Bhojpuri: नवका साल सम्मत के सिरीगनेस, पढ़ीं चैत्र नवरात्रि के महत्तम!

नवरातन, जवन 13 अप्रैल से 21अप्रैल ले चली. एह में दुरुगा के नव रूप-सैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्माण्डा, स्कंदमाता,कात्यायनी, कालरात्रि ,महागौरी आउर माई सिद्धिदात्री के सांच मन से उपासना के प्रावधान बा.बाकिर पंडित लोग के कहनाम बा कि माता एह साल घोड़ा प चढ़िके आवत बानीं. एह से महामारी के प्रकोप बढ़ी आ कई किसिम के प्रतिकूलता से मुकबिला करेके परी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 12, 2021, 6:55 PM IST
  • Share this:
नवका साल सम्मत के सिरीगनेस हो चुकल बा. नवरातन के माई दुरुगा के उपासना का जरिए अपना आंतर में शक्ति संचय करेके आ मनसा-वाचा-कर्मणा भरपूर ताकत से जिनिगी के समर में कूदे के संकलप के नांव ह नवरातन, जवन 13 अप्रैल से 21अप्रैल ले चली. एह में दुरुगा के नव रूप-सैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्माण्डा, स्कंदमाता,कात्यायनी, कालरात्रि ,महागौरी आउर माई सिद्धिदात्री के सांच मन से उपासना के प्रावधान बा.बाकिर पंडित लोग के कहनाम बा कि माता एह साल घोड़ा प चढ़िके आवत बानीं. एह से महामारी के प्रकोप बढ़ी आ कई किसिम के प्रतिकूलता से मुकबिला करेके परी. नतीजा सोझा साफे झलकत बा. कोरोना के दोसरकी लहर अउर भयावह होके सुरसा-अस मुंह बवले ठाढ़ बिया.

बाकिर अइसने समय में गीता के गूढ़ सनेस आ आदिकाल से चलल आवत लोक-संस्कार गीतन के परिपाटी कठिन-से-कठिन समइयो के सामना करेके पेरना देला. 'डर का आगा जीत बा' के नसीहत जूझे के अइसन हूब देला कि मनई आखिरी सांस ले मनुजता के हिफाज़त खातिर जान-परान लगा देला. जब जइसन तब तइसन,ना करे त मरद कइसन!

श्रीमद्भगवद्गीता चूंकि करतब देखावे आ जूझे के शक्ति देला, एह से एकरा के भारतीय संस्कृति के अनमोल धरोहर मानल जाला. एमें जिनिगी जीए के कला आ जिनिगी जीए के विज्ञान के बेजोड़ समन्वय बा. धरम उहे जवन धारन करे. सभसे बड़हन धरम होला-करम का ओर जीव-जान से प्रवृत्त भइल. एही से कर्म के सभकरा से बढ़िके पूजा आ अपना हाथ के जगरनाथ मानल गइल बा. गीता में एही कर्म के प्रधानता बा. अर्जुन जब कर्तव्य पथ से विचलित होके ऊहापोह आ आजुएकाल्ह नियर अवसाद-उदासी में किछऊ निरनय ना ले पावत रहलन,त लीलापुरुषोत्तम सिरीकिसुन उन्हुका के करमपथ प लवटावे का गरज से ज्ञान के उपदेश देले रहलन, जवन मौजूदा माहौल में कहीं ज्यादा प्रासंगिक बा.

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के साफ-साफ समुझावत कहले रहलन-'कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन.' आजु के भूमंडलीकरण-बाजारवाद के दौर में जब अदिमी अपना राह से भटकिके तमाम बुराइयन में लिप्त हो गइल बा आ कवनो हथकंडा अपना के ढेर-से-ढेर दौलत हथिआवल जिनिगी के मकसद बनि गइल बा, गीता के करमयोग के उपादेयता अउर बढ़ि जात बा.विलासिता आ अहं के मद में चूर मनई मनुजता भुला गइल बा आ अपसंस्कृति के शिकार होके राकसो से गइल-गुजरल हरकत करे पर उतारू बा.ई निर्विवाद सांच बा कि हरेक अदिमी के भीतर इंसान आ शैतान -दूनों मौजूद रहेला.
जब ऊ मानवता का खिलाफ कवनो काम करेला, त इंसान से हैवान बनि जाला आ ऊहे अदिमी जब अच्छाई के राह पर चलत सत्कर्मन के आपन जिनिगी बना लेला, त ऊ सही माने में इंसान आ देवता बनि जाला. हमनीं के संस्कृति आदिकाल से ई सनेस देत आइल बिया कि जब परिवार के हरेक अदिमी संस्कारवान, शिष्ट आ मर्यादित होई,त बेहतर समाज के निरमान संभव हो पाई.सांच कहल जाउ,त शक्ति संचय करेके नवरातन आ गीता के सनेस सही माने में इंसानियत के सनेस ह, मर्यादित समाज आ मर्यादित आचरण के सनेस ह, निरासा-हतासा के कुहासा के फारिके हुलास-उछाह आउर जीवंतता से जीए के सनेस ह अउर सनेस ह जिनिगी से जूझे आ निष्काम भाव से आपन करतब करत धरम निबाहत जाए के.

