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Bhojpuri: कातिक बात कहातिक, अगहन हांड़ी अदहन...

Bhojpuri: कातिक बात कहातिक, अगहन हांड़ी अदहन...

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आपन देश जलवायु प्रधान ह. इहाँ जनता मौसम की संग्हे चलेले, जियेले, खाले. मौसम की संग्हे चलके ओकर अजोरिया-अन्हरिया होले. दिन-रात होखेला. छोट-बड़ दिन होला. रतियो छोट-बड़ होखेले. लेकिन जवना समय में आज मतीन तकनीक ना रहे ओह समय में इ अजोरिया-अन्हरिया आउर छोट-बड़ क पता कईसे चलल होई, इ बहुत गंभीर बात ह. एकरा ठीक से जाने खातिन आप के ओह समाज के समझे के परी जहाँ खीसा-कहनी, बुझनी क समाज ह आउर ओही की माध्यम से अपना जीवन आगे बढ़ावत रहल हवे. आजो प्रकृति जीवी समाज ओही रस्ता पर चलत बा.

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आप देखब कि चढ़ते कातिक दिन क दशा बदल जाले. एह महीना में दिन छोट होखे शुरू हो जाला. वोयिसे त इ महीना बहुत भीड़ वाला होला. कटिया, बिनिया, बोवनी आउर सोहनी जईसन खेती-किसानी क काम जोर पर रहेला. लेकिन इ इतना मजेदार बात ह कि केहू जल्दी ना समझी. येह समय जईसे काम ढेर होला, वोइसहीं खीसा/कहावत भी खूब बनेले. अईसन लगेला कि जेतना काम ओतना खीसा, ओतने कहावत. येह समाज में हर अदमी आपन अनुभव बढ़िया तरीके से सब जगह फयिलावत रहेला.

अब आयीं, खीसा-कहावत की तरफ बढ़ल जाव. कातिक महीना की बाद बारिश थम जाले आउर अगली फसल क तइयारी होखे लागेले. येही तईयारी क समय मौसम में जवन बदलाव आवेला, उ एगो खास नछत्तर की कारण आवेला. वोह नछत्तर की बारे में एगो कहावत हिय, “सेवाती जौ, बिसाती भूसा”. पहिले तनी येह नछत्तर की बारे में जान लेहीं. कातिक चढ़ते सेवाती नछत्तर चढ़ जाले. एही नछत्तर में ‘जौ’ बोवल जाला. लेकिन जब सेवाती नछत्तर बरिश देले त जौ क बीज दबा जाला आउर फसल बीरर हो जाले. जब बीरर हो जाई त भूसा कम होबे करी. एसे ओह नछत्तर की बारे में इहो कहल जाला कि ‘बिसाती सवालाख मन क एगो कवर बनावे ले’. मतलब की जब बरिश होले त पूरा इलाका में जहाँ सवा लाख मन पैदा होत रहेला, उहाँ एतना कम हो जाला कि एक कवर बन जाला.

जब आज मतीन तकनीक ना आईल रहे त लोग अपनी खाली समय क उपयोग कविता/कहनी निर्माण में करें. अनाज की भंडार से लेके शब्द भंडार तक बढ़वले क काम लोग खाली समय में करें. तब सूझ-बूझ क बहुत महत्व रहे. लोग कुछऊ करें त ओकरा के नाप जोख के करें. लोग एतना सावधान रहें कि अपनी बानी से केहू के तकलीफ ना होखे देवें. उनहन लोगन की पास हर चीज क नपना रहे. नाप के बोलल-बतियावल, चलल, खायल-खियावल, समय बतावल कुल होखे. नपना उनहन लोगन क आपन रहे. ओह समय में लोग खुदे बनावें आउर सबके सुनावें.

