भोजपुरी विशेष: भोजपुरिहा लोग ना रहसु त कलकत्ता उदास हो जाई

भोजपुरी विशेष: भोजपुरिहा लोग ना रहसु त कलकत्ता उदास हो जाई
कलकत्ता भोजपुरी समाज के लोगन के दूसरका घर जइसन बा.

भोजपुरिया लोग आज बंगाल में एक मजबूत राजनीतिक ताकत बन गइल बा लोग. एकर प्रमाण इ बा कि मौका देख के ममता दीदी भी अपना मंच से भोजपुरी समाज के लोगन के जरूर संबोधित करेली.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 7, 2020, 3:33 PM IST
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हाउत ह कि कलकत्ते ना, ओकरा पांच कोस आगा- पीछा कवनो इलाका में चलि जाईं त भोजपुरिहा लोग भेटाइए जइहन. भोजपुरिहा आ कलकत्ता के संबंध बड़ा गहिर रहत आइल बा. ब्रिटिश लेखक जार्ज ग्रियर्सन पर भोजपुरी के एतना गहिर असर परल कि ऊ अपना किताब ‘दि माडर्न वर्नाकुलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान’ में भोजपुरी भाषा आ साहित्य पर एगो लंबा आ याद करे लायक शोधपरक चैप्टर लिखि दिहलन. आखिर सन 1911 तक हमनी के देश के राजधानी कलकत्ते रहे. ब्रिटिश शासक जार्ज पंचम जदि आदेश ना देले रहिते कि अब भारत के राजधानी दिल्ली रही, त कलकत्ता के महत्ता दोसरे रहित.

एगो जमाना रहे कि कलकत्ता आ ओकरा आसपास के कई मील दूर तक चटकल (जूट मिल) के भरमार रहे, आ ओहमें भोजपुरिहा लोगन के भरमार रहे. मान्यता रहे कि भोजपुरिहा लोग गजबे मेहनती होला लोग, सुर्ती फटक के ओठ में दबा गइल त ओह लोगन खातिर दुनिया के कौनो काम असंभव नइखे. ओह घरी जूट के निर्यात स्कॉटलैंड में होखे. आ संयोग देखीं कि देस में जूट के पहिला कारखाना माने चटकल कलकत्ता का लगे श्रीरामपुर में सन 1859 में स्कॉटलैंड के एगो बैपारी जार्ज ऑकलैंड शुरू कइलन. आ 1939 तक जूट मिल के संख्या बढ़ि के 105 हो गइल रहे. बाद में ई संख्या बढ़त गइल.

चटकल काहें कहाउ? जवना कल में चट (बोरा) बनेला ऊहे चटकल ह. आजकाल चटकल कम बाड़े सन. देस के जब बंटवारा भइल त 70 फीसद जूट उपजावे वाली जमीन पाकिस्तान में चलि गइल. फेरू सन 1971 में पाकिस्तान के बंटवारा हो गइल, त जूट उत्पादन वाली जमीन बांग्लादेश में आ गइल. अब त कलकत्ता आ आसपास के कई गो चटकल बंद बाड़े सन. जूट मिलन के हालत ठीक नइखे. नतीजा ई भइल कि प्लास्टिक के सूत वाला बोरा बाजार में भरल बाड़े सन. चटकल के अलावा भोजपुरिहा लोग कलकत्ता के कपड़ा मिल में भी नौकरी करत रहे लोग. सैकड़न गो कपड़ा मिल रहली सन. बिड़ला से लेके मध्यम उद्योगपति तक के कपड़ा मिल रहे. अब त कपड़ा कीने के रेवाज नइखे, रेडीमेड शर्ट- पैंट बेसी चल ता. त नोकरियो कम हो गइली सन.



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आ सहिये बात बा. कलकत्ता के कौनो कोना- अंतरा में चलि जाईं, रउवां जरूर सुने के मिली- “का जी का हाल बा?” त जबाबो तुरंत मिली- “ऊपर वाला के किरपा बा. आपन सुनाईं?” कोलकाता के  भोजपुरिहा लोग हृदय प्रधान होला. रउवां से मन मिलि गइल त रउवां खातिर जानो दे दिलो. आ मन फाटि गइल त रउवां के? आ हम के? हालांकि अब पुराना जमाना वाला प्रेम नइखे रहि गइल. लेकिन अबहिंयो प्रेमभाव के अकाल नइखे. कतनो मशीनी जिंदगी होखे, अपनापन आ सरोकार एक- दूसरा से जोड़ले बा.

कोलकाता के भोजपुरिया समाज तीज- त्यौहार में अपना परंपरा के निभावे में तनिको कसर ना छोड़े ला. मकर संक्रांति पर जहां बंगाली परिवारन में पीठे, पुली आ खीर बनेला तो हमनी के भोजपुरिया समाज में तिलकुट, तिलवा, खिचड़ी- चोखा, चटनी आ अचार के तृप्तिकारक भोजन होला. होली पर बंगाली समाज में मालपुआ बनेला त भोजपुरी समाज में पुआ- पूड़ी आ गरम मसाला के सुखकारी सुगंध वाली सब्जी आकर्षित करेले.

