होम /न्यूज /bhojpuri-news /Bhojpuri में पढ़ें- बतकही भा बतकूचन कइल एगो कला ह

Bhojpuri में पढ़ें- बतकही भा बतकूचन कइल एगो कला ह

.

.

कहल जाला कि बतियावल, बतकही भा बतकूचन कइल एगो कला ह. अइसन लोग बात गढ़े में माहिर होला. फेरु त अइसन मनई के बतकूचन देखते-स ...अधिक पढ़ें

  • News18Hindi
  • Last Updated :

बतकही-बतकूचन
बाते से हाथी पा जाईं
हाथी-पांव तले रउनाईं!
आजुकाल्हु अकसरहां ई बात कहल जाला कि वाद-विवाद ना, संवाद होखे के चाहीं. माने, बतकही भा बतकूचन होत रहो. भलहीं अपना मन के बात होखो भा दोसरा के मन के. केहू बात कढ़ावेला, केहू बात बढ़ावेला, त केहू बात पचावेला. का मजाल कि ऊ कवनो राज़ के बात दोसरा का सोझा खुलासा कऽ देउ! दोसरा ओरि, अइसनो लोग होला, जेकरा पेट के पानी भलहीं पचि जाउ,बाकिर बात ना पची. सुनत कहीं कि ऊ बात ओकरा सोझा जाके उगिल दी,जेकरा खिलाफ में कवनो बात कहाइल होखे.

कहल जाला कि बतियावल, बतकही भा बतकूचन कइल एगो कला ह. अइसन लोग बात गढ़े में माहिर होला. फेरु त अइसन मनई के बतकूचन देखते-सुनते बनेला. जइसे गहना पहिरेली मए जनाना,बाकिर झमकावे केहुए-केहू के आवेला,ओइसहीं बतिआवेला त सभे,बाकिर बात बनावे केहुए-केहू के आवेला. लेकिन बात गढ़ल घासि गढ़ल ना ह. घासि गढ़ला से उहवां के जमीन चिक्कन हो जाला, बाकिर बात गढ़ला से कबो-कबो काम रूखर हो जाला. केहू चतुर-सुजान अपना बतकही से बिगड़लो काम बना देला,उहंवें अइसनो मानुस मिलिहन,जे दाल-भात में मूसरचंद लेखा आ धमकिहन आ एह किसिम के बतकही छेड़ि दिहन कि बनलो काम बिगड़ि जाई.

कहल जाला कि बात बढ़वला से बढ़ेला आ बात के बतंगड़ बनत देरी ना लागे. फेरु त फुंसरी के भकंदर बनत आ राई के पहाड़ बनत देखनिहारन के धरनिहार लागि जाला. केहू खुरछाही बोलिके आगि में घीव झोंकेला,पानी में आगि लगावेला,त केहू बाते से अगियाबैताल बनल दिल-दिमाग के ठंढक पहुंचावेला. तबे नू लोग बतकहिए कऽके जरला पर नून दरेला आ डेगे-डेग छोट-बड़ महाभारत के कारन बनेला. अगर दुरजोधन खातिर ‘आन्हर के औलाद आन्हर’ ना कहाइल रहित,त का महाभारत होइत?

साहित्य के उर्दू, अरबी आ फारसी में अदब कहल जाला,जवना के मतलब होला-सलीका. एकरे के भोजपुरी में सहूर कहाला. माने,साहित्य अपना आत्मा भा पढ़निहारन का संगें कइल बतकहिए नू ह,जवन जिनिगी जीए के सलीका, सहूर सिखावेला. एगो शायर के कहनाम बा-

बात चाहे बेसलीका हो मगर
बात कहने का सलीका चाहिए.

जदी बेसलीका भा उटपटांगो बात कहे के चाहत बानीं,तबो ओकरा के सहूर,सलीका, हुनर होखे के चाहीं. कोशिश करीं कि सांपो मरि जाउ आ लाठिओ ना टूटे! अगर आंतर के सुकून देबेवाला मजेदार बतकही करत बानीं,त अगिला खुश हो जाई आ दुसमनो के संघतिया बना ली,बाकिर जदी जरल-कटल बात दिल में पइसि जाई,त अगिला मूवे-मारे प उतारू हो जाई. पुराना जबाना में जब राजशाही रहे,त राजा बतकही प खुश होके हाथी-घोड़ा आ सोना-चानी इनाम में दे देत रहलन आ अगर केहू के बात जबून लागत रहे, त ओकरा के हाथी से कचरवाके मुवा देत रहलन. तबे ई कहाउत बनल-बातन हाथी पाइए,बातन हाथी पांव! माने-

बाते से हाथी पा जाईं
हाथी-पांव तले रउनाईं!