सबसे बढ़िया नपना दिन महीना क ह. आपन देश बारहमासा वाला देश ह. इ समझीं की मौसम की अनुसार दिन रात होखेले. जईसे की कबो दिन बड़ होला, कबो छोट होखेला. आज त तकनीक इ बता देवेले कि दिन कब होई आउर रात कब होई. सुरुज भगवान कब उगिहन आउर कब डूबीहन. लेकिन जब इ तकनीक ना रहे त लोग कहावत कह के दिन आउर रात नाप लेत रहलन. आउर उनहन लोगन क नपना देखब त विश्वास ना होई. उ एतना बढ़िया ह कि आजो कारगर ह. लोग एतना सही बनवले हवन कि काम, घटना, वस्तु और समय सब एक-दूसरे से मिळत रही.

महीना के नापे वाली एगो कहावत हिय. कहल जाला कि ‘कातिक बात कहातिक’. इ बात दूगो कारण से कहल जाले. एगो त इ कि ढेर बोले वालन क पेट कातिक में ना भरेला. दिन छोट हो जाला आउर एक-दू लोगन से बतियावे में दिन ख़तम. ढेर बोले वालन क मामला तवा जाला. दूसर बात इ ह कि काम करे वाला मनई ढेर परशान रहेलन. काम ज्यादा आउर दिन छोट हो जाला. एही कहल जाला की ‘कातिक में दू लोगन से बतियावा त दिन ओरा जाई’.

अगहन में दिन क हालत अईसन हो जाले कि चूल्हा पर हाड़ी में अदहन रखीं, अदहन गरम होखेला तबले दिन खतम. दिन एतना छोट हो जाला कि एक बार खाना बनल, खायल गयल तबले केहू मेहमान आ गयल त ओकरा खातिन खाना फिर से बनावे के परल आउर ओतने में दिन खतम हो गयल.

पूस के त कंटूस कहल जाला. एह महीना में खेत में साग-पात खूब होखेला. हरियर साग और चटनी खाए वालन क खूब छकल रहेले. भोजपुरी पट्टी में त नया चाउर क भात आउर धनिया, चन्ना आउर डाटी वाला लहसुन क चटनी खाय के सब छक जालन. इकुल चीज अईसन रहे कि लोग खूब खायं आउर बेमारी से दूर रहें. आज जब तमाम रोग-बियाद फयिलत ह तब ओह अनुभव के खोजल जात ह जवन अदमी क आदमियत बनवले रहे. आज अदमी अपन आदमियत आउर सेहत, दुनो ख़राब करत ह.

पूस में दिन एतना छोट होखे लागेला कि लोग सागपात बने ला, लोग खालें तबले दिन ख़तम हो जाला. अब मूल इ ह कि दिन खतम होय चाहे रात खतम होय, श्रमिक क काम ना खतम होला. एही काम आउर खेती-किसानी के बिच्चे में उ गवनई क समय निकाल लेनन जा. इ जेतना कहावत खीसा आप देखत हईं, सब उनहन लोगन की रचनात्मक प्रतिभा आउर सुन्दर कल्पना शक्ति क कमाल ह.

अब एकर एगो आउर पहलू बतावत हईं. इ जवन कुल लिखल गयल ह उ खाली गाना ना हौ. एमे जीवन घुलल ह. जईसे कि कवनो कहावत सुनी आउर ओकरा के जीवन से जोड़ के देखब त लागी कि कवनों सामाजिक विज्ञान क खोजबीन क के कविता लिखल बा. अईसन ह कि इ जवन गवईं अदमी क समाजशास्त्र ह ओकर कहीं पढ़ाई ना होखत बल्कि इ अनुभव पर आधारित ह. आदमी प्रकृति की संग्हे जेतना जिए ला ओतना अनुभव हासिल करेला आउर फिर जब लिखेला त उ बात ओतने गहरी होखे ले.
आज समय अईसन ह की इकुल तरीका ना अजमवले की कारन गायब होत जात बा. खाना, पानी, खेती आदि आदि क बहुत कुछ मामला अइसन ह कवनो मनई ओकरा से दूर ना ह. अब एके अयिसहीं समझले आउर जनले क जरूरत है.

(डॉ. रामाशंकर कुशवाहा वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

Tags: Bhojpuri Articles, Bhojpuri News

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