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Bhojpuri: सखी रे, कोहबर त बड़ा सुन्नर

Bhojpuri: सखी रे, कोहबर त बड़ा सुन्नर

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अउरी गीतन में- “कोहबर में सिया सुकुमारी” आ “कोहबर में चिन्हनी आपन सास ए अम्मा” अभी मन परता. कोहबर के गीतन में बेटी के बिदाई के दर्द भी आइए जाला. ओकरा के बैलेंस करे खातिर गारी गावल जाला. त लोक जीवन के रंग गारी- गीत में आइए जाला.

बियाह का घरी कोहबर के भीतर कौन- कौन चीज बनावल जाला, ई नया पीढ़ी भुलाइल जातिया. अब कोहबर के नांव पर एगो चौकोर आकार बनाके ओकरा में वर- वधू के नांव, दू- चार गो प्रतीक चिह्न आ कुछ दोहा चौपाई लिख दिहल जाता. कोहबर में वर- वधू के नांव लिखल त बहुते जरूरी बा. आखिर कोहबर ह का? कोहबर कुल्ही दैवी शक्तियन के आवाहन आ आशीर्वाद खातिर प्रार्थना ह. दिव्य शक्तियन के समुच्चय ह. कोहबर में कुछ अइसन प्रतीक चित्र होखेला जौन वर- वधू खातिर ईश्वर का ओर से आशीर्वाद के स्पंदन कहल जाला. एह प्रतीकन के अर्थ कतना गूढ़ होला, आईं आजु जानल जाउ. आखिर कोहबर के भीतर कौन- कौन प्रतीक हमनी के पुरनिया बनवले रहे लोग, जौना के पालन आजुओ करेके चाहीं! कोहबर निर्माण के शुभ मुहूर्त जब मालूम हो जाउ, तब घर के पूरब भा उत्तर के देवाल (दीवार) पर चौकोर आकार में गाय के गोबर से लीपल जाला. जब दिशा के बात चलल त पंडित जी लोग भी बता देला कि वर चाहे वधू के देह से कौन दिशा के देवाल पर कोहबर बनावल ठीक बा.

जब देवाल सूख जाला त कोहबर बनावे के काम शुरू होला. अब नया जमाना में आ खासतौर से महानगर में लोग घर के देवाल पर एगो कागज चिपका के ओही कागजे पर कोहबर बना देता, ताकि देवाल गंदा ना होखे. साल भर बाद कोहबर वाला कागज उखारियो दियाता. जबकि कोहबर के ईश्वर प्राप्त आशीर्वाद मानल जाला. कई जगह त लोग कौनो नया बियाह होखे तक कोहबर के ओहीतरे छोड़ देला. युग बदलला का साथे एगो नया बात ईहो भइल बा कि अब लोग तनकी भर गाय के गोबर से छुआके गेरुआ रंग के चौकोर आकार बनावता. खैर एमें कौनो दोष नइखे. गाय के गोबर चुटकियो भर डला जाउ त पवित्रे बा.

जब गोबर से लीपल चौकोर आकार सूखि गइल त चाउर के तनकी भर थोरे देर भिंजा दिहल जाला. ओकरा बाद सिलवट- लोढ़ा से (आज के जमाना में ग्राइंडर से) चाउर के पीस के, ओकर गाढ़ आ पातर दू तरह के घोल बना लिहल जाला. ओह घोल में लाल, हरियर, पीयर, नीला आ गुलाबी रंग डाल दियाला ताकि कोहबर बहुरंगी होखे. त अब कई गो बर्तन में कई तरह के रंग तैयार हो गइल. फेर मोट, पातर आ मीडियम मोटाई वाला लकड़ी में साफ कपड़ा बांन्हि के ब्रश तैयार क लियाला. तनी रुइयो राखि लियाला. काहें से कि कोहबर बनावे का घरी रुई से भी आकार बनावे में मदद मिलेला. अच्छा त कोहबर में का का बनेला?

एइजा रउरा सब के मन परा देबे के चाहतानी कि कोहबर, भित्ति कलाकृति के एगो नमूना भी ह. सबसे पहिले विघ्न विनाशक, मंगलकारक आ समृद्धि के देबे वाला भगवान गणेश के चित्र बनेला. एकरा बाद ब्रह्मा जी, ऋद्धि- सिद्धि, पद्मासन मे बइठल शिव जी आ सदा सौभाग्यवती पार्वती माता के चित्र बनेला. शेष नाग के शैय्या पर लेटल विष्णु भगवान आ माता लक्ष्मी के चित्र त जरूरे रहेला. एकरा बाद कामदेव के वाहन तोता, समृद्धि आ पवित्रता के प्रतीक कमल के फूल के चित्र रही. कमल के फूल में लक्ष्मी के निवास भी मानल जाला. कमल नाल ब्रह्मा जी के प्रतीक ह. भगवान विष्णु के नाभि से जौन कमल निकलल बा ओही पर ब्रह्मा जी बइठल बाड़े. माने भगवान विष्णु के नाभि से से ब्रह्मा जी के जनम. कमल नाल सृष्टि के भी प्रतीक ह.

