Bhojpuri: कोरोना महामारी में बढ़ावे के बा हिम्मत तs पढ़ीं ई अजगुत कहानी

कोरोना महामारी के बिकराल रूप देख के गांव में बहुत हताशा रहे. जांच खातिर अतना लमहर लाइन लागल रहे कि खाड़ा-खाड़ा गोड़ दुखा गइल. कोरोना तs जिनगी मुहाल क देले बा. महामारी में दुख अउर बिपत्ति के बीच करेजा कइसे काड़ा कइल जाला, एकर सीख 77 साल पुरान एगो कहानी में दिहल गइल बा. ई कहानी निरासा में आसा के संचार करेवला बा.

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  • Last Updated: April 27, 2021, 8:01 PM IST
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शिवशंकर सुमन जी हाईस्कूल में हिन्दी पढ़ावत रहीं. कोरोना महामारी के बिकराल रूप देख के गांव में बहुत हताशा रहे. आठ अदिमी के पोजिटिभ भइला से सभे बहुत डेरा गइल रहे. सरजू राय अउर भुनेसर चउधरी अस्पताल से जांच करा के आवत रहन. सुमन जी के देख के सरजू राय कहले, का कहीं माट साहेब, ई गरमी में हालत खराब हो गइल. जांच खातिर अतना लमहर लाइन लागल रहे कि खाड़ा-खाड़ा गोड़ दुखा गइल. कोरोना तs जिनगी मुहाल क देले बा.

भुनेसर चउधरी निरास भाव में कहले, ई महामारी तs अइसन दिन देखा देखा देलस कि खून के रिस्ता भी पानी हो गइल. आज अखबार में पढ़नी कि बगसर में कइसे एगो बेटा कोरोना के डरे आपना माई के लाश लेवे से इंकार कर देलस. ई सब खबर पढ़-सुन के मन के धुकधुकी अउर बढ़ जाता. सुमन जी कहले, अगर आफत आ गइल बा तs ओकर सामना करहीं के पड़ी. मन में हिम्मत बढ़ावे के खातिर कवनो न कवनो उपाय करहीं के पड़ी. महामारी में दुख अउर बिपत्ति के बीच करेजा कइसे काड़ा कइल जाला, एकर सीख 77 साल पुरान एगो कहानी में दिहल गइल बा. ई कहानी निरासा में आसा के संचार करेवला बा.

दुख में जिये के तरीका

सुमन जी के बात सुन के सरजू राय अउर भुनेसर चउघरी के मन में ई कहानी जाने के खुदबुदी तेज हो गइल. दूनो जना सुमन जी मड़ई में अलगे- अलगे खटिया पर बइठ गइले. सरजू राय कहले, अब तs कहानी सुनिये के जाइब जा. सुमन जी कहले, ई कहानी 77 साल पुरान हs. एकरा के लिखले बाड़े महान साहित्यकार फणीश्वर नाथ रेणु. रेणु जी के ई कहानी 1944 में साप्ताहिक विश्वमित्र में छपल रहे. कहानी के नांव हs, पहलवान की ढोलक. 1944 के आसपास बिहार में मलेरिया अउर हैजा महामारी के रूप में फैलल रहे. रेणु जी के कहानी में श्यामनगर के जिकिर बा. श्यामनगर अब अररिया जिला के एगो गांव बा. 77 साल पहिले श्यामनगर के अगल-बगल गांव में हैजा अउर मलेरिया लाश के ढेर लगा देले रहे. डर, भय अउर मउवत से पूरा गांव में अइसन मनहूसी रहे कि जिनगी बेकार लागे लागल. लेकिन दुख अउर चिंता में डूबल लोग के सहारा बन गइल ढोलक के थाप. ई अवाज से गांव के लोग के जिनगी बदल गइल.
पहलवान की ढोलक

रेणु जी आपन कहानी रचे खातिर एगो पात्र गढ़ले बाड़े लुट्टन सिंह पहलवान. पहलवानी में नांव कमाइला के बाद लुट्टन सिंह, श्यानगर के राज दरबार में बहाल हो गइले. कुछहीं दिन में ऊ इलाका के सबसे बड़का पहलवान बन गइले. पनरह साल तक लुट्टन के केहू हरा ना पवलस. श्यामनगर के राजा जब ले जिंदा रहले लुट्टन के तूती बोलत रहल. लेकिन उनका मरला के बाद लुट्टन के दुरदिन शुरू हो गइल. राजा साहेब के बेटा बिलाएत में पढ़त रहन. ऊ श्यामनगर लौटले तs पहलवानी पs खारचा के अनेरिया बता के लुट्टन के दरबार से हटा देले. तब ले लुट्टन के दूगो बेटा भी पहलवान हो गइल रहन. दरबार से हटला के बाद लुट्टन पहलवान अपना लइकन संगे गांवे लौट आइले. गांव के किनारा एगो मड़ाई लगा के रहे लगले. रोज-रोटी खातिर गांव के लइकन के पहलवानी सिखावे लगले. लेकिन खेतीहर मजूरन के गांव में चाउर गेहूम दे के केहू पहलवानी सिखल ना चाहत रहे. लुट्टन के रोटी पs आफत हो गइल.