आ दीपावली पर त बंगाली समाज होखे चाहे भोजपुरी समाज, सभे तरह- तरह के मिठाई से तृप्त होला. छठ पर्व भोजपुरिया समाज के खास बनावेला. एह मौका पर बने वाला ठेकुआ के बंगाली समाज में एतना प्रतिष्ठा बा कि कहीं मत. छठ के समय कतने बंगाली मित्र शिकायत करत मिल जइहें कि उनका के ठेकुआ ना मिलल. पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ममता बनर्जी त सार्वजनिक मंच से कहली कि उनुका ठेकुआ बहुते पसंद बा. कतने लोग कहल कि ई बात ममता दीदी हिंदी समाज से जुड़े खातिर कहली ह. बाकिर अधिकांश लोग कहल कि ठेकुआ के तारीफ अतिश्योक्ति ना ह. ठेकुआ अइसन चीजे ह.

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आ सांस्कृतिक रूप से भी भोजपुरिहा लोग आगा बा. पहिले जगह- जगह गवनई होखत रहल ह. लेकिन अब गवनई के रेवाज कम होता. तबो कवनो ना कवनो बहाने जुटान क लेला लो. भोजपुरिहा भाई लोगन से हमार एगो आग्रह रहेला कि स्थानीय स्तर पर साल में एगो भोजपुरी सम्मेलन के आयोजन होखे के चाहीं. सब जुटे, आपसी प्रेम- भाव, सहयोग आ समाज खातिर कुछ करेके योजना बने.

भोजभात होखे आ फेर कौनो सांस्कृतिक कार्यक्रम होखे, जवना में भोजपुरिहा प्रतिभा के लोग हिस्सा लेसु. एह काम में तनी जोर लगावे के परी. भोजपुरिया समाज के भीतर अभी एह काम खातिर ओतना तेजी नइखे लउकत. हालांकि सामाजिक रूप से भोजपुरिया समाज बहुत सक्रिय रहेला. बाकिर सब भोजपुरिया भाई लोगन के जुटान ना हो पावेला.

साहित्यिक गतिविधि में भी भोजपुरिहा लोगन के बहुत योगदान बा. भोजपुरी माटी, भोजपुरी संकल्प, संझवत वगैरह पत्रिका एकर सबूत बाड़ी सन. ई संयोगे बा कि ई कुल पत्रिका अभी बंद बाड़ी सन. लेकिन भोजपुरी लेखन में निरंतरता बा, जीवंतता बा आ बहुते उत्साह बा. एक हाली त बैरकपुर में भोजपुरिया समाज के लोग भोजपुरी नाटक के प्लान बना दिहल. उत्साह से भरल नौजवान तेयारो रहले. बाकिर का जाने काहें, ई कार्यक्रम संपन्न ना हो पावल. बाकिर ओसे प्रेरणा ले के, भोजपुरिहा समाज अबहिंयो एह विषय पर प्रेम से बातचीत करेला.

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पश्चिम बंगाल में आर्थिक क्षेत्र में भोजपुरिया समाज के बहुते योगदान बा. एकहाली तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु कहले रहले कि भोजपुरी समाज के प्रदेश में अकल्पनीय वित्तीय योगदान बा. खोमचा से लेके बड़े- बड़े होटल तक के व्यवसाय, आढ़त से लेके शेयर बाजार तक के व्यवसाय में भोजपुरिया समाज के लोग सफलता के झंडा गड़ले बा. एही से बंगाली समाज में ई धारणा मजबूत बा कि भोजपुरिहा लोग मेहनती, ईमानदार आ बात के पक्का होला. भोजपुरिहा लोग रिस्ता निभावे के हाल जानेला. चाहे ऊ व्यक्तिगत जीवन होखे चाहे व्यवसाय. एह समाज के लोग आपन गरिमा बना के राखेला. पश्चिम बंगाल में भोजपुरिया समाज के लोग एक- दूसरा से अउरी ज्यादा जुड़ो आ एगो सार्थक सामाजिक संगठन बनो, ई सब चाहता. देखीं के आगे आवता.

सभे कहेला कि भोजपुरी मीठ भाषा ह. कुछ लोग भोजपुरी के अश्लील गीतन के ओर भी इशारा करेला. बाकिर अब जागरूकता बढ़ल जाता. जाहिर बा अश्लील गीत गिनल- चुनल लोगन के कारण बा. बाकिर ऊ खतम होखबे करी.  अश्लीलता के आयु ढेर दिन ना ह. अश्लील गीतन पर लगाम कसबे करी. आ ओकरा जगह पर मधुर, पवित्र गीतन के जन्म होखबे करी. काहे से कि प्रेम अश्लील ना होला. भावना अश्लील होखेले. ओही भावना के उदात्त बनावे के जरूरत बा.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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