फेर नवग्रह के चित्र. नवग्रह त बनावले जाला, एकरा अलावा अलग से सूर्य आ चंद्रमा के चित्र बनावल जाला. सूर्य आ चंद्रमा ज्ञान आ शांति के भी प्रतीक ह लोग. नौ ग्रह के एगो अउरी मतलब ई कि वर- वधू पर सब ग्रह खुश रह सन. वर- वधू के जीवन सफलता आ समृद्धि के प्रकाश से भरल रहो. बड़- बुजुरुग लोगन के आशीर्वाद मिलत रहो. वर- वधू के जीवन में कौनो प्रकार के शारीरिक, मानसिक भा अध्यात्मिक कष्ट ना आवे. नया विवाहित जोड़ा के चौतरफा प्रगति होखे. बीच में भरल पूरल परिवार आ शुभता के प्रतीक कलश के चित्र रहेला जौना पर नारियल आ आम के पत्ता बनावल रहेला.

त नारियल आ आम के पत्ता अति पवित्र मानल जाला. एकरा में ई कामना कइल गइल बा कि वर- वधू के जीवन सदा पवित्रता से भरल रहे आ देवी- देवता का प्रति मन में आदर रहे. कोहबर के चारो किनारा पर फूल पत्ता के चित्रकारी बहुते मनमोहक लागेला. मिथिला क्षेत्र में कोहबर में मछरी बनावल जाला काहें से कि मिथिला आ बंगाल में मछरी के बड़ा पवित्र मानल जाला. तंत्र विद्या में मछरी के आंख सम्मोहन के प्रतीक मानल बा. कोहबर में हाथी- घोड़ा के चित्र जरूर बनावल जाला जौन कि समृद्धि आ यश के प्रतीक कहल जाला. केला के फल लागल पेड़ आ कछुआ बनेला. केला के फल शुभता आ पौष्टिकता के प्रतीक ह त कछुआ संयम के प्रतीक ह. कछुआ खतरा अइला पर आपन हाथ- पैर सिकोड़ के अपना खोल में समा जाला. एकर मतलब कि मनुष्य के रणनीतिक फैसला करेके चाहीं. हरदम आगे- आगे ना कूदे के चाहीं. कछुआ नियर कई बार खतरा के स्थान से अपना के समेट लेबे के चाहीं. कछुआ इंद्रिय नियंत्रण के भी प्रतीक ह. भगवान के कच्छप अवतार के भी प्रतीक एकरा के मानल जाला. कछुआ के सुख- समृद्धि के भी प्रतीक के रूप में देखल जाला. एकर माने कि वर- वधू के आधार कछुआ के खोल नियर ठोस आ मजबूत रहे आ जीवन में कौनो नकारात्मक ऊर्जा प्रवेश ना करे. बांस के चित्र जरूर बनावल जाला. बांस के जड़ बड़ा बरियार होला. बांस के जड़ काटे में लोगन के नानी याद आवे लागेला.

दोसर बात कि बांस पर कौनो कीड़ा- मकोड़ा के असर ना परे. सूखा होखे भा अति वृष्टि, ओकरा पर कौनो असर ना परे. बांस बरियार शरीर आ मन के प्रतीक ह. कठिन आ विपरीत परिस्थिति में भी बांस के फूल, फुला जाला. एकर माने कि वर- वधू जीवन के कठिन परिस्थिति में भी फले- फूले. मन थोर ना करे. हं मन परल. हमनी के भोजपुरिया समाज में भी कई जगह कोहबर में भी मछरी के सुंदर चित्र बनावे के परंपरा चलल चलि आवता. कई जगह कोहबर के चारों कोना पर केला के पेड़ बनावल जाला. कोहबर ओकरे बनावे के विधान बा जे सुहागिन होखे. त कोहबर में खाली दोहा- चौपाई ना लिख के ई कुल शुभ प्रतीक बनावे के चाहीं. एगो बात अउरी- ई कुल प्रतीक छोटे- छोटे बनावे के चाहीं, काहें से कि कई गो प्रतीक बनावे खातिर पर्याप्त के जरूरत बा.
तरह- तरह के रंगन के चित्र से भरल कोहबर के एगो बहुते पुरान गीत ह-
सखी रे, कोहबर त बड़ा सुन्नर…

(विनय बिहारी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

Tags: Bhojpuri Articles, Bhojpuri News

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