भोजपुरी लोकगीत भोजपुरिया समाज के ऐनक ह,जवना में मेहनतकश मनई के सुख-दु:ख,हंसी-खुशी आ जीवटता के जियतार चित्र पीढ़ी दर पीढ़ी उकेरात आइल बा.एह गीतन में जगह-जगह परदुखकातरता, लोकमंगल आ मानवीयता के सनेस सलीका से गूंथल गइल बा.'मनु-स्मृति' में वर्ण-बेवस्था के चरचा करत साफ-साफ कहल गइल बा-'जन्मना जायते शूद्र:, संस्कारात द्विज उच्यते'-माने, मनई जनम से शूद्र आ संस्कार से द्विज होला. सुसंस्कृत ऊ ह,जे सुसंस्कार में पलाइल-पोसाइल होखे आ ब्राह्मन ऊ ह,जे ब्रह्म के ज्ञाता होखे. अगर ई कहल जाउ कि संस्कारे कवनो अदिमी के ब्रह्मज्ञानी बनावेला,त अतिशयोक्ति ना होई.एही से मनई के ताजिनिगी सुखी,सेहतमंद ,समरस आ समन्वयी होखे खातिर संस्कारन के विधान कइल गइल रहे. जनम से मउवत ले सोरह गो संस्कार के मान्यता प्रचलित बा,जिन्हनीं से जुड़ल एक से बढ़िके एक संस्कार गीत गवात आइल बाड़न स.

हरेक मंगल के मोका प सभसे पहिले जवन गीत भगवान शिव के गोहरावत गावल जाला, ओमें लोक कल्याण के भाव छिपल बा. सर्वहारा के देवता भोले बाबा आ गाय के गोबर से लिपाइल घर-अंगना के कीटरोधी पावनता!



गाई का गोबरे महादेव आंगन लिपाई

गज-मोतिया ए महादेव चउक पुराई

सुनीं हे शिव, शिव के दोहाई!

देवीगीत में मातादाई के गीत सभसे अधिका गवाला, जवना में निमिया के डाढ़ प झुलुहा झूलत दैवी शक्ति के प्रतीक मातादाई बेबस-अलचार लोक के मंगल के कामना करेली. कहल जाला कि जवना घरी चेचक महामारी के रूप में फइलल-पसरल रहे, ओह घरी ओकर कवनो उपचार ना रहे आ इहे 'निमिया के डाढ़ मइया लावेली हिंड़ोलवा कि झूली-झूली' वाला गीत जनमानस में आस्था-आस के संचार करत रहे. ओमें गोहरावल जात रहे कि 'जवन असिसिया मइया मालिन के दिहनीं कि ओइसन, मोर बलकवन के दीं,मइया ओइसन!' आ 'जाकी रही भावना जैसी ' के हिसाब से आस्थावान मानवता के फलाफलो मिलत रहे.

गीता में बतावल गइल बा कि जे जइसन करम करेला, ऊ ओइसने फल भोगेला. कहे के मतलब ई कि कुदरत के कचहरी में कबो नाइंसाफ़ी ना होला. एगो लोकगीतो में कहल गइल बा-

दीनानाथ कचहरिया में न्याय होला

केहू अपने के कइसन नबाब होला

रत्ती-रत्ती के उनसे हिसाब होला

नाहीं एको पल अन्याय होला

दीनानाथ कचहरिया में न्याय होला.

भोजपुरिया समाज मेहनतकशन आ किसान-मजूरन के जांगर ठेठावेवाला समाज रहल बा.एह से इहां निष्काम करमयोग के प्रधानता रहल बा आ अभावो में रहिके बिपत-कलेस काटत नेह-छोह आ प्रीत-प्यार के पइसार इहां के खासियत होला. इहे नेह आ मनुजता के सनेस हरदम गूंजत रहेला-

जांगर ठेठावते जिनिगिया सिरइली

सुनऽ मोरी मुनरी,

सोना नियर अनजा लुटाइ जाला

हमके मोहाल लेतरी.

हमरा के चाहीं ना सरग-सुख

नाहीं चाहीं इनरपरी,

तोहरे पिरितिया के छंहियां

बइठिके जुड़ाली ठटरी.

जब ले नेह-छोह से लबरेज़ ई गीत गूंजत रहिहन स,गीता के सनेस इन्हनीं के जरिए जनमानस में अपने आप पहुंचत रही आ महामारी से लड़े खातिर भरि नवरातन माई के नवो रूप से अकूत शक्ति आ बल-बेंवत

के असीस भेंटात रही-

या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता,

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमोनम:.

(लेखक भगवती प्रसाद द्विवेदी वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज