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Bhojpuri: 'विजयी विश्व तिरंगा प्यारा...' झंडा गीत कइसे बनल रहल? पढ़ीं पूरा किस्सा

Bhojpuri: 'विजयी विश्व तिरंगा प्यारा...' झंडा गीत कइसे बनल रहल? पढ़ीं पूरा किस्सा

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राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत, राष्ट्रध्वज अउर ध्वजगीत देश के अजादी के आंदोलन से जुड़ल अइसन प्रतीक हयन, जवने से हर देशवासी के आज भी देशभक्ति क प्रेरणा मिलयला. इ प्रतीक हर देशवासी के एकजुटता के डोरी में बान्हय क भी काम करयलन. राष्ट्रगान रवींद्रनाथ टैगोर क रचना रहल, जवने के बाद में राष्ट्रगान के रूप में अपनावल गइल. राष्ट्रगीत भी बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास आनंद मठ से लेहल गइल रहल. लेकिन ध्वजगीत खासतौर से राष्ट्रध्वज तिरंगा बदे लिखल गयल रहल.

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स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस या देश के अजादी से जुड़ल तिथिन पर जब भी अउर जहां भी तिरंगा फहरावल जाला, राष्ट्रध्वज के सम्मान में राष्ट्रगान ’जन गण मन अधिनायक जय हे…’, राष्ट्रगीत ’वंदे मातरम्. सुफलाम् सुजलाम् मलयजशीतलाम्…’ अउर ध्वजगीत ’विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा…’ गावल जालन. राष्ट्रगान अउर ध्वजगीत क आपन अनुशासन हौ, एक निश्चित धुन हौ, अउर ओही अनुसार दूनों क प्रस्तुति होला. लेकिन राष्ट्रगीत क एतना धुन बनल हयन कि गिनती करब कठिन हौ. ध्वजगीत खासतौर से तिरंगा बदे लिखल गयल रहल, एह नाते आज बात एही के बारे में होई.

इ बात लगभग लोग जानयलन कि देश क ध्वजगीत श्यामलाल गुप्ता ’पार्षद’ लिखले रहलन. लेकिन ध्वजगीत लिखय के पीछे क कहानी कम लोग जानयलन. इ कहानी बड़ी रोचक अउर रोमांचक हौ. श्यामलाल गुप्ता उत्तर प्रदेश के कानपुर में नरवल कस्बा क निवासी रहलन. पढ़य-लिखय में मेधावी रहलन, कविताई क सउख लड़िकइयय से रहल. घरे क माली हालत ठीक नाहीं रहल, जवने के नाते मिडिल पास कइले के बाद विशारद क डिगरी लेहलन अउर जिला परिषद, नगरपालिका के स्कूलिन में पढ़ावय लगलन. अंगरेजी हुकूमत रहल, त कानून-कायदा भी कठिन रहलन. सरकारी नोकरी करय बदे कम से कम तीन साल क अनुबंध अनिवार्य रहल. गुप्ता के इ शर्त मंजूर नाहीं रहल त नोकरी छोड़ि देहलन. देश प्रेम क भावना पैदाइशी रहल. एही दौरान गणेश शंकर विद्यार्थी से 1921 में भेंट होइ गइल. अखुआयल बीज के खाद, पानी, मट्टी एक साथे मिलि गयल. विद्यार्थी ओह समय कानपुर से ’प्रताप’ अखबार निकालत रहलन. ’प्रताप’ के प्रताप से हर कोई आकर्षित रहल. विद्यार्थी स्वतंत्रता आंदोलन क एक बड़ा नेता बनि गयल रहलन. श्यामलाल गुप्ता उमर में विद्यार्थी से तीन साल छोट रहलन. विद्यार्थी से बहुत प्रभावित रहलन, ओनकरे साथे जुड़ि गइलन, अजादी के आंदोलन में कूदि पड़लन. आठ दइयां जेल गइलन.

