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Bhojpuri: जब राजेंद्र बाबू वकील से बनि गइलन मुहर्रिर, जनमदिन पर पढ़ीं प्रथम राष्ट्रपति क कहानी

Bhojpuri: जब राजेंद्र बाबू वकील से बनि गइलन मुहर्रिर, जनमदिन पर पढ़ीं प्रथम राष्ट्रपति क कहानी

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देश क पहिला राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद त्याग, सादगी अउर ईमानदारी क मूर्ती रहलन, इ बात हर कोई जानयला. लेकिन इ मूर्ती उ कइसे अउर कब बनलन, एकरे बारे में कमय लोग जानयलन. राजेंद्र बाबू अपने जमाने क बहुत बड़ा वकील रहलन. पटना में ओनकर धाक रहल, 1920 के दशक में 10 हजार रुपिया पेशी लेयं.

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गाड़ी-घोड़ा, बंगला का नाहीं रहल. लेकिन महात्मा गांधी से पहिली मुलाकात में ही कुल ठाट-बाट उतारि के वकील बाबू मुहर्रिर बनि गइलन. बापू के नेतृत्व में ओही किसानन के मुक्ति बदे चंपारन आंदोलन में तन, मन, धन से जुटि गइलन, जेकरे से 10 हजार रुपिया पेशी लेत रहलन. एक दइयां वकीली गइल त फिर पीछे नाहीं लउटलन. पूरा जीवन कांग्रेस अउर देश खातिर समर्पित कइ देहलन.

महात्मा गांधी से राजेंद्र बाबू क पहिली मुलाकात क माध्यम चंपारन क किसान राजकुमार शुक्ला रहलन. निलहे अंगरेजन के अत्याचार से परेशान राजकुमार शुक्ला ही गांधी के चंपारन लेइके आयल रहलन. सन 1917 के शुरू में राजकुमार शुक्ला कलकत्ता से गांधी के लेइके पटना रवाना भइलन. रेलगाड़ी से उतरि के राजेंद्र बाबू के बंगला पर पहुंचलन. राजकुमार शुक्ला बापू से रस्ते में बतइले रहलन कि राजेंद्र बाबू ओनकर मित्र हउअन. लेकिन बंगला पर पहुंचले पर नोकरन के व्यवहार से बापू समझि गइलन कि शुक्ला अउर राजेंद्र बाबू के बीचे मुवक्किल अउर वकील क रिश्ता हौ. राजेंद्र बाबू ओह समय पुरी गयल रहलन, शुक्ला के आग्रह के बाद भी नोकर लोग गांधी बदे घरे क दरवाजा नाहीं खोललन. बापू चूंकि दूसरे मट्टी क बनल रहलन, अउर अइसने व्यवहार क आदी होइ चुकल रहलन, एह से ओन्हय कवनो फरक नाहीं पड़ल.

राजेंद्र प्रसाद क बापू से मुलाकात कुछ दिना बाद मुजफ्फरनगर में भइल. ब्रजकिशोर प्रसाद अउर राजेंद्र प्रसाद के खबर मिलल त दूनों गांधी से मिलय दरभंगा अउर पुरी से मुजफ्फरनगर पहुंचलन. इ दूनों नामी वकील निलहा अंगरेजन के अत्याचार से परेशान गरीब किसानन क मुकदमा लड़त रहलन. दुइ ठे मुकदमा ओह समय भी चलत रहल. महात्मा गांधी अपने आत्मकथा ’सत्य के प्रयोग’ में लिखले हउअन, ’’त्यागी होते हुए भी ब्रजकिशोर बाबू या राजेंद्र बाबू भोले किसानों से मेहनताना लेने में संकोच नहीं रखते थे. उनके मेहनताने के तथा बंगाल और बिहार के बैरिस्टरों को दिए जाने वाले मेहनताने के कल्पना में न आ सकने वाले आंकड़े सुनकर मैं सुन्न हो गया.’…साहब को हमने ओपीनियन (राय) के लिए 10 हजार रुपये दिए’.’’

गरीब किसानन से एतना फीस वसूली सुनि के बापू वाकई हिलि गयल रहलन. उ दूनों वकीलन के उलाहना भी देहलन. दूनों मुकदमा पढ़ले के बाद बापू कहलन, ’’ऐसे मुकदमों से फायदा बहुत कम होता है. जो रैयत इतनी कुचली हुई हो, जहां सब इतने भयभीत रहते हों, वहां कचहरियों के जरिए थोड़ा ही इलाज हो सकता है. लोगों का डर निकालना रोग की असली दवा है. यह तिनकठिया प्रथा न जाए तबतक हम चैन से नहीं बैठ सकते. मैं तो दो दिन में जितना देखा जा सके, उतना देखने आया हूं. अब देखता हूं कि यह काम तो दो साल भी ले सकता है. इतना समय लगे तो भी मैं देने को तैयार हूं. लेकिन आपकी मदद की जरूरत है.’’