एही से कहल जाला कि सइ गो बकबकाए वाला के एगो चुप्पा हरा देला. सभसे असरदार बतकही मानल गइल बा चुप्पी साधे वाला के. ऊ गूंग ना होला. ओकरा मन के बात के अंटकर लगावल मोसकिल होला. भीतर का चलि रहल बा, थाह ना लगावल जा सके.

बाकिर एकर मतलब ई ना भइल कि किछु बोलले-बतिआवल ना जाउ. बोलल-बतिआवल जरूर जाउ,मगर तउल-तउल के. ना ढेर बोलले नीमन, ना ढेर गुम्मी सधलके नीमन. सम्हरि-सम्हरि के बोलीं. अइसन बोली, जइसन कबीर दास जी लिखले बानीं-

ऐसी बानी बोलिए मन का आपा खोय
औरन को सीतल करे,आपहुं सीतल होय.

अइसन मीठ बानी-बोली,जवन दोसरा के मन के त ठंढक पहुंचइबे करे,अपनो आंतर के सीतल बना देउ. बाकिर एकर मतलब ई ना कि केहू कतनो अनेति करो,रउआ मीठ बोलत रहीं. ‘शठे शाठ्यम् समाचरेत’ के सूक्ति एही मोका खातिर लिखाइल बा. दोसरा अरथ में मिठबोलिया घातको होलन स-पीठ में छुरा भोंकेके दियानत राखेवाला.
मुंह प मीठ बतकही कऽके दिल जीते वाला आ सुना में दोसरा से सिकाइत करेवाला! अइसने मिठबोलिया के दुमुंहा सांप कहल जाला-

परोक्षे कार्य हंतारम्,प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्
वर्जएतादृशम् मित्रम्,विषकुंभम् पयोमुखम्.

मतलब,सुना में काम के बिगाड़ेवाला आ सोझा रुचेवाली बात बोलेवाला दोस्त के ओइसहीं तियागि देबे के चाहीं,जइसे दूध से भरल मुंह पर जहर वाली गगरी के छोड़ि दिहल जाला.

नीमन भा बाउर बतकही मुंह से निकलेला आ जीभि से बोलल जाला. एही मुंह से पानो खाइल जाला आ एही मुंह प जूतो बरिसेला. मुंहें से नीमन-नीमन मजेदार बतकूचन होला आ मुंहें से गारिओ फजीहत निकलेला. जीभि त बोलिके मुंह का भितरी ढूकत लुका जाले,बाकिर ओकर नतीजा मुंह आ कपार का सिरे बितेला,जब सोझा वाला दबंग होला. अब्दुर्रहीम खानखाना ठीके लिखि गइल बाड़न-

रहिमन जिह्वा बावरी, कह गई सरग पताल
अपने कहि भीतर गई,जूता खाय कपाल.

बतकूचन करेवाला लोग एक से बढ़िके एक मिलिहन. उन्हुका बात के ओर-छोर बुझइबे ना करी. बोले लगिहन,त धाराप्रवाह नाॅनस्टाप बोलते चलि जइहन. ‘साड़ी बीच नारी है कि नारी बीच साड़ी है,नारी ही की साड़ी है कि साड़ी ही की नारी है’-नियर उन्हुकर बतकही ओरइबे ना करी. बाकिर ऊ का कहल चाहत बाड़न,एकरो थाह लगावल कठिन बा. आपन कहल या त ऊ खुदे समुझिहन भा खुदा समुझिहन! सुनेवाला हारि-थाकिके उबिया जइहन,बाकिर बतकही के बंवर बढ़ले चलि जाई-हती मुकी गाजी मियां, अतहत पोंछि!
हरि अनंत हरि कथा अनंता लेखा. अब पानी में हाथ डालिके अनंतफल ढूंढ़त रहीं!
एही से कबीर के सोझ-साफ बानी रहे-

अति का भला न बोलना,अति की भली न चूप
अति का भला न गर्जना,अति की भली न धूप.

