Bhojpuri: सतुआ के बात बा निराला, महाभारत में लिखल बा- सतुआ दान अश्वमेघ यज्ञ के बराबर

भोजपुरिया सुभाव मोताबिक सतुआ सांथे के जगह पर सतुआ संगे शब्द रहीत त आउर आच्छा लागित.खैर. एह विषय में सोध होखे के चाहीं कि आखिर का वजहि बा कि जवना सातू के गुणगान आयुरवेद कइले बा, महान वैद चरक ऋषि ओकरा के गुणन के खान बतवले बाड़े, ओह के आखिर काहें लोकगीत में गरीबी के प्रतीक मानल गइल बा.

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ओइसे त सतुआ कवनो ना कवनो रूप में समूचे पछिमी आ पूरबी भारत में खाइल जाला, बाकिर सतुआ के जवन माजा भोजपुरिहा समाज लेला, ओकर बाते अलग बा. भोजपुरिहा इलाका में मानसूनी बउछार आ गइल बा. बूनी बरसल सुरू भइल ना कि भोजपुरिया समाज सातू के ओह रूप में खाए से परहेजे लागेला, जवन सबसे मसहूर बा. बूनी बाजल ना कि भोजपुरिया मनई चटनी आ पियाजु संगे सातू खाइल छोड़े लागेला.

सतुआ खाए के एगो आउर रूप बा लिबरी. लिबरी माने तनी गार्ह लस्सी. जेठ-बइसाख के चढ़त गरमी के दुपहरिया में माठा भा आगि में पकवल कांच आम के रस संगे पानी में सतुआ घोरि के पियला के आनंद उहे समझि, जे ओह घरी भोजपुरिया इलाका में चढ़त घाम में रहगीरी कइले होखी. एह के माने ई नइखे कि बूनी बाजत लोग सतुआ खाइल भुला जाला. एह घरी सतुआ दू रूप में ज्यादे काम आवे ला.

अब त घर-घर गैस-चूल्हा पहुंचि गइल. जेकरा जांगर गैस लेबे का ना रहे, मोदी सरकार उज्ज्वला योजना में उनुको के गैस दे दिहलसि. बाकिर करीब चालीस-पचास साल पहिले बारखा के दिन खातिर पिसान आ गोइंठा-चइली के इंतजाम कइ के अलोता अइसन जगह ध दियात रहल हा, जहवां बरखा के पानी ना पहुंचे. आ लवना-जरावन ना भीजे. अगर भीजि गइल त भोजन के दुलम होखे के आसंका बढ़ि जात रहल हा.त ओह घरि गोइंठा के आंच पर सतुआ के मसाला भरल लिट्टी बनावल आसान रहे. ओह के भोजपुरिहा समाज कहीं फुटेहरी कहेला त कहीं भंवरी. आलू-भंटा के चोखा संगे ओकर सवाद के पूछहिं के नइखे.

बलिया के लिट्टी आताना मसहूर हो गइल बा, कि लखनऊ में दोकानि करे वाला बाड़े बाराबंकी, बस्ती आ फैजाबाद के, बाकिर साइन बोर्ड लगवले बाड़े, बलिया के लिट्टी. बरखा के दिन में सतुआ के एगो आउर रूप में आखिर जाला. चाउर के भात संगे भभरी. भभरी होखे भा फुटेहरी, बूंटे के सातू के इस्तेमाल होला. भभरी में नून, मरीचा, पियाजु, लहसुन, अचार के मसाला आ सरसों के तेल डालि दियाला. फुटेहरियो के मसाला भी इहे होला. ओकरा संगे भात.आ-हा-हा. सतुआ के सोहरत आ ओकर इज्जत एही से समझल जा सकेला...गाजीपुर के लोकगायिका गायत्री यादव के गावल गाना एह घरी पूरबिया लोगन के जबान पर चढ़ल रहल हा,
सतुआ साथे चटनी, रोज चाटेल पिया.

ओइसे भोजपुरिया सुभाव मोताबिक सतुआ सांथे के जगह पर सतुआ संगे शब्द रहीत त आउर आच्छा लागित.खैर. एह विषय में सोध होखे के चाहीं कि आखिर का वजहि बा कि जवना सातू के गुणगान आयुरवेद कइले बा, महान वैद चरक ऋषि ओकरा के गुणन के खान बतवले बाड़े, ओह के आखिर काहें लोकगीत में गरीबी के प्रतीक मानल गइल बा. सहरी आ अभिजात समाज के बनाना आ मैंगो शेक के बीचे सातू के शेक आपन जगहि बना लेले बा.बाकिर भोजपुरिहा लोकगीत में ई गरीबी आ अभाव के वर्णन करे के काम आवत रहल हा. रंउओं देखीं,
बाबा घरे रहलीं त दूध भात खइलीं,
आरे सइयाँ घरे सतुआ मोहाल.
बाबा घरे रहलीं त चुनरी पहिरलीं,
अरे सइयाँ घरे लुगरी पुरान.

