Bhojpuri: जवन मजा फगुआ में मिली तवन कवनो त्योहार में ना, पढ़ीं भोजपुरी होली के अंदाज

फगुआ आ होली में एगो बड़ फरक त ईहे लागेला कि होली में लोग अंगुरी से लिलार प टीका लागावेला - आ फगुआ में मुठी में अबीर भरि के एंड़ी से कापार तक झोंकि देला. खांटी भोजपुरी आ देहाती इलाकन में रङ सबेरे से दुपहरिया तक के चीजु ह - आ अबीर सांझी खा के. एक बार सुरू हो जाइ त चाहे जब ले मन हो चल रहो.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 26, 2021, 5:13 PM IST
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होली त गांव गिरांव से लेके, पूरा देस आ दुनिया खेलेले - बाकिर जवन मजा फगुआ में आवेला ऊ काहां मिली. रङ आ अबीर खेले के भी अलग नीयम होला. छोट-बड़ के गोड़ लागे से ले के बाराबरी में गले मिलला तक. ननदि-भउजाई के नोंक झोक के त ई हालि हो जाला कि कहल जाला – ‘फागुन में बुढ़वा देवर लागेला...’ जाहंवा भी भोजपुरी बोलल जाला ओह इलाकन में अइसहीं होली आ फगुआ में फरक महसूस होला.

फगुआ आ होली में एगो बड़ फरक त ईहे लागेला कि होली में लोग अंगुरी से लिलार प टीका लागावेला - आ फगुआ में मुठी में अबीर भरि के एंड़ी से कापार तक झोंकि देला. होली में रङ आ अबीर में कवनो फरक ना बुझाला, बाकिर फगुआ में रङ के बेरा आलगा होखेला आ अबीर के आलगा.

खांटी भोजपुरी आ देहाती इलाकन में रङ सबेरे से दुपहरिया तक के चीजु ह - आ अबीर सांझी खा के. एक बार सुरू हो जाइ त चाहे जब ले मन हो चल रहो.

बचपन में फिचुकारी से, आ बड़ भइला प बाल्टी भरि भरि के जीभरि के रङ खेलाला के बाद मलि मलि के छोड़ावे में जवन माजा आवेला ओकर बाते आलगा होला. ओकारा बाद नाया नाया कापड़ा पहिनि के अबीर खेले निकलल जाला.
रङ खेलला के मतलब होखेला फुल-मस्ती आ अबीर लागावे में अदब आ अनुसासन बहुते जरूरी होला. अबीर लागावे के भी तरीका सभे के आलागा बनल बा. ईहो कहल जा सकेला कि बनावल बाटे.

जे बड़ बा ऊ छोट के दुलार से अबीर लागावेला आ छोह देखा के आसीरबाद देला, बाकिर छोट जब आपाना से बड़ के अबीर लागावेला त गोड़े पर अबीर रखि के छू लेला. फेरू बड़ ओकारा के उठा के गले लागावेला आ ढेर छोट होला त गोदिये में उठा लेला.

ई कुल्हि बारीक फरक होला सहरी आ देहाती होली के पाराम्पारा में. सहरी होली त फाटाफट एके साथे रङ आ गुलाल लागा खेलि लीहल जाला. बुझइबे ना करे कि के रङ लगवले बा आ के अबीर? ईहो समझल मुस्किल हो जाला कि काहें के एके साथे रङ आ अबीर लागावल जाता. सायेद एही से कई जगह से होली खाली अबीरे से खेलि के खतम क दीहल जाता. रङ आ अबीर त पुरानका जामाना में भी फूले-पाता से बनत रहल हा, आ फेरू से अब हरबल-अबीर बाजार में आ गईल बा. बीच में सब केमिकल भरल रहल रहत हा, बाकिर आछा बात ईहे बा कि फेरू से आदमी कुदरत के करीब लौटे लागल बा.



ननदि भउजाई के होली-दिवाली त आङना से ले के रसोई ले रोजे लागल रहेला, बाकिर देवर के त भउजाई के साथे फगुआ खेले के बरिस दिन के दिन में एके बेरि मिलेला. एकर क्रेज ओ घरि अउरी जादा रहेला जब घरे में कवनो नाया दुलहिन आइल रहेले. जब हमहूं ससुराल गईनी त सुननी कि टोला माहाला के देवर लोग रङ अबीर खेले आई. सुनि के बाड़ा अजीब लागल कि जान ना पाहचान आ लोग फगुआ खेले खातिर आ जाई. हम थोड़ा सोच में पड़ल रहनी तले एगो हामार चचियासासु बुझि गइली. काहें कि जइसहीं हामार ननदि कहि के गइली, चाचीजी हामार उलझन चेहरे से पढ़ि ले ली. फेरू ऊ आपन कीसा सुनवली. बतवली कि जब बिआह के बाद ससुराल पहुंचली त दुइए-तीन दिन बाद फगुआ पड़ि गइल. ओ दिन सबेरहिं बगल के एगो लइका आङन में आके पूछलसि कि हामार भउजाई काहां बाड़ी. आङने में से केहू बाता दीहल कि तू त घर के लइका हव चलि जा, आपाना कोहबरे में त बाड़ी. बातावे आला इहो ना सोचलसि कि ऊ लइकवा त दुलहिन के रङ लागा के चलि जाई बाकिर दुलहिन के मन होई तो ऊ का लगइहें. कामारा में अइसन कवनो इंतजाम त रहे ना.

