Bhojpuri: कइसे तार-तार भयल बनारसी साड़ी उद्योग, पढ़य पूरी कहानी

अइसन नाहीं हौ कि बनारसी साड़ी उद्योग के बचावय के नाम पर सरकारी अउर गैर सरकारी कसरत नाहीं होत हौ, लेकिन इ कुल बेमानी बा, काहे से कि बीमारी कुछ अउर हौ इलाज कुछ अउर होत हौ. नतीजा इ बा कि बीमारी बढ़ल जात हौ अउर बुनकर मरणासन्न स्थिति में.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 13, 2021, 12:54 PM IST
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बनारसी साड़ी देश ही नाहीं दुनिया में हर महिला क पसंदीदा पोशाक हौ. कम से कम एक ठे बनारसी साड़ी खरीदय क सपना हर महिला रहयला. लेकिन सपना के सौदागरन के लालच के कारण बनारसी साड़ी बुनय वाले बुनकरन क सपना बिखरि गयल हौ. बनारसी साड़ी उद्योग के अस्तित्व पर ही खतरा पैदा होइ गयल हौ. अइसन नाहीं हौ कि बनारसी साड़ी उद्योग के बचावय के नाम पर सरकारी अउर गैर सरकारी कसरत नाहीं होत हौ, लेकिन इ कुल बेमानी बा, काहे से कि बीमारी कुछ अउर हौ इलाज कुछ अउर होत हौ. नतीजा इ बा कि बीमारी बढ़ल जात हौ अउर बुनकर मरणासन्न स्थिति में.

सवाल अब इ हौ कि आखिर बनारसी साड़ी के साथ समस्या शुरू कहां से भयल. बनारसी साड़ी के साथ समस्या 2004 में शुरू भयल. शंकर सिंह वाघेला केंद्रीय कपड़ा मंत्री रहलन अउर ओनकर एक निर्णय बनारसी साड़ी उद्योग, खासतौर से बनारसी बुनकरन के बर्बादी क कारण बनल. बुनकरन के लाख विरोध के बावजूद वाघेला अपने निर्णय से बाज नाहीं अइलन अउर दुनिया भर में सरनाम बनारसी साड़ी के बर्बादी क बुनियाद रखि देहलन. तब से आजतक प्राचीन बनारसी साड़ी उद्योग हर रोज अपने मौत मरत हौ. तमाम बुनकर बुनकरी क काम छोड़ि देहलन अउर मजदूरी करय लगलन. अगली पीढ़ी बुनकरी के पेशा में आइब बंद कइ देहलस अउर जवन बुनकर अबही तक बनारसी साड़ी बुनत हयन, ओनकर माली हालत बहुत खराब हौ. अगर इहय हालत रहल त एक दिन अइसन आई जब असली बनारसी साड़ी इतिहास बनि के रहि जाई.

गुजरात से संबंध रखय वाला शंकर सिंह वाघेला कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग-1 सरकार में कपड़ा मंत्री रहलन. कपड़ा मंत्री के रूप में उ एक ठे अइसन निर्णय लेहलन कि बनारसी साड़ी क बंटाधार होइ गयल. बनारसी साड़ी अपने अलग डिजाइन अउर डिजाइन पर रेशम अउर सोने-चांदी के जरी से होवय वाली बुनाई-कढ़ाई बदे जानल जाला. इहय बनारसी साड़ी क खासियत हौ, अउर इ खासियत हुनरमंद बनारसी बुनकरन के हाथे क काम हौ. एक बनारसी साड़ी बनावय में कई बुनकर लगयलन अउर डिजाइन अउर काम के हिसाब से कभी-कभी तीन महीना भी लगि जाला. जवने साड़ी में जेतनी मेहनत अउर जेतना लागत, ओही के हिसाब से ओकर कीमत. केतना लोग आर्डर देइ के अपने पसंद वाली डिजाइन क बनारसी साड़ी बनवावयलन. अपने औकात के हिसाब से चांदी, सोना के जरी से बुनाई-कढ़ाई करवावयलन. बनारसी साड़ी में जेतना पइसा लगाइ द कम हौ. साधारण बनारसी साड़ी भी कम से कम 10 हजार रुपिया से कम में नाहीं मिली. लेकिन हूबहू डिजाइन में नकली बनारसी साड़ी हजार दुइ हजार में मिलि जाई.

