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Bhojpuri Special: फगुनी सरसराहट में उठे करेजवा में हूक, बढ़े लागेला अजबे रोमांस

हकीकत में फागुन के आवे में अबहीं भले कुछु दिन के देर बा, बाकिर पछुआ हवा धीरे-धीरे चले लागल बा. तीसी, सरसों, रहरि के फूल के सुगंध आ आम-लीची के मोंजरि के मातल गंध से सनल फगुनहट सरसराहट से भोजपुरिया समाज में बउरहटि के संकेत मिले लागल बा.

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जइसे-जइसे फगुनाहट सरसराए लागेला, भोजपुरी माहौल में अजबे रोमांस बढ़े लागेला. चूंकि भोजपुरिया समाज प्रमुखत: खेती-किसानी वाला समाज रहल बा, एह वजह से इहां के लोगनि के रोजी-रोटी खातिर आपन गांव-गिरांव छोड़े के लंबा इतिहास रहल बा. रोजी-रोटी के चक्करघिन्नी में इहवां के लोग सैकड़ों साल से आपन जरि-सोरि छोड़े के मजबूर रहल बा. चूंकि अंगरेजी जमाना में बंगाल रोजी-रोजगार के बड़का केंद्र रहे, त लोगनि के पनाह ओहि जे ढेर मिलत रहे. एहि वजह से भोजपुरिया लोकरंग में जवन बिरह बा, ओह में कलकता आ बंगाल के ढेरे चर्चा बा…

हकीकत में फागुन के आवे में अबहीं भले कुछु दिन के देर बा, बाकिर पछुआ हवा धीरे-धीरे चले लागल बा. तीसी, सरसों, रहरि के फूल के सुगंध आ आम-लीची के मोंजरि के मातल गंध से सनल फगुनहट सरसराहट से भोजपुरिया समाज में बउरहटि के संकेत मिले लागल बा. अइसे में चौराहा-चट्टी पर भोजपुरिया बिरहिन के दरद से भरल गानन के शुरूआत हो गइल बा. ओहि में से एगो गीत बा…

लागल झुलनिया के धक्का
बलम कलकत्ता निकलि गइले
पिया-पिया कहि पीयर भइनी
जइसे बिरिछ के पत्ता,
बलम कलकत्ता निकलि गइले..

एक तरफ फगुआ के इंतजार बढ़ि गइल बा. जेकर कोरोना काल में जइसे-तइसे जल्दीबाजी में बियाह भइल रहल हा, ऊ नवकि कनिया आपन सइंया के मन ही मने बाट जोहतारी. उनुकर ई दरद रोज दुपहरिया के अंगना में आवेवाली बड़की माई समझतारी. ऊ ओलवारे कनिया के एह चिंता के जतावतो बाड़ी. ई सुनि-सुनि के कनिया के अंदर मीठ-मीठ दरद उठता. उनुका ई चर्चा निमनो लागता. बाकिर लाजे-लिहाजे खुलि के बोलि नइखी पावत.

कोरोना के चलते ननदी के कॉलेज जाए के नइखे परत. सबेरे चाह-पानी पी के ऊ महल्ला में निकले ले त एगारह-बारह बजे घरे लवटे ले. जब लवटे ले त भउजाई के जुबाने से चिंऊटी काटेले, मोका पाइ के भाई के नाम पर भउजाई के ओलवारे मजा लेले. अइसे में कनिया अगर ई सोचे लागे त बेजाइं ना कहाई. अइसन मोका पर नवकी बहुरिया के करेजा में जवन दरद उठेला, ओह के लोकरंग में कुछु अइसन शब्द मिलल बा…

फागुन के आइल बहार हो बलमुआ,
छोड़ि द नोकरिया घरे आव.
घरहिं खिअइबो तोहे पूड़ी-मिठइया,
बलमु घरे आव.
ऊपर से तोहके सेजिया सुताइब,
हीक भरि जिअब लहालोट हो,
बलमुआ छोड़ि द नोकरिया,
छोड़ द नोकरिया घरे आव..

इहे मोका ह, जब आम के मोजरि के बीच से अचानक चिहुकला नियर कोइलरि बोले लागेले. कोइलर के ई बोली जहां लइका-बच्चन खातिर ठिठोली के जरिया बनि जाले, उहां नवकी कनिया के करेजा में हूक के कारण बनि जाले. रहल-सहल कसरि निकालि देले टोला-पड़ोसा के ईया-दादी के ओलवार बोली, दुआरे से मजा लेत देवर के रसीली बानी आ ननदी के ठिठोली. अइसे में जिया ना जरी ता का होई. नवकी कनिया अगर कलकत्ता पर मने-मने खीसि ना निकलिहें त का करिहें. हालांकि कलकता वाली खीसि तब ठंढा जाई, जब पिया जी उहां से लवटिहें आ साड़ी, लिपिस्टिक, आलता आ पाउडर लेके अइहें. ओइसे त अब आलता के जमाना नइखे. बाकिर कुछु साल पहिले ले बंगाल के आलता के बहुते चालान रहे. जब सोहागिन लोग आपना एड़ी- गोड़ के किनारे आलाता लगइहें त ओकर चटख रंगे देखि के कई लोगन के करेजा जइसे बइठि जात रहे. बहरहाल अभी त कनिया के कोइलरि के बोलिए गोली नियर लागतिया…

लागेला करेजवा में गोली हो,
सुनि कोइलर के बोली…
छलकि-छलकि जाला रस के गगरिया…
चलल दुलुम भइले रहिया डगरिया…
जहं-तहं करेला ठिठोली हो, नवछंटियन के टोली….
भरि-भरि के मारे देवरा फिचुकारी…
भींजि के लथपथ हो गइले साड़ी…
मसकि गइल हमार चोली हो, कइसे खेलीं होली…
झिरी-झिरी बहेला बेयार मधुआइल…
कुफुरेला जीव मोर पियवा न आइल…
दुअरा लगाइल केहू डोली हो, जइसे उड़नखटोली…

कोइलरि की बोली से परेशान कनिया के टीस तबे कम होई, जब संइयां लवटि के अइहें.. तब ले कनिया मन ही मन सइयां के यादि कइके कबो हंसि के रहि जइहें त कबो दुखा जइहें. ओइसे अब कनिया के पाले मोबाइल फोन बा. एह फोन में थ्री जी भा फोर जी कनेक्शन बा. जब मोका लागी त वीडियो कॉल कइके बतिया लिहें आ शिकवा-शिकायत भरि दिहें. एह खातिर उनुका तनी एकांत चाहीं, नाहीं वीडियो काल पर आपाना घर के लइका के देखि के लोगे जियल मुसकिल कई दी. तब ले कनिया के पाले एके उपाय बा, बड़की दीदिया चाहे माई से वीडियो काल पर बतियावसु, साल भर के भइल भतीजा के मांह बनि के चलतु वीडियो पर देखसु. जब ले ई करिहें, तब ले सांझि त होइए जाई, फेरू आंगाना गुलजार हो जाई. देवर के बोली आ ननदि के ठिठोली शुरू हो जाई… (लेखक उमेश चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

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