर टूटल अउर पार्टी छोड़ि देहलन. जगजीवन राम के साथे मिलि के नई पार्टी कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी बनलन. 1977 क चुनाव एही पार्टी से लड़लन, अउर जीतलन भी. लेकिन 1980 के मध्यावधि चुनाव से पहिले उ फिर कांग्रेस में शामिल होइ गइलन. कांग्रेस बदे चुनाव में जमि के मेहनत कइलन अउर अपुना गढ़वाल से जीति के संसद पहुंचलन. कांग्रेस क सरकार बनल, लेकिन इंदिरा फिर बहुगुणा के किनारे कइ देहलिन. बहुगुणा पर शायद ओन्हय भरोसा नाहीं रहि गयल रहल. बहुगुणा क धीरज जवाब देइ देहलस अउर छह महीना के भीतर ही उ कांग्रेस क डंडा डांकि गइलन. लोकसभा क सदस्यता भी छोड़ि देहलन. सन् 1982 में ओही सीट से उपचुनाव जीति के फिर संसद पहुंचलन.

एही दौरान 31 अक्टूबर, 1984 के इंदिरा गांधी क हत्या होइ गइल. राजीव गांधी परधानमंत्री बनलन. ओही साल बाद में आम चुनाव भी भयल. बहुगुणा क हरकत राजीव के याद रहल. नराज रहले के बाद भी जवन काम बहुगुणा के साथे इंदिरा नाहीं कइ पइलिन, उ राजीव करय क ठानि लेहलन. बहुगुणा लोकदल से इलाहाबाद से खड़ा भइलन. राजीव ओनकरे सामने फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन के मैदान में उतारि देहलन. बहुगुणा क राजनीतिक कद बहुत ऊंचा रहल, लेकिन ओह जमाने में फिलिम वालन क भी राजनीति में बहुत क्रेज रहल. फिलमी सितारन के देखि के जनता दीवानी होइ जाय. बहुगुणा चुनाव में चांपि के मेहनत कइलन. फिर भी अमिताभ ओन्हय एक लाख सत्तासी हजार वोट से हराइ देहलन. इ हार बहुगुणा बदे बहुत बड़ा सदमा रहल. एक तरह से ओनकर राजनीतिक हत्या होइ गइल रहल. एकरे बाद उ राजनीति छोड़ि देहलन. तीन साल बाद अमिताभ भी लोकसभा क सदस्यता इ कहि के छोड़ि देहलन कि राजनीति ओनकरे बस क बात नाहीं हौ. एही दौरान बहुगुणा बीमार पड़लन. एक दइया बाईपास सर्जरी होइ चुकल रहल. डॉक्टर लोग कहलन कि राजनीति छोड़ि देयं त दुबारा सर्जरी क जरूरत नाहीं हौ. लेकिन बहुगुणा के त खून में राजनीति रहल. उ डॉक्टरन से कहलन -’’बहुगुणा समोसा खाने और मजा लेने के लिए पैदा नहीं हुआ है. ऑपरेशन तो कराऊंगा.’’ आपरेशन भयल, लेकिन सफल नाहीं भयल. राजनीति क चाणक्य 17 मार्च, 1989 के राजनीति के बाद जिनिगी भी छोड़ि के हमेशा बदे चलि गयल. हेमवती नंदन बहुगुणा क जनम जलियांवाला बाग नरसंहार के 12 दिना बाद 25 अप्रैल, 1919 के पौड़ी गढ़वाल के बुधाणी गांव में भयल रहल.

(सरोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

Tags: Article in Bhojpuri, Bhojpuri, Bhojpuri News

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