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Bhojpuri में पढ़ें- बलम कलकत्ता पहुंचि गए

Bhojpuri में पढ़ें- बलम कलकत्ता पहुंचि गए

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फिल्म “जौहर महमूद इन हांगकांग” (सन 1971) में इंदीवर के लिखल गीत- “लागा लागा झुलनिया के धक्का, बलम कलकत्ता पहुंचि गए”- रोजगार खातिर कलकतिया बनल लोगन खातिर भिन्न अर्थ वाला रहे. थोरहीं दिन के बियाह का बाद पत्नी के सुकुआर प्रेम छोड़ि के जीविका खातिर पलायन पर केंद्रित ई गीत भले फिल्म में मनोरंजन गीत बा, बाकिर एकरा में एगो कसक भी बा.

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एगो जमाना में कलकत्ता में कल- कारखाना भरल रहले सन. सन 1911 ले त देश के राजधानी कलकत्ते रहे. त पुरबिहा लोग नोकरी खातिर कलकत्ते आवसु. झुलनिया के धक्का के असली अर्थ ई कि पति के कमाई के साधन कुछ ना रहे आ बियाह हो गइल. अब पत्नी के प्रेम का संगे उलाहना भी मिले लागल कि कुछ कमाईं- धमाईं. खाली प्रेम कइला से पेट ना भरी. जीवन ना चली. बाप- महतारी समुझावे त पति के नीक ना लागे. बाकिर जब पत्नी प्रेम से ओतप्रोत ओरहन देके बार- बार कहली कि “पइसा ना रही त रउरा के केहू ना पूछी”  त मन झनझना गइल. लागल कि कमाइल बहुत जरूरी बा.

तुरंते “बलम” रेलगाड़ी पकड़ि के कलकत्ता पहुंचि गइले आ नोकरी खोजि के मनले. त ई झुलनिया के धक्का, ढेर लोगन के आदमी बना दिहलस. कलकत्ता आके छोट- मोट बिजनेस कके धनी- मानी हो गइल लोग. कुछ लोग गांवे में बढ़िया संपत्ति क लीहल. बाकिर कुछ लोग छूंछ के छूंछे रहि गइल. जौन कमाइल तौन खा- पीके साफ. कुल कमाई पेटे में चलि गइल.

अब एगो अउरी नीमन प्रसंग सुनीं. पुरबिहा इलाका के कुछ लोग कलकत्ता में दरवान के नोकरी करे. एक जाना दरवान साहेब हमरो जिला के रहले. त एक दिन हम भेंट करे गइनीं. खाकी रंग के ड्रेस पहिनले आपन मूंछ अंइठत कंपनी का गेट पर पहरा देत रहले. हम आपन परिचय दिहनी कि फलाना जिला घर ह आ फलाना के घर के हईं. दरवान जी तुरंते चीन्हि गइले. एतना खुश होके हमार स्वागत कइले कि मत पूछीं. तुरंते बिस्कुट का संगे चाय पियवले. प्रेम से भरल बात कइले. कहले कि एने का ओर अइह त जरूर हमरा से भेंट करिह. चले का बेर कोल्ड ड्रिंक भी पियवले. हम उनुका आदर से अभीभूत हो गइनी. मन में सोचनी कि एगो दरवान के कतना तनखाह होत होई. बाकिर इनकर प्रेम देखीं. खाली अपना जिला के वासी होखला के नाते ई अतना खर्चा क दिहले. ई आज से पचास साल पहिले के बात ह. ओह घरी लोगन के बीच प्रेम आ सौहार्द्र रहे. आजु ऊ गायब बा. बाईचांस हम ओह घरी अपना जिला के कई गो दरवान लोगन से मिलनी. सब दरवान लोगन में अपना जिला के आदमी के प्रति गहिर प्रेम लउकल. आज ऊ प्रेम कहां बा? कइसे लौटी ऊ प्रेम करेके स्वभाव. सोचे के विषय बा. कलकत्ता में ओह घरी रउरा केहू गांव वाला के घरे जाके एक हफ्ता खातिर रुक सकत रहनी हं. आज त एक दिन केहू के घरे रुकल भारी हो जाता.

पुरबिहा इलाका में उत्तर प्रदेश के बलिया जिला भी परेला. त पहिले बलिया से कलकत्ता जाए खातिर आजु नियर सुविधा ना रहल ह. कलकत्ता खातिर रेलगाड़ी धरे खातिर बिहार के बक्सर स्टेशन पर जाए के परत रहल ह. बलिया से बक्सर के दूरी करीब 40 किलोमीटर बा. बक्सर आवत का घरी गंगा नदी परेली. अब त गंगा माई पर पुल बनि गइल बा. बाकिर पहिले पुल ना रहे. त बक्सर स्टेशन पर उतरि के गंगा घाट आईं, नाव से नदी पार करीं. ओपार भरौली जाईं. ओइजा रोडवेज के बलिया खातिर बस देरी- देरी से रहल ह. त कलकत्ता से रेलगाड़ी से आके बक्सर सबेरे उतरल बानी त भरौली से बस से बलिया पहुंचे में दिन के चार बज जात रहल ह. कलकत्ता से बक्सर के दूरी 648 किलोमीटर के करीब बा.