माने,अति सर्वत्र वर्जयेत. बाकिर अतिवादी लोग कहां मानेवाला बा! एक जाना लगले बतकही झारे-एगो अचूक निशानेबाज बनूक से अइसन निसाना साधिके गोली दगलस कि गोली बाघ के पंजा में छेद करत ओकरा आंखि में जाके धंसि गइल. सुनेवाला के बिसवास ना भइल-भला ई कइसे हो सकेला? बाकिर बतकूचन करेवाला के जवाब हाजिर रहे-आरे मरदे!ओह घरी बघवा अपना पंजा से आंखि नू सुहुरावत रहे!

एही तरी, ऊ एगो राजा के बात बतावे लगलन, जेकरा नया-नया श्लोक सुने के सवख रहे,बाकिर मुफुत में.ऊ अशर्फी देबे के घोषणा त कइलन,बाकिर ओइसन श्लोक खातिर, जवना के केहू कबो सुनले ना होखे,बाकिर ऊ दूगो अइसन दिमागी पंडित रखले रहलन कि पहिलका के एके हाली सुनला पर आ दोसरका के दू दफा सुनला पर कवनो श्लोक इयादि हो जात रहे.फेरु त नया से नया श्लोक जब कवनो विद्वान सुनावे,त पहिलका पंडित बोले-ई त हम बहुत पहिले सुनले रहलीं आ ऊ श्लोक हूबहू सुना देसु.ओकरा बाद दोसरको पंडित के श्लोक इयादि हो जात रहे आ आ ऊहो सुना देसु. आजिज आके एगो कि अइसन श्लोक सुनवलन कि दूनों पंडित सोचते रहि गइलन आ ऊ विद्वान भरपूर इनाम पवले.श्लोक के भाव ई रहे कि राजा के बाबा हमरा बाबा से पांच सइ अशर्फी उधार लिहलन,बाकिर आजु ले ऊ करजा नइखे चुकावल गइल. ई बात अगर सांच बा,त करजा चुकावल जाउ आ जदी ई नया बा,त इनाम दिहल जाउ! फेरु त राजा उन्हुका मनगढ़ंत बतकही प खुश हो गइलन आ भरपूर इनाम दिहलन.

मौजूदा दौर में बतबनउवा लोगन के बड़ा इज्जत बा. बात बनाईं आ नांव-जश कमाईं! कथनी आ करनी में जमीन-आसमान के फरक राखीं. बात बनाके चुनाव जीतीं आ जनता -जनार्दन के चूना लगाईं! ओढ़ना-डासन बाते के बनाईं आ चैन से कुंभकर्णी नींन लेत खर्राटा लगाईं! मीठ बोलत रहीं आ लोकतांत्रिक लाठी भांजत रहीं,’ईट,ड्रिंक, बी मैरी’ के मीठ नींन सुताके आस्ते-आस्ते गरदन रेतत रहीं,सरगसुख के सतरंगी सपना देखावत रहीं. तुलसी बाबा के कहनाम इयादि राखीं-

मुखिया मुख सो चाहिए, खानपान को एक,
पाले -पोसे सकल अंग, तुलसी सहित विवेक.

ई विवेक कइसे आई?खाली बतकही से?बतकूचन से? जमीनी हकीकत के पड़ताल से?आकि अंतरात्मा के पुकार से?
बहरहाल, जब ई बात चलल बा, त ई ढेर देरी ले आंतर के उदबेगत रही आ बहुत दूर ले जाई. ओइसे, कठोर बतकही कइला से मुंह में के दांत नियर असमय झरि जाए के परी.वशीभूत करेवाला मंतर त मिठबोलिया बनला में आ मीठ बतकही कऽके दिल जितला में बा.

तुलसी मीठे वचन से सुख उपजत चहुंओर,
वशीकरण एक मंत्र है, तजि दे वचन कठोर.
बाकिर तनी सम्हरिके! ढेर मीठ बतकही कतहीं चिनिया रोग(डायबिटीज) के शिकार बनावत भितरे-भीतर खोंखड़ मत बना देउ! एह से,हरना समझि-समझि वन चरना,वन से डरिके रहना ना!

(भगवती प्रसाद द्विवेदी स्वतंत्र पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

Tags: Article in Bhojpuri, Bhojpuri

विज्ञापन

टॉप स्टोरीज

अधिक पढ़ें