Bhojpuri: भोजपुरी समाज के स्मृति में होली परब गहराई तक धंसल बा, फगुआ के सांस्कृतिक कहानी

भोजपुरी समाज में फगुआ पर गारी-गलउज भी खूब होला. पहिले त बांस के फिचुकारी बना के लोग रंग खेलत रहल हा, त काताना लोग गोबर-पांक, पनरोह के कादो से ही फगुआ के उल्लास मनावत रहल हा.

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  • Last Updated: March 29, 2021, 12:33 PM IST
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भोजपुरिया समाज होली के फगुआ कहेला, ऊ फगुए के नाम से एह तेवहार के यादि करेला. भोजपुरी समाज के स्मृति में रंगन के ई परब गहराई तकले धंसल बा. ओइसे त मथुरा, वृंदावन आ बरसाना के होरी पूरी दुनिया में मसहूर बा, बाकिर रंग आ उल्लास के ई तेवहार भोजपुरियो समाज जमि के मनावेला. मथुरा आ वृंदावन के त गली-गली जइसे राधा रानी बनि जाला आ हर आदमी के कान्हा मानि के ओकरा के रंग-अबीर से सऊनत रहेला. कुछु ओहि अंदाज में भोजपुरी समाज के कनिया लोग आपाना देवरन के रंगे के जोगाड़ भिड़ावत रहेला. देवर अगर लजाउर भइले त एह से बचे के कोसिस करेले, आ अगर मनसहक भइले त भउजाई के किसिम-किसिम से रंगे के फिराक में रहेले.

भोजपुरी समाज में फगुआ पर गारी-गलउज भी खूब होला. पहिले त बांस के फिचुकारी बना के लोग रंग खेलत रहल हा, त काताना लोग गोबर-पांक, पनरोह के कादो से ही फगुआ के उल्लास मनावत रहल हा. दरअसल फगुआ जब आवेला त हवा में बसंती बयार के असर कुछु ढेरे रहेला. बसंत में हर मन जवान हो जाला. ऋतु के असर ह कि माहौल के प्रभाव, एह घरी सब के अंदर प्रेम आ उल्लास के भाव भरि जाला. शास्त्रीय मत बा कि एही वजह से फगुआ के प्रावधान भइल, ताकि एक दिन सब लोग आपाना मन के मइल के धो दिआउ आ मन के साफ कइल जा सके.

अब जन-जन तक ई कहानी प्रचलित हो गइल बा कि प्रह्लाद के मारे खातिर हिरण्यकश्पय आपना बहिन होलिका के गोदी में ओकरा के बइठा के आगि लगवले रहे. होलिका के वरदान रहे कि एगो खास कपड़ा पहिनि त उ ना जरि सकेले. बाकिर भगवान के दाया से प्रह्लाद बांचि गइल. जब आगि लगावल गइल, तबे अइसन हावा बहल कि होलिका के देहि से बरदान वाला कपड़ा उड़ि गइल. प्रह्लाद त बांचि गइले, बाकिर होलिका भसम हो गइली. कहल जाला कि होली के पहिले जवन होलिका दहन होला, ऊ एही घटना के यादि में होला.

ओइसे होलिका में लोग नाया-नाया खेत में गोटाइल गहूं, बूंट, जव, तीसी आदि के होलिका में भूनि के परसादी के रूप में घरे लोग ले जाला.
ओइसे हर भारतीय आ सनातनी तेवहार के ना सिर्फ सांस्कृतिक कहानी बा, बल्कि ओकर खेती-किसानी से जुड़ल संदर्भ भी बा. भारत के हर तेवहार खेती-किसानी से जुड़ल बाड़े स. फगुआ कहल जाउ चाहे होली, ऊ जब मनावल जाला, जब रबी के फसल या त गोटा गइल रहेले, भा ऊ तेयार होले. भोजपुरिया समाज चाना, बूंट, मटर के छेमी आदि के आगि में भूंजि के खाला, ओकरा के होरहा कहेला. होलिका में भी परसादी के रूप में गोटाइल फसल के एही तरी भूंजल जाला. कुछ जानकारन के कहनाम बा कि होरी, होरहा से भी जुड़ल बा.

ओइसे महाभारत के शांति पर्व में एगो वृतांत आवेला. ओकरा मोताबिक महाराज युधिष्ठिर बसंत ऋतु में एक दिन सबके खूब खुलि के बोले-खेले के अनुमति देत रहले. ताकि लोग आपन मन के मइल निकालि के पूरा साल खातिर ठीक हो जासु लोग. कुछु जानकारन के कहनाम बा कि ऊहे बाद में होली के तेवहार बनि गइल.

ओइसे भविष्य पुराण में होली खेले खातिर एगो प्रसंग आवेला, जवना में होली खेले खातिर सुझाव दिहल गइल बा. ओह प्रसंग के मोताबिक, सुबह मलेच्छन नियर होली खेले के चाहीं. जवना में गोबर, माटी, पांक-कीचड़ के इस्तेमाल कइल जा सकेला. फेरू दुपहरिया बाद रंग से होली खेलीं. बाद में नहा-धो के नाया कपड़ा पहिनि के सभा-संगति में जाईं.



भोजपुरी समाज में फगुआ के दिने कुछु अइसने माहौल रहेला. दुपहरिया के पहिले तकले लोग रंग आदि से होली खेले ला, फेरू बाद में नहा-धो के नाया कपड़ा पहिनि के गुलाल-अबीर से खेले ला. फगुआ के दिने भोजपुरी समाज के गरीब से गरीब आदमी भी देहि पर नहा-धो के कम से कम एगो नाया कपड़ा जरूर पहिनेला. कहल जा सकेला कि भोजपुरिया होली भविष्य पुराण के एह प्रसंग से काफी मिलत-जुलत बाटे.

पूरा देस के होली मे कान्हा आ ब्रज के गोपीन के बहार रहेला, बाकिर भोजपुरिया होली में अवध के राजा राम के होली के भी खूब बर्णन मिलेला. भोजपुरिया समाज गइबे करेला

अवध में होरी खेले रघुबीरा, अवध में होरी खेले रघुबीरा

केकरा हाथे कनक फिचकारी, केकरा हाथे अबीरा,

अवध में होरी खेले रघुबीरा,

राम के हाथे कनक फिचकारी, लछुमन हाथे अबीरा

अवध के होरी खेले रघुबीरा

ई रहल होरी के सांस्कृतिक पक्ष...एकरा के नवका पीढ़ी नइखे जानत, ओकरा जाने के चाहीं आ एह जानकारी संगे मनोवैज्ञानिक सफाई के एह तेवहार के झूमि के मनावे के चाहीं. (लेखक उमेश चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
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