भोजपुरी में पढ़े - भोजपुरी के नस-नस से बहेला रसवन के धार

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अगर कहल जाउ कि केहे के जिनगी में माई आ ओकर आपन बोली जवना के मातृभाषा कहल जाला एकर सबका ले बड़ महत्व होला.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 21, 2021, 2:00 PM IST
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आजु अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस ह. एह मोका पर हमनीं के आपन मातृभाषा भोजपुरी के इयादि आइल स्वाभाविक बा. ओइसे जब कागज-पत्तर, आधिकारिक दस्तावेज में जरूरत पड़ेला, भोजपुरीभाषी लोग मातृभाषा के खाना में भोजपुरी के जगह हिंदी दर्ज करावे ला. हिंदी से भोजपुरी के कवनो विरोध नइखे. ऊ त एकतरी से हिंदी के छोट बहिनिए ह. एह नाता से भोजपुरी भाषी लोगन के हिंदी माई के भाषो ले बढ़ि के बिया. भोजपुरिया समाज जवन जीवन मूल्य लेकर जिएला, ओह में माई चाहे जाया होखे भा ना, दूध पियवले बिया भा ना, ऊ माइए होले. भोजपुरिया मनई खुलेआम कहेला, स्वीकारेला कि माई के बंटवारा ना हो सकेला.

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हिंदी में कुछु साल से एगो आंदोलन चलता. ओकर तर्क बा कि अगर हिंदी के बोली-बानी संविधान के आठवीं सूची के नाम पर अलग होत चलि जइहें त हिंदी के कमर टूटि जाई. एह आंदोलन के अगुआई करे वाला विद्वानन के तर्क बा कि एह वजह से हिंदी के बोलियन के अलग-अलग संवैधानिक मान्यता ना मिले के चाहीं. ई सवाल कुछु साल पहिले हिंदी के मसहूर ललितनिबंधकार आ भोजपुरी माटी के सपूत आ भोजपुरी समाज के जेठ मनईं कृष्ण बिहारी मिसिर जी के सामने आइल त उनुकर कहनाम रहे कि अगर हिंदी के कमर एतने कमजोर बा कि दू-चार गो बोलियन के संवैधानिक मान्यता दिहला से टूटि जाई त अइसन कमर के टूटिए जाए के चाहीं. उनुका एह कहनाम के लेके खूबे विवाद भइल रहे.

ई ठीक बा कि हिंदी ओइसन भाषा नइखे, जइसन बांग्ला बिया भा गुजराती भा मराठी. ओइसन ठोस आ छोटहन खानी ओकर इलाको नइखे. विद्वानो लोग मानेला कि हिंदी असलियत में कई गो बोलियन-भाषा के समुच्चय ह. ई बात के गांधीजी के सहयोगी आ प्रखर पत्रकार बनारसी दास चतुर्वेदी गहराई से समझत रहले. तबे ऊ जनपदीय भाषा आंदोलन चलवले रहले. उनुकर मान्यता रहे कि हिंदी के बोलिया विकसित होइहें स, उहनीं में बढ़िया काम होई तो ओकर फायदा हिंदियो के मिली आ हिंदी आगे बढ़ी. अफसोस के बात बा कि हिंदी के कमर मजबूत करे वाला लोगन के धेयान में ई बात नइखे.
ओइसे हमनीं के जाने के चाहीं कि आखिर 21 फरवरी के दिने अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा काहें मनावल जाला. एकर इतिहास रऊंआ जानबि त समझबि कि माई वाली, माई के दूध वाली भाषा के का मतलब होला. एही दिने 1952 में तब के पूरबी पाकिस्तान आ अब के बांग्लादेश में आपन आधिकारिक भाषा के मांग के लेके नौजवान लोग ढाका में प्रदर्शन कइले रहले. ओह घरी पाकिस्तान के शासन में पश्चिमी हिस्सा वाला लोगन के वर्चस्व रहे. उहन लोग उर्दू के राजभाषा बनावे पर अड़ल रहे. जेकर पूरबी इलाका के लोग विरोध करत रहे. पाकिस्तान के पश्चिमी हिस्सा वाला के शासक लोगन के लागत रहे कि चूंकि दूनों ओरि के जनसंख्या में मुसलमान लोगन के बहुमत बा, त ऊ लोग उर्दू के राजभाषा मानि लिहें. जवना के विरोध में पूरबी बंगाल के लोग सड़कि पर उतरि अइले. चूंकि ई मामला पूरबी बंगाल के लोगन के भावना से जुड़ल रहे, बांग्ला भाषा के मांग तूल पकड़ि लिहलसि. ई पाकिस्तानी शासक लोग के ना पचल आ गोली चलवा दिहले. जवना में कई गो छात्र मरइले. कहल जा सकेला कि ओहि दिने पाकिस्तान के बंटवारा के नेंव पड़ि गइल रहे, जवन 19 साल बाद पूरा हो गइल. ओकरा जरि में आपन माई के भाषा के मांग रहे. बहरहाल आपाना सहीद सपूतन के इयादि में तब से हर साल 21 फरवरी के पूरबी पाकिस्तान में मातृभाषा दिवस मनावल शुरू भइल. बांग्लादेश बनला के बाद एह दिन के बाकायदा छुट्टी के ऐलान भइल, तब से हर साल 21 फरवरी के बांग्लादेश में छुट्टी होला.