ओइजा रात खान आठ बजे पंजाब मेल मे बइठीं आ बिहान भइला सबेरे छव- सात बजे ले उतरि जाईं. बाकिर बक्सर से बलिया के 40 किलोमीटर के दूरी तय करे में आदमी परेशान हो जात रहल ह. बाद में भरौली से प्राइवेट जीप आ कार चले लगली सन त तनकी भर सुविधा भइल. बाकिर घरे पहुंचे में तबो 12- एक बजिए जात रहल ह. फेर जब पुल बनल त बक्सर रेलवे स्टेशन से सीधे बलिया के टैक्सी मिले लगली सन. दू- अढ़ाई घंटा में आदमी बक्सर से सीधे बलिया पहुंचि जाला. ईहे सुविधा बड़ बुझाए लागल. सांझ खान सात बजे ट्रेन बिया त लोग दिन के दुइये बजे घर से चल दी. का जाने टेक्सिए बीच में खराब हो जाउ. एहीतरे कोलकाता के यात्रा होत रहे. तले बलिया- सियालदह ट्रेन चलावे के घोषणा हो गइल. पहिले बलिया में बहुत दिन ले छोटी लाइन रहे. जब सब जगह बड़ी लाइन हो गइल त आखिरी चरण में बलिया में बड़ी लाइन भइल. बड़ी लाइन होते बड़ शहरन खातिर बलिया से चले लगली सन- दिल्ली, कलकत्ता, मुंबई आ अउरी कई जगह. त पहिला हाली जब हम बलिया स्टेशन पर बइठि के सियालदह (कोलकाता के एगो रेलवे स्टेशन) गइनीं त बड़ा नया आ आनंद के अनुभव रहे. एकरा पहिले कलकत्ता जाए खातिर डाइरेक्ट बलिया से कौनो ट्रेन ना रहे. डाइरेक्ट ट्रेन मिलल त कतना खुशी हो सकेला रउरा सब अंदाज लगा लीं. लागल कि बड़का सुख मिल गइल. कतना भाग्यशाली बानी जा हमनी का. अब त बलिया से कोलकाता जाए खातिर तीन- तीन गो ट्रेन बाड़ी सन.

एगो गाजीपुर से ट्रेन चलेले, ऊहो बलिये होके जाले आ एगो अउरी गोरखपुर से चलेले त ऊहो बलिये होके जाले. गाजीपुर आ बलिया से चले वाली ट्रेन रोज नइखी सन. सप्ताह में कुछुए दिन बाड़ी सन. बाकी बलिया- सियालदह ट्रेन रोज चलेले. ई बलिया के कलकतिया लोगन के बड़का सुख बा. एकरा से चले वाला लोग रेल मंत्रालय आ केंद्र सरकार के रोज आशीर्वाद देला. जब कलकत्ता से गांवे आवे के होला त लोग तरह- तरह के सामान कीने लागेला. केहू कुछ त केहू कुछ. त ट्रेन पर चढ़े का बेर कलकतिया लोगन का लगे बहुते सामान रहेला. भारी- भारी अटैची रहेली सन. जे साल भर पर गांवे जाता ओकरा लगे त अउरी सामान रहेला. हालांकि अब त कहीं आनलाइन सामान, कतहूं से मंगावल जा सकेला. बाकिर तबो कलकत्ता के आकर्षण कम नइखे भइल. कलकत्ता के रसगुल्ला त कलकत्ता के संदेश, कलकत्ता के सिंदूर त कलकत्ता के तांत के साड़ी. अभियो एगो सम्मोहन रहेला कलकत्ता के. हालांकि अब बाजार ग्लोबल हो गइल बाड़े सन. तबो केहू कलकत्ता के रसगुल्ला ले आवता त ओकर सवादे बदल जाला. असल बात त ई बा कि सवाद त ऊहे रहेला (कलकत्ता के खजूर के गुड़ वाला रसगुल्ला त सचहूं बेजोड होला, ओकरा के छोड़ि के) बाकिर दिमाग में चूंकि कानसेप्ट बइठल बा कि कलकत्ता के मिठाई ह त सवाद अद्भुत हो जाला.

हमनी के कल्पना के कारण माइंड ओह सवाद के मैग्नीफाई क देला. अभियो कलकत्ता के अलता देखि के गांव के मेहरारू आनंद में डूबि जाला लोग. हालांकि अब आलता के प्रयोग आधुनिक महिला नइखे करत लोग. आलता अब कौनो बियाहे- शादी में लगावल जाता. बाकिर सिंदूर के प्रचलन अभी ठीक- ठाक बा. एहीतरे अभियो गांव के कई लोगन के मान्यता बा कि कलकत्ता के छाता बड़ा बढ़िया होला. हम त कलकत्ते रहेनी. अब कलकत्ता में ही ना हर जगह ठीक- ठाक छाता बने लागल बा. कहीं के भी अच्छा श्रेणी के छाता बढ़िया होला. हं कलकत्ता में छाता खूब बनेला. तबो, कलकत्ता के सस्ता छाता लेब त जल्दिए टूट जाला. हम भुलाए का डरे सस्ता छाता किन लेनी आ ऊ हर साल बरसात का बाद टूटि जाला. त यथार्थ ईहे बा. पहिले टिकाऊ सामान बनत रहल ह. अब हर जगह अइसन सामान बनता जौन एगो समय अंतराल का बाद टूटि जाता. जिनिगी भर टिकाऊपन के कल्पना अब एह जुग में ठीक नइखे. लागता कि कम टिकाऊपन के कांसेप्ट चीनी सामान देखि के आइल बा जौन सस्ता त होला बाकिर कतना दिन चली एकर कौनो गारंटी नइखे. चीनी सामान साल- दू साल चल सकेला आ एको महीना बाद खराब हो सकेला.

अब अंत में एगो अउरी बात. नोकरी खातिर बेरोजगारन के कलकत्ता आवे के परंपरा सन 1975 तक चलल. ओकरा बाद वामपंथी शासन हो गइल. ए शासन में बहुते कल- कारखाना बंद हो गइले सन. ओने दिल्ली में कल- कारखाना खुले लागल. त पलायन के रुख दिल्ली, गुजरात आ मुंबई होखे लागल.

(विनय बिहारी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

Tags: Bhojpuri Articles, Bhojpuri News

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