बनारसी साड़ी पुराने जमाने में राजा-महराजा के जनानखाने क शान रहल. मुगल बादशाह अकबर बनारसी साड़ी के बहुत बढ़ावा देहलस. बेगम लोग रेशम के धागा अउर सोना-चांदी के जरी से बुनल बनारसी साड़ी ही पहिनय.
बनारसी साड़ी पर जवन डिजाइन बनयला ओकरे बदे करघा पर जकार्ट क इस्तेमाल कयल जाला. जकार्ट से ही बुनकर बनारसी साड़ी पर तरह-तरह क डिजाइन बनावयलन अउर अपने हुनर से हूबहू डिजाइन साड़ी पर उतारि देलन. इ पूरा काम हाथ अउर हथकरघा पर होत रहल, जवने के नाते बुनकरन क बनारसी साड़ी पर एकछत्र अधिकार रहल. पावरलूम पर जकार्ट के इस्तेमाल क अनुमति नाहीं रहल. जबतक इ व्यवस्था रहल, दुनिया के कवनों भी बजार में बिचाए वाली बनारसी साड़ी बनारस के बुनकरन के हाथे से ही बुनल रहय. लेकिन शंकर सिंह वाघेला कथित रूप से गुजरात के साड़ी कारोबारीन के लाभ पहुंचावय बदे पावरलूम पर जकार्ट के इस्तेमाल क अनुमति देइ देहलन. सूरत क साड़ी कारोबारी पावरलूम पर इलेक्ट्रानिक जकार्ट लगाइ के बनारसी साड़ी क हमशकल बनावय लगलन. सूरत के कारखानन से नकली बनारसी साड़ी बनि के बजार में पटय लगल. सूरत क साड़ी कारोबारी रेशम के बदले पालिस्टर के धागा क इस्तेमाल करय लगलन. काहे से कि पावरलूम पर रेशम चलि नहीं पावत. हूबहू डिजाइन वाली सस्ती नकली बनारसी साड़ी के नाते असली महंगी बनारसी साड़ी क मांग घटय लगल अउर धीरे-धीरे असली बनारसी साड़ी क धंधा चउपट होइ गयल.

पावरलूम के नकली बनारसी साड़ी से एक फायदा इ भयल कि गरीब उपभोक्ता भी बनारसी साड़ी क आपन शौक पूरा करय लगलन, लेकिन एकरे नाते बनारसी बुनकरन क रोजी-रोटी चउपट होइ गयल. एह बीच केतना कारोबारी बेइमानी भी करय लगलन अउर नकली बनारसी साड़ी के असली बताइ के महंगे दाम में बेचय लगलन. बेइमानी के धंधा से तमाम बनारसी साड़ी कारोबारी मालामाल होइ गइलन. एह कुल खुराफात क एकमात्र कारण पावरलूम पर जकार्ट के इस्तेमाल क वाघेला क निर्णय रहल.

शंकर सिंह वाघेला एक बार बनारस पहुंचलन. बुनकर लोग ओनसे इ निर्णय वापस लेवय क मांग कइलन. लेकिन वाघेला बनारसी बुनकरन के पावरलूम लगावय क सलाह देहलन अउर एकरे बदे सब्सिडी देवय क आश्वासन देहलन. लेकिन सूरत के संपन्न कारोबारीन के आगे बनारस क गरीब बुनकर टिक नाहीं पइलन अउर धीरे-धीरे गरीबी अउर कर्ज के बोझ के नीचे दबल गइलन. पावरलूम पर शुद्ध रेशम क काम नाहीं होइ पावत, काहे से कि रेशम क धागा कमजोर पड़यला. परिणामस्वरूप् पावरलूम पर पालिस्टर मिश्रित साड़ी बनय लगलिन.



