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Bhojpuri में स्मृति शेष: कइसे ट्रेजेडी किंग दिलीप साहब बनलें भोजपुरी सिनेमा के शुरुआती प्रेरणा

'नदिया के पार' फिलिम के एगो गाना के सृजन 1946 में ही हो गइल रहे, जेकरा में दिलीप कुमार अउरी कामिनी कौशल के जोड़ी पर खूब जमल. एह गाना के बाद से ही भोजपुरी जनता के लागे लागल कि भोजपुरी फिलिम भी बने के चाहीं.

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“मोहब्बत हमने माना ज़िंदगी बर्बाद कर देती है...ये क्या कम है कि मर जाने पर दुनिया याद करती है”... मुग़ल-ए-आज़म में दिलीप कुमार के मुंह से निकलल ई संवाद बिल्कुल साँच बा. दिलीप कुमार के अपना अभिनय अउरी फिल्मन से प्यार ही ह कि उ आज ई दुनिया छोड़ला के बादो एह दुनिया के लोगन के दिल में अउर जीवंत हो गइल बाड़न. आज दिलीप कुमार के चाहे वाला सगरो लोग के आँख नम बा काहें कि फेर से उनका के हँसत बोलत देखे के मौका ना मिली. बाकिर उ अपना सिनेमा, संवाद, हंसी, आँसू के इहवें सबके स्मृति में अउरी रुपहला पर्दा पर छोड़ के गइल बाड़ें. जब उनके सुने के मन करी, देखे के मन करी, तब उनके पर्दा पर ओइसहीं हँसत, बोलत, नाचत, रोअत, डाँटत, विलेन के पीटत देखल जा सकेला.

दिलीप साहब के डायलॉग अउरी उनके फिल्म भोजपुरी सिनेमा खातिर प्रेरणा बनल, ई बात कमे लोग के पता होई. साल 1948 में उनके कई गो फिल्म रिलीज भइल जवना में एगो रहे नदिया के पार. नदिया के पार के टाइटल गीत के अलावा अधिकांश गीत भोजपुरी में रहे. ई फिल्म ओह साल के सफलतम फिल्मन में से एक रहे. फिल्म में ‘मोरे राजा हो ले चलs नदिया के पार’, ‘कठवा के नइया बनइहे रे मलाहवा’, नजरिया में अइहा, डगरिया में अइहा’ जइसन कई गो गीत रहे जवन ओह बेरा रिकार्ड पर अउरी रेडियो पर खूब बाजे आ लोग झूमे. फ़िल्म के एगो अउरी भोजपुरी गाना 'काटे मोरा दिनवा गवनवा कब होई' के सृजन 1946 में ही हो गइल रहे. ई सब गीतन के गीतकार मोती बीए रहलें. जब ई भोजपुरी गीत के मोती बीए फिल्मिस्तान स्टूडियो के संचालक के सुनवलें त उ अपना अगिला फ़िल्म में एकरा के रिकॉर्ड करे के ऑफर देहलें. संजोग से किशोर साहू 'नदिया के पार' बनावत रहलें जे में अइसने भोजपुरी पृष्ठभूमि के गीत चाहत रहे. ई सब गीत फ़िल्म में आइल आ दिलीप कुमार अउरी कामिनी कौशल के जोड़ी पर खूब जमल. भोजपुरी क्षेत्र में त ई सब गाना अउरी ई फ़िल्म एतना प्रसिद्ध भइल कि उहाँ के लोगन में ई महत्वाकांक्षा हिलोर लेबे लागल कि भोजपुरियो में सिनेमा बनित त केतना बढ़िया होइत. एकर एगो साक्ष्य इहो बा कि भोजपुरी के पहिला फ़िल्म बनावे वाला नाजिर हुसैन अपना संस्मरण में जिक्र कइले बाड़ें कि उ जब गाँवे जास त उनका से लोग पूछे कि "भाई भोजपुरी में कब फिलिम बनी हो? तूहीं कुछु करतs." ई बात नाजिर साहब के बड़ा उद्वेलित करे.

एकरा बाद के कई गो हिन्दी फिल्मन में दिलीप कुमार आ अन्य हीरो के संवाद में भोजपुरी के प्रमुखता रहल. दिलीप कुमार के ही साल 1961 में फिल्म आइल गंगा जमुना. फिल्म के सेटअप अवध क्षेत्र में रहे अउरी संवाद में भी अवधी के असर रहे. बाकिर भोजपुरी अउरी अवधी नजदीक के भाषा हवे एही से एह फिल्म के कई गो गाना भोजपुरी के शब्दन से लबरेज रहे. ई फिल्म बहुत सफल रहे अउरी ओ साल के अधिकतर अवॉर्ड जितलस. दिलीप कुमार के नृत्य से सजल गाना ‘नैन लड़ जइहें त मनवा में कसक होइबे करी’ अभियो खूब सुनल जाला. भोजपुरी गाना कुल के चलते दर्शके भी चाहें लागल रहलें कि भोजपुरी में फ़िल्म बने के चाहीं. एने नाजिर हुसैन तैयारी में लागले रहलें. संजोग से अगिले साल 1962 में पहिला भोजपुरी फिल्म के शूटिंग शुरू भइल आ 1963 में रिलीज भइल ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’. ओकरा बाद त भोजपुरी फ़िल निर्माण के धारा फूट पड़ल.