एह गीत में नायिका कहतिया कि जब ले नइहर में बाबा के घर में रहनीं त दूध-भात खाए के मिलत रहे, बाकिर जब से ससुरा आइल बानीं, इहवां सतुओ दुलम हो गइल बा..जब ले बाबा के घर में रहनीं, तब ले रंग-बिरंगी चुनरी पहिने के मिलत रहे, इहवां केहू तरी पुरान लुगरी से काम चलावे के परता.

ओइसे सातू के गुण के मान्यता भोजपुरियो संस्कृति देले बिया. अगर अइसन ना रहित त भादो के कृष्णपक्ष के चौथि के दिने होखे वाला बहुरा के व्रत आ कुवार में आवे वाला तीजि व्रत में एकर महत्व ना रहित. बहुरा के दिने नदी, तालाब आ पोखर में नहा के लइकी सातुए गुर से पारन करेली. एही चौबीस घंटा के निर्जला व्रत के बाद सोहागिन लोग सतुआ-गुर भा चीनी से पारन करेला. हं, एह में चाना भा जनेरा के सतुआ ना होला, जव भा सावां के सातू के इस्तेमाल होला. सतुआ के महत्वे ह कि मेष संक्रांति सतुआन के ही रूप में मसहूर बा. एह दिन भोजपुरिहा समाज नदी, पोखर, तालाब भा घरहिं के इनार-कुआं पर नहा के पहिले सतुए के दान करेला आ फेरू सतुए खाला. एकरा बादो ई समझ के परे बा कि लोकगीतन में सातू माने पिछड़ापन आ गरीबे के खोराक के रूप में मसहूर बा. कुछु साल पहिले एगो लोकगीत बाड़ा मसहूर भइल रहे,
सतुआ खा ल भतार,
दही-चिउरा खइहें यरऊ.

यानी नायिका आपाना सवांग के सतुआ खियावतिया. आ मने-मने कहतिया कि तू इहे का, घर में राखल सजाव दही आ चिऊरा आपाना यार के खियाइबि. एही तासीर वाला एगो आउर गीत मसहूर भइल रहे,
सतुया सानि के खा ल ए बलम जी.

भोजपुरी में सतुआ आ सातू दूगो रूप बा, बाकिर मराठियो लोग सातूए कहेला.एकर हिंदी रूप सत्तू बा. एकरा बारे में भाषा विज्ञानी लोगन के कहनाम बा कि ई संस्कृत के सक्तु या सक्तुक: शब्द से निकलल बा, जवना के मतलब होला, भूंजल अनाज के आटा. सातू के तासीर ठंढा होला, बशर्तें कि ऊ पानी, माठा भा आगि में पकवल कांच आम के रस संगे लिहल जाऊ. बाकिर फुटेहरी में जब मसाला के रूप में ऊ भरा जाला त ओकर तासीर बदलि जाले.इ हो एगो वजहि बा कि भरि जाड़ सतुआ वाली लिट्टी खूब चाव से खाइल जाले.ऊ सरीर में गरमी राखेले आ ऊर्जा के स्रोत बनल रहेले. ओइसे बूंट आ मकई के अलावा जव, सावां आ मकई के भी होला. तीनन के तासीर ठंडा होला आ ओकरा से मर्जी मोताबिक नून भा गुर भा चीनी डालि के पानी में घोरि के पीयल जाला. आयुर्वेदाचार्य चरक ऋषि त जव के सातू के बारे में चरक संहिता में लिखले बाड़े, कि जव के सातू अम्लपित्त के रोकेला, पेशाब के बढ़ावे ला, खून के साफ करेला, मूड के सहज करेला, पित्त के दबावेला आ कफ के खत्म करेला. फेफड़ा के ठीक राखे खातिर जव के सातू के इस्तेमाल करे के चाहीं.

संस्कृते के एगो आउर ग्रंथ में कहल गइल बा कि गेंहू के पिसान आ चोकर के बनिस्बत सातू के पचावल आसान होला, एही वजह से चीनिया यानी मधुमेह के रोगी लोगन के खून में चीन में कम हो जाले. लेकिन एकरा के कम मात्रा में देबे के चाहीं, ना त ई पेट के खराबो करेला. ओइसे ई खून की कमियो में काम आवेला. महाभारत के एगो काथा में त भूखा बाभन के सेर भरि सतुआ के दान के पुनि के अश्वमेध जज्ञ के पुनि से भी बड़ बतावल गइल बा. चना के सातू त गैस के नासक ह, पाचक भी ह आ कब्ज के दूर करेला त मकई के सातू ऊर्जा के वाहक ह, काहें कि ओकरा में कार्बोहाइड्रेट बहुते होला. गरमी के दिन बीति रहल बा, ओइसे चटख घाम के दिन में आम के चटनी संगे सतुआ खाईं. आ ई लोकगीत गुनगुनाईं...
सातू संगे नीक लागे आम के चटनिया

(उमेश चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

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