सन् 1923 में फतेहपुर जिला कांग्रेस क अधिवेशन रहल. अधिवेशन क सभापति मोतीलाल नेहरू रहलन. लेकिन दूसरे दिना अचानक ओन्हय बंबई जाए के पड़ल. बाकी अधिवेशन विद्यार्थी के सभापतित्व में भयल. ओह समय तक देश क झंडा तिरंगा तय होइ चुकल रहल. लेकिन कवनो झंडागीत नाहीं रहल. विद्यार्थी गुप्ता के काव्य प्रतिभा क मुरीद रहलन. उ ओनसे झंडागीत लिखय बदे कहलन. बात आइल-गइल रहि गइल. कुछ समय बीतल त विद्यार्थी गुप्ता से गीत के बारे में पूछलन. गुप्ता कहलन कि लिखाइ जाई. विद्यार्थी अड़ि गइलन, कहलन कि हर हाल में काल सबेरे तक गीत चाही. गुप्ता अपने मन से कविता करयवाला कवि रहलन. खास विषय पर, समयसीमा के भीतर कविता लिखब कठिन काम रहल. लेकिन विद्यार्थी क आदेश रहल त कागज कलम लेइ के बइठि गइलन. रात नौ बजत बजत कुछ लाइन तइयार भइल. थोड़ समय बाद पूरा गीत बनि गयल. गीत क पहिली लाइन रहल –
राष्ट्र गगन की दिव्य ज्योति राष्ट्रीय पताका नमो नमो.

गीत सुंदर रहल, लेकिन गुप्ता के मन में ठीक से नाहीं बइठल. देश के आम जनता के हिसाब से इ गीत ओतना सही नाहीं रहल. थोड़ा कठिन लगत रहल. गुप्ता परेशान होइ उठलन. दिमागे में जइसे पिरकी मथय लगल. बिस्तर पर लेटलन, लेकिन नींद काहें आवय. करवट बदलत बदलत रात दुइ बजि गयल. अचानक ओनकरे भीतर जइसे नया गीत अंगड़ाई लेवय लगल. उठि के बइठि गइलन. कलम कगजे पर अपने आप चलय लगल. गुप्ता एकरे बारे में खुद कहले हउअन, ’’गीत लिखते समय मुझे यही महसूस होता था कि भारत माता स्वयं बैठकर मुझे एक-एक शब्द लिखा रही हैं.’’ एह तरे ’’विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा’’ झंडागीत तइयार होइ गयल. गीत पूरा भइले के बाद गुप्ता उछलि पड़लन. अब गीत पर ओन्हय पूरा भरोसा रहल. ओनकरे खुशी क ठेकाना नाहीं रहल.

गुप्ता सबेर होतय गीत लेइ के विद्यार्थी के लग्गे पहुंचलन. विद्यार्थी के भी गीत बहुत पसंद आयल. गुप्ता क बहुत तारीफ कइलन. अब इ गीत पास करय बदे महात्मा गांधी के पास भेजल गयल. महात्मा गांधी के भी गीत पसंद आइ गयल. गीत लंबा रहल त थोड़ा छोटा करय क गांधी सलाह देहलन. 13 अप्रैल, 1924 के जलियांवाला बाग के याद में कानपुर के फूलबाग मैदान आयोजित सभा में हजारन लोगन के मौजूदगी में पहिली बार इ गीत गावल गयल. एकरे बाद 1925 में कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन में भी इ झंडागीत गावल गयल. लेकिन अबहीं तक झंडागीत क मान्यता नाहीं मिलल रहल. सन् 1938 में कांग्रेस क अधिवेशन हरिपुरा में भयल. अध्यक्षता नेताजी सुभाषचंद्र बोस करत रहलन. ओही अधिवेशन में सात पद वाले एह गीत के पद संख्या एक, छह अउर सात में थोड़ा सुधार कइके झंडागीत के रूप में मान्यता देइ देहल गइल. अधिवेशन में मौजूद पांच हजार लोग एक सुर में झंडागीत गइले रहलन. झंडागीत से जवाहरलाल नेहरू एतना प्रभावित रहलन कि उ कहलन, ’’भले ही लोग पार्षदजी को नहीं जानते होंगे, परंतु समूचा देश राष्ट्रध्वज पर लिखे उनके गीत से परिचित है.’’

(सरोज कुमार स्वतंत्र पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

Tags: 75th Independence Day, Article in Bhojpuri, Bhojpuri

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