राज कपूर रहलें दिलीप कुमार के बचपन के दोस्त

दिलीप कुमार के असली नाम मोहम्मद यूसुफ खान ह. उनके जनम 11 दिसंबर 1922 के ब्रिटिश भारत के पेशावर में भइल रहे. 12 भाई-बहिन में से एक दुलरुआ युसुफ खान के पिता फल के व्यापारी रहलें. बाद में देवलाली नाशिक में पूरा परिवार चल आइल. पेशावर में उनके पड़ोस में राज कपूर भी अपना परिवार के साथे रहत रहलें. दुनू जाना बचपने से दोस्त बन गइल लोग. बाद में दुनू जाना हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री पर एक साथे राज भी कइल लोग. ओ लोग के एक साथे फिल्म 'अंदाज' आइल जवन सुपर डुपर हिट रहल. राज कपूर, दिलीप साहब के 'लाले दी जान' कहस. जब राज कपूर अपना अंतिम समय में मृत्यु शैय्या पर रहलें त दिलीप कुमार पाकिस्तान में आपन प्रोग्राम छोड़ के भागल-भागल हॉस्पिटल अइलें. उ अपना दोस्त के बीमारी से उठावे के बहुत कोशिश कइलें. उनके अपना साथे फेर पेशावर के गलियन में कबाब खाए खातिर जाए के कहलें, राज कपूर के होश में आके बतियावे खातिर कहलें. बहुत देर ले कोशिश कइला के बाद जब दिलीप कुमार के गला रुँधे लागल त उहो आशा छोड़ देहले. ओकर कुछ दिन बादे राज कपूर के मृत्यु हो गइल.

आज जरूर दिलीप कुमार अपना बचपन के दोस्त से मिलिहें, काहें कि अब उहों उनके लगे चल गइलें.

दिलीप कुमार के पहिला फिल्म 1944 में आइल, नाम रहे ‘ज्वार-भाटा’. बाकिर ई फिल्म ना चल पावल. एकर बाद उनके दू गो अउरी फिल्म आइल, उहो कुछ खास कमाल ना देखा पवलस. फेर 1947 में फिल्म आइल जुगनू. ई फिल्म आजादी के ओह साल में सबसे अधिक कमाई करे वाली फिल्म बनल अउरी एही से दिलीप कुमार के करियर के गाड़ी पटरी पर आइल. एह फिल्म में बाद में चलके मशहूर गायक बनल मोहम्मद रफी के अतिथि भूमिका भी रहे.

ओकरा अगिला साले 1948 में दिलीप साहब के पाँच गो फिल्म रिलीज भइली सन. जवना में नदिया के पार साल के सबसे ज्यादा कमाई करे वाला भारतीय फिल्म बनल. एकर कारण रहे, सुंदर पटकथा, कर्णप्रिय गीतन में भोजपुरिया माटी के छौंक. एकरा अगिला साले अंदाज फिल्म आइल आ एकरा बाद दिलीप कुमार के पूरा देश में चर्चा हो गइल. 1955 में आइल देवदास, 1957 के नया दौर आ 1958 में आइल मधुमती अइसन फिल्म रहे जवन दिलीप कुमार के ट्रेजेडी किंग बना देहलस आ भारतीय सिनेमा में यथार्थ अभिनय के प्रचलन शुरू हो गइल. ओकरा बाद कई साल से बनत-बंद होत फेर बनत फिल्म ‘मुग़ले आज़म’ 1960 में आखिर रिलीज भइल. फिल्म के निर्देशक के सपना कि ई फिल्म भव्यतम होखे, पूरा हो गइल. ई फिल्म इतना ज्यादा सफल भइल कि भारतीय सिनेमा के एगो माइलस्टोन फिल्म बन गइल आ अगिला 11 साल तक एकर कलेक्शन के रिकॉर्ड केहू ना तूर पावल. एह में मुख्य किरदार सलीम के भूमिका में दिलीप कुमार दर्शक से लेके आलोचक तक के मन मोह लेहलें.

आगे आवे साल में दिलीप कुमार एक से बढ़ के एक फिलिम देहलें अउरी लगभग 65 गो से ऊपर फिलिम में काम कइलें. आज भी उनका नामे सबसे ढेर फिल्मफेयर पुरस्कार जितला के रिकॉर्ड बा. दिलीप कुमार अभिनेत्री सायरा बानो से बियाह कइलें. दुनु जाना अपना प्रोडक्शन में एगो भोजपुरी फ़िल्म भी बनावल लोग, नाम रहे 'अब त बन जा सजनवा हमार'. एह फ़िल्म में रविकिशन हीरो रहलें. दिलीप कुमार लगभग 12 गो भाषा के जानकर रहलें. उ भोजपुरी भी धारा-प्रवाह बोलस. ई बात बड़ा कम लोग के पता होई.

दिलीप कुमार भारत के लाखों युवा के प्रेरणा स्रोत हवें. आज भले उ ई माया के दुनिया छोड़ के सुरलोक चल गइल बाड़ें बाकिर हमनी सभ के स्मृति में हरदम असहीं जियत रहिहें आ आपन संवाद से मोहित करत रहिहें कि “कौन कम्बख्त है जो बरदाश्त करने के लिए पीता है, मैं तो पीता हूं की बस सांस ले सकूँ”

( लेखक मनोज भावुक भोजपुरी साहित्य व सिनेमा के जानकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

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