कामारा में कोना कोना खोजली त चाचीजी के एगो एवेरेडी के बैटरी मिलि गइल. देखि के बाड़ा खुस भइली कि फोरि के पानी में मिला के लागा देबि, जइसे पहिले के जामाना में काठ के पटरी प करिखा लागावल जात रहे. बाकिर बैटरी हाथ से फूटे तब त. आपाना से भरि जोर कोसिस कइली, जब ना फूटल त तनिकी बाउरो लागत रहे. तलहीं एगो जूता पालिस के डिबा लउकि गइल.

जब उ देवर जी बाहर निकलले तो सुनाइल कि सहर के भउजी त गमकउआ रङ धइले बाड़ी. आङन में देखि के भी लोग अचरज में पड़ि गइल कि दुलहिन के पासे रङ काहां से आइल. जे कामारा में भेजले रहे ऊहो तनि राहते महसूस करत रहे. बाद में ओकरो अफसोस होत रहे कि काहें के कनिया के निहथे रहते केहु के रङ खेले के भेजि देनी हा. अब सभे केहू ई जानल चाहत रहे कि दुलहिन के पासे ई गमकउआ रंग आइल काहां से.

केहू कहुए कि मायके से लेके आइल रहल होइहें. तले बीचे में बात काटि के केहू बातावे लागल कि झांपी त हमहीं खोलले रहनी ओमे त रङ ना रहुए - गमकउआ के के कहो भाला.

जब ऊ देवर जी ओसारा से निकलि के बाहर चलि गइले त हाथ धोवे खातिर चाचीजी बाहर निकलली. सभे केहू आसे पासे बटोरा गइल. देखि के बुझि गइली कि बात का बा. जब बतवली की कवनो खास बात नइखे. जूता के पालिस ले के हाथे पर आंवरा के तेल मिला के मुंह में पोति देले रहलीं, त सबके ठाहाका के ठिकाना ना रहे. जब कभी भी होला आ फगुआ के चारचा होखेला अपनेआप चाचीजी के फगुआ मन परि जाला. दुख के बात इहे बा कि चाचीजी हमनि छोड़ि के हाले में होली के पहिलहीं चलि गइली.

फगुआ के इंतजार त काफी पहिले से रहेला, बाकिर असली तेयारी समति फुंकइला के बाद से सुरू होला. जे होली बोलेला ऊ होलिका दहन कहेला आ जे फगुआ खेलेला ऊ समति फुंकइला के बाद तेयारी सुरू करेला. समति के दीने भी पूरा परिवार के गोड़ हाथ में उझिला लागावल जाला. होली वाला लोग उझिला के उबटन कहेला. उझिला लागा के फेरु रगड़ि रगड़ि के छोड़ा के परिवार के हर बेकति के हिसाब से गोइंठा बोरा में भरि के हर घर से समति में डालाला, ताकि जातना दुख जांजाल होके समति के साथ जरि जाऊ आ फगुआ से सब नाया सिरा से सुभ सुभ सुरू होखे.

सुभ के सुरुआत होला गोझिया से जब घर भर मिलि जुलि के बानावेला. केहू हाथे से बाना देला त केहू सांचा में जांति के. फगुआ के दिन त पुआ के होखेला. मीठा में, आ नमकीन में फुलावरा. पहिले सूखल आ बाद में तक्कड़ में भिंजा के दहीबाड़ा, जी भरि के चांपल जाला – ‘जोगिरा सारारारा!’

रङ आ अबीर के बाद फगुआ के पूरनाहुति होला चइता से. जलेले गांव के लइका फइका से लेके बड़ बुजुर्ग मिलिके टांसी में सुर ना मिलावे फगुआ फीके लागेला, बाकिर ओकारा बाद बुझाला कि जगि पूरा हो गइल - 'हो रामा चईत महिनवां...'! (लेखक सत्या दुबे वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
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