करइला नीबी पर तब चढ़ि गयल जब सरकार बनारसी साड़ी खरीदब बंद कइ देहलस. सरकार यूपी हैंडलूम अउर यूपिका हैंडलूम के माध्यम से बुनकरन से बनारसी साड़ी खरीदय. बुनकरन के नकद पइसा मिलि जाय और ओही पइसा से उ दूसरे साड़ी बदे कच्चा माल खरीदय अउर घरे क खर्चा चलय. बनारस में बनारसी साड़ी खरीदय क पांच सरकारी केंद्र रहलन. बुनकरन से एक हजार में साड़ी खरीद के पांच हजार में बिचाए लगल. जवने के नाते दूनों संस्था से ग्राहक टूटि गइलन अउर साड़ी क सरकारी खरीद बंद होइ गइल. बुनकर पूरी तरह से बाजार के भरोसे होइ गइलन. मांग घटल गयल, लागत बढ़ल गयल.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब से बनारस क प्रतिनिधित्व करत हयन, तब से बुनकरन बदे अउर बनारसी साड़ी के बढ़ावा देवय बदे कई योजना शुरू कइलन, लेकिन इ कुल योजना सफेद हाथी ही साबित भइलिन अउर बुनकरन के जीवन में कवनों खास बदलाव नाहीं आयल. राष्ट्रीय बुनकर एक्शन कमेटी क अध्यक्ष सरफराज अहमद के अनुसार, सरकार के तरफ से शुरू योजना सही हइन, लेकिन ओकर क्रियान्वयन सही तरीके से नाहीं होइ पावत हौ, जवने के नाते बुनकरन के योजना क लाभ नाहीं मिलि पावत हौ. सरफराज क कहना हौ कि सरकार के तरफ से स्टार्टअप बदे सब्सिडी वाले ऋण क व्यवस्था हौ, लेकिन ऋण हासिल करब अपने आप में टेढ़ी खीर हौ.

सरफराज के अनुसार, ’’पावरलूम के आगे हथकरघा खतम होइ गइलन. लेकिन एक पावरलूम लगावय में डेढ़ लाख रुपिया क खर्चा हौ. कच्चा माल बदे कम से कम 50 हजार चाही. यानी एक पावरलूम शुरू करय बदे कम से कम दुइ लाख रुपिया क जरूरत पड़यला. लाख मशक्कत के बाद भी अगर 50 हजार रुपिया क ऋण बैंक से मिलल त बुनकर इ पइसा क का करिहय. परिणामस्वरूप जादातर बुनकर महाजनन के पावरलूम पर मजदूरी करय बदे मजबूर हयन. मजदूरी क रेट भी पुराने जमाने क तीन सौ से साढे़ तीन सौ रुपिया क दिहाड़ी. ईंट-गारा क काम करयवाला भी पांच सौ रुपिया रोज कमालन, लेकिन एक बुनकर 12 घंटा काम कइ के भी वाजिब मजदूरी नाहीं पावत. बनारस क बुनकर मजबूरन सूरत जाइके पावरलूम पर काम करत हयन.’’

बनारसी साड़ी उद्योग पर बुनकर अउर ओनके परिवार के मिलाइके लगभग सात लाख लोग निर्भर हउअन अउर आज के तारीख में लगभग पांच हजार करोड़ सालाना क इ कारोबार हौ. लेकिन बनारसी साड़ी के पूरे कारोबार में हथकरघा पर बनयवाली असली बनारसी साड़ी क हिस्सेदारी काफी घटि गइल हौ.

बड़ी बाजार स्थित बनारसी साड़ी उत्पादक संगीता फैब्रिक्स एंड रौनक टेक्सटाइल्स क मालिक रौनक जायसवाल के अनुसार, ’’बनारस में हथकरघा खाली पांच प्रतिशत ही रहि गयल हयन. हथकरघा पर बनारसी साड़ी बुनय वाला बहुत कम बुनकर बचल हयन. बजार में बिचाए वाली 95 प्रतिशत बनारसी साड़ी पावरलूम पर बनयलिन.’’

अब खबर हौ कि कबीरचौरा मठ के तरफ से हथकरघा के बढ़ावा देवय क कोशिश शरू भयल हौ. कबीरचौरा मठ में फिलहाल दुइ ठे हथकरघा लगावल गयल हौ अउर लोहता में मठ के 12 एकड़ जमीन पर कुल 36 हथकरघा लगावय क योजना हौ. बनारसी साड़ी कारोबारी सुजीत गुप्ता परियोजना में मदद करत हयन. गुप्ता के अनुसार, संत कबीर दास खुद बुनकर रहलन, एह के नाते मठ के तरफ से बनारस के हथकरघा उद्योग के बढ़ावा देवय क निर्णय लेहल गयल हौ. इहां बुनकरन के हथकरघा पर काम करय बदे प्रोत्साहित कइ जाई अउर सारी सुविधा मुहैया कराइ जाई. इहां बनय वाली साड़ी मठ से जुड़ल कबीर दास क अनुयायी लोग खुद खरीदय क भरोसा देहले हयन. (लेखक सरोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
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