किसानन के प्रति गांधी क एतना प्रेम देखि के राजेंद्र बाबू अउर ब्रजकिशोर बाबू पानी-पानी होइ गइलन. सरम से आंख नीचे होइ गइल. दूनों वकील पूरा सहयोग करय क वादा कइलन. गांधी कहलन, ’’मुझे आपकी वकालत की योग्यता का थोड़ा ही उपयोग होगा. आप जैसों से तो मैं मुहर्रिर और दुभाषिये का काम चाहूंगा. पर वकील न रहकर मुहर्रिर बनना और अपना धंधा अनिश्चित अवधि के लिए छोड़ देना, यह मेरी कोई छोटी मांग नहीं है. यहां की हिंदी बोली समझने में मुझे भारी कठिनाई होती है. कागज-पत्र सब कैथी या उर्दू में लिखे होते हैं, जिन्हें मैं नहीं पढ़ सकता. इनका उल्था कर देने की मैं आपसे आशा करता हूं. यह काम पैसे देकर करा सकना मुमकिन नहीं है. यह बस सेवाभाव से और बिना पैसे से होना चाहिए.’’

गांधी तिनकठिया प्रथा खतम करावय के संकल्प के साथे 15 अप्रैल, 1917 के चंपारन के जिला मुख्यालय मोतीहारी पहुंचलन. अंगरेज 20 बिस्सा खेते में से तीन बिस्सा पर किसानन से नील क जबरी खेती करावय. एही के तिनकठिया प्रथा कहाय. गांधी के नेतृत्व में राजेंद्र बाबू के वकील मंडली के सहयोग से चंपारन आंदोलन उ करतब कइ देखइलस जवने क केहूं के उम्मीद नाहीं रहल. गांधी जी के अनुसार पूरे आंदोलन में कुल तीन हजार रुपिया खरच भयल. तिनकठिया प्रथा के खिलाफ 1918 में सरकार के कानून पास करय के पड़ल. किसानन के निलहे अंगरेजन के अत्याचार से मुक्ति मिलल. राजेंद्र बाबू अउर ब्रजकिशोर बाबू के वकालत के पेशा से मुक्ति मिलि गइल. दूनों वकील गांधी क भक्त बनि गइलन. अजादी के आंदोलन में आपन सबकुछ झोंकि देहलन. राजेंद्र बाबू तीन साल जेल में रहलन.

अक्टूबर 1934 में बंबई में कांग्रेस क अधिवेशन भयल, जहां राजेंद्र प्रसाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस क अध्यक्ष चुनल गइलन. सुभाष चंद्र बोस के 1939 में इस्तीफा देहले के बाद उ दोबारा कांग्रेस क अध्यक्ष बनलन. जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में सितंबर 1946 में जब अंतरिम सरकार बनल तब राजेंद्र प्रसाद खाद्य एवं कृषि मंत्री बनलन, 1946 से 1949 तक संभ्विधान सभा क अध्यक्षता कइलन. 26 जनवरी, 1950 के देश में आपन संविधान लागू भइले के बाद गांधी क इ मुहर्रिर देश के पहिला राष्ट्रपति के रूप में शपथ लेहलन. सन् 1962 में पद छोड़ले के बाद उ पटना चलि गइलन अउर सदाकत आश्रम में रहय लगलन, जहां 28 फरवरी, 1963 के उ अतिम सांस लेहलन.

राष्ट्रपति बनले के बाद राजेंद्र बाबू दिल्ली से बहरे आपन पहिला कदम बाबा क नगरी काशी में रखले रहलन. इ ओनकर पहिला अधिकारिक यात्रा रहल, अउर उ 27 फरवरी से दुइ मार्च, 1950 तक काशी हिंदू विश्वविद्यालय में अंतर विश्वविद्यालय बोर्ड सत्र में हिस्सा लेहलन. एही दौरान 28 फरवरी के एक विशेष दीक्षांत समारोह में राजेंद्र बाबू के डॉक्टर ऑफ लॉ क मानद उपाधि देहल गइल. सन् 1961 में ओन्हय दुबारा काशी आवय के रहल पंडित मदनमोहन मालवीय के प्रतिमा अनावरण करय बदे, लेकिन खराब सेहत के नाते उ नाहीं आइ पइलन. भारत के एह रतन क जनम बिहार में सीवान जिला के जीरादेई गांव में तीन दिसंबर, 1884 के भयल रहल.

(सरोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

Tags: Bhojpuri Articles, Bhojpuri News

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