बांग्लाभाषा खातिर शहीद भइल नौजवानन के 16 मई 2007 के दिने संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासभा अगिला साल यानी 2008 के मातृभाषा साल के रूप में मनावे के प्रस्ताव पास कइलसि. एही के संगे 21 फरवरी के मातृभाषा दिवस के रूप में मनावे के घोषणा भइल. एह के संगे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर माई के दूध संगे मिले मिसिरी नियर सहजे मिले वाली मातृभाषा के सम्मान देबे के शुरूआत भइल.

दुनियाभर के शिक्षाशास्त्री मानेला लोग कि बच्चा सबसे बढ़िया से माई के भाषा में मिले वाली शिक्षा से सीखेला. आपाना देश में त अंग्रेजन के शासन आवे से पहिले तकले माई के भाषा में ही शुरूआती शिक्षा देबे के वेवस्था रहे. लेकिन आपाना खातिर व्यापक स्तर पर बाबू तैयार करे खातिर अंग्रेज दूध-मिसिरी नियर सहजे मिले वाली माई के भाषा में मिले वाली शिक्षा वेवस्था के तहस-नहस कई दिहले स. आजादी के आंदोलन के दौरान एहू मसला पर महात्मा गांधी, मदन मोहन मालवीय आ गुरूदेव रवींद्र नाथ टैगोर जइसन हस्ती विचार कइले रहलन. उहन लोग के सोच रहे कि आजाद भारत में कम से कम शुरूआती, जवना के प्राथमिक शिक्षा कहल जाला, ऊ माई के भाषा में दियाई. बाकिर ई काम सही माने में जमीन पर ना उतरि पइलसि.



ई साल जनगणना के साल ह. कोरोना के चलते एह में देरी हो गइल बा, नाहीं त अबले ई काम आखिरी चरण में रहित. संविधान के आठवीं अनुसूची में भोजपुरी के शामिल करावे खातिर जे लोग कोशिश कइ रहल बा, उनुकर भोजपुरिया लोगन के सुझाव बा कि जनगणना के कालम में भोजपुरी के आपन मातृभाषा के रूप में दर्ज कराईं. उहन लोगन के तर्क बा कि एह से आखिरी गिनती में भोजपुरिया लोगन के संख्या बढ़ि जाइ त सरकार पर ओकरा के आठवीं अनुसूची में डाले खातिर दबाव बढ़ी. भोजपुरिया लोगन के एह कोसिस के हिंदी समर्थक लोगन के आपन विरोधी ना माने के चाहीं. उहन लोग के समझे के चाहीं कि भोजपुरी हिंदिए के छोटकी बहिन ह आ ओकरा ओइसहिं लाड़-दुलार के जरूरत बा, जइसे हर परिवार में बुची-बबुआ के अपने आपे मिलेला. एकरा खातिर अलगा के कवनो कोसिस ना करे के परेला.

भोजपुरिया लोग चाहे जवन भाषा के माध्यम से पढ़ले होखसु लोग, उहन लोग के मन में जब भी कवनो मौलिक विचार उपजेला, ऊ भोजपुरिए में होला. बाद में ऊ लोग मन ही मने हिंदी, चाहे अंग्रेजी में ओकर अनुवाद करेला लोग. कहे के मतलब साफ बा कि भोजपुरीभाषी लोगन के मौलिक विचार के जरिया इहे बिया. अइसे में का हमनी के दायित्व नइखे बनत कि एकरा खातिर आगे बढ़ीं जा आ ओकर सम्मान बढ़ाईं जा. भोजपुरी के बारे में आखिर में भगवती प्रसाद द्विवेदी के एगो कविता यादि आवतिया. एकर मिठास पर उ गजबे लिखले बाड़े,

भोजपुरी तोहार, भोजपुरी हमार

एकरा नस-नस से बहेला,

रसवन के धार.


जवन भाषा अपने आपे में रसधार के दोसर नांव बिया, ऊ भला केहू के विरोधी कइसे हो सकेली. उ सहयोगिए रही, छोट बहिनिए रही. संविधान के आठवीं अनुसूची में सामिल होई त एकर राजकीय विकास के दबाव बढ़ी, जवना से खाली भोजपुरिया लोगने के ना, हिंदियो के फायदा होई. ( उमेश चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं.)
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