महामारी के तांडव



भुनेसर चउधरी पूछले, एकरा बाद का भइल. सुमन जी कहले, लुट्टन के केहू गुरु ना रहे. अखाड़ा के बहरी बाजे वला ढोल के थाप से लुट्टन के जीते के जोश मिलत रहे. ढोल के अवाज में लुट्टन के सुनाई पड़े कि आजा भिड़ जा, चाबस पाट्ठा, दांव काट के बिरोधी के पटक दे. एकरा बाद लुट्टन ढोल के ही आपन गुरू माने लगले. ऊ ढोलक के पूजा कर के अखाड़ा में कूदस. ऊ अपना लइकन के भी ढोलक बजा के पहलवानी सिखावत रहन. लुट्टन के ढोल के आवाज में अदिमी के बोली छिपल रहे. लेकिन अचके में आफत आ गइल. मलेरिया अउर हैजा से घरे-घरे अदिमी मरे लगले. छुआछूत के बेमारी रहे. घर में लाश पड़ल रहे लेकिन केहू उठावे खातिर तइयार ना. पूरा गांव में रोआरोंहट, चीख-पुकार मचल रहे. लाश के जरावल मोसकिल रहे. लोग बिना कफन के ही लाश नदी में बहावे लगले. बेटा भिरिये अंतिम सांस लेवे लेकिन माई लोग के बेटा कहे भी हिम्मत ना होत रहे. रिस्ता नाता सह बानी हो गइल रहे. सांझ होते लोग अपना झोपड़ी में घुस जाए. एक दोसरा के पूछे वला केहू ना रहे. गांव के बाताबरण समसान नियर मनहूस हो गइल रहे. अइसन में अमावस के अनहरिया रात अउर भयानक बुझाये लगे. लेकिन ओह मनहूस चुप्पी के एक अवाज रोज तूरत रहे. इहे अवाज जिनगी के अधार बन गइल.

ढोल के अवाज में गुरुमंतर

सुमन जी के बात जारी रहे. लुट्टन पहलवान रोज रात भर ढोलक बजावस. सांझ से भोर तक. ढोल के अवाज में कवनो दवाई ना रहे कि ओकरा से बोखार ठीक हो जाइत. ढोल से महामारी के नाश भी संभव न रहे. लेकिन ओकर लगातार आवाज सुन के लोग के उदास मन में एगो भरोसा जाग जाय. लोग के ई बुझाये लागे कि केहू तs गांव में अइसन बा कि मउवत के भी ललकरले बा. ढोल के अवाज से दुख भुला के जिये के ललसा पैदा होखे लागल. रात के अन्हरिया में ढोल के थाप, लोग खतिर संजीवनी बूटी बन गइल.

मउत के बीच जिनगी के आस

सरजू राय कहले, कोरोना के कोप के बीच लुट्टन पहलवान जइसन अदिमी के ही जरूरत बा. सुमन जी कहले, लुट्टन के मार्मिक प्रसंग अभी तS बाकिये बा. एकदिन महामारी में लुट्टन के दूनो लइका चल बसले. लुट्टन पहलवान देह में माटी मल के दंड लगवले. एकरा बाद दूनो जवान लइका के कान्हा पs लाद के नदी में बहा अइले. गांव के लोग के बुझाइल कि ऐह दुख में लुट्टन आज राती खा ढोल ना बजइहें. लेकिन जइसही सांझ भइल ढोल के थाप गूंजे लागल. लोग चरज में पड़ गइले. लुट्टन पहलवान के हिम्मत के सभे दाद देवे लागल. ढोल के अवाज मउवत से लड़े के गुरुमंतर रहे. अब ई अवाज गांव के लोग के आदत बन गइल रहे. ई सुन के सांस के आस बढ़ जाये. बिना दावा-बिरो के ही लुट्टन जिनगी देवे वला बैद बन गइले. कुछ दिन के बाद एक रात ढोल के थाप ना सुनाई देल. लोग समझले कि पहलवान के शायद तबीयत ठीक न होखे. पांच दिन बीत गइल ढोल के अवाज ना आइल. भोर भइल त लुट्टन पहलवान के कुछ चेला गइले तS देखले कि उनकर लाश जमीन पS पड़ल बा. लुट्टन मर तS गइले लेकिन कतना लोग के जिये के हिम्मत दे गइले. (लेखक अशोक कुमार शर्मा वरिष्ठ स्तंभकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)
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