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    भोजपुरी में जयंती पर विशेष - नेता लोगन के एक पूरी पीढ़ी के असली गुरु - जेपी यानी जय प्रकाश नारायण

    आजू के दिन अपना देश के महान नेता जयप्रकाश नारायण के जन्म जयंती ह. सन् 1902 में 11अक्टूबर के उहा के पैदा भइल रहनी.ए साल 118 वी जयंती मनावल जाइ. जब देश मे 25 जून 1975 के आपातकाल.

    • News18Hindi
    • Last Updated: October 11, 2020, 3:08 PM IST
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    के घोषणा हो गइल आ विप के सब नेता लोगन के जेलों में कैद कर दिहल गइल, प्रेस पर पाबंदी लगा दिहल गइल संविधान के 43वा संशोधन करके कोर्ट के अधिकार सीमित कर दिहल गइल. जनता के मौलिक अधिकारन पर भी राष्ट्रीय सुरक्षा के तहत पाबंदी लगा दिहल गइल. सासअइसने हालात में इंदिरा गांधी के विरुद्ध जब उहा के देश के प्रधानमंत्री रहली जयप्रकाश नारायण जी आपातकाल जैम के विरोध कइनी आ देश लोकतंत्र के फेर से स्थापित करके देश के राजनीति के एगो नया दिशा दिहनी. आप अपने कभी देश के सत्ता के शीर्ष पद पर न रहनी. बाकी अइंसन ना रहे कि जवना पैड पर देश के पहिलका प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जी सुशोभित कइनी बाबू जयप्रकाश नारायण जी ना पहुंचल रहती. आपन एगो कविता में भी बतवले बानी कि इतिहास से पूछो कि वर्षों पूर्व बन नहीं सकता प्रधानमंत्री क्या? किन्तु मुझ क्रांति शोधक के लिए कुछ अन्य ही पद मान्य थे.

    बतावल जाला की अपना बाद खुद जवाहरलाल नेहरु जी जेपी से बात कइले रहलीं, बाकी जयप्रकाश जी सत्ता  राजनीति कवनों लफड़ा में ना पड़ल चाहत रहली. उहा के अपना बारे में खुद दावा कइले बानी कि विफलता पर तुष्ट हू अपनी, औ यह विफल जीवन शत शत धन्य होगा, यदि समान धर्मा प्रिय तरूणों का कंटकाकीर्ण मार्ग, यह कुछ सुगम बना जावें. ई कविता  9 अगस्त 1975 के जयप्रकाश जी चंडीगढ़ अस्पताल से  लिखले रहनी. तबियत खराब भइला के वजह से आपात काल के दौरान यह के पुलिस के निगरानी में चंडीगढ़  पी जी  आई एस8 में भर्ती करावल गइल रहें. यह कविता से दूगो बात समझल जा सकेला  नौजवानन के जीवन में सुधार खातिर जयप्रकाश जी आजीवन कोशिश करत रहली. अपना जीवन के के अंतिम समय तक जे पी नौजवानन के हीरो रहली.उहा के एगो समानधर्मा साथी डॉ राममनोहर लोहिया जी के भी जे पी के बारे में इहे राय रहें कि जयप्रकाश नारायण नौजवानों के दिल के नेता है.उनके बदौलत अगर खुद नहीं हिले तो देश हिलाने की ताकत उनमें है.

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    देश के नौजवानन के बारे में उहा के आपन राय ई रहे कि  नौजवान ख़ाली रेखिआ उठाने वाली पीढ़ी न कहा नौजवान कवनो उम्र में आदमी हो सकेला जब तीन गो बात होखे पहिला बात ई कि जोखिम उठावे के  क्षमता होखे, दूसर बात ई कि संघर्ष करेके मादा होखे ,जेकर कवनों सुनहला सपना होखे.एहि से जयप्रकाश जी 70 साल के उम्र में अपना के नौजवान मानत रहली.आ आपात काल के ज्यादती से लड़े आ देश मे दुबारा लोकतंत्र के बहाली खातिर  जीवन के अंतिम पड़ाव तक लड़ाई लड़नी.ई अलग बात बा जनता सरकार बनला के बाद ओकर का हश्र भइल यह के देख लिहली.उहा के सोचल बिचारल संपूर्ण क्रांति के सपना त न पूरा भईल ,बाकी  जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के विरुद्ध जवन बिहार आंदोलन शुरू भईल ओकर एगो महत्वपूर्ण नेता लालू प्रसाद जी भ्रष्टाचार के आरोप में रांची जेल में बानी.ओहि आंदोलन के पैदावार आज आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार जी आ उत्तर प्रदेश के बड़ नेता मुलायम सिंह यादव जी हई.
    विनोबा जी आ जयप्रकाश जी दूनो जाना दावा करात रहलन कि ऊ लोग गांधी जी के अधूरा काम पूरा कइल चाहत बा लोग. गांधी जी कवन अधूरा काम रहें जवना के पूरा करें के ई दूनो महान विभूतियन जरूरत रहें? पहिला कमी रहे कि सत्ता से बाहर रहिके आम आदमी के जरूरत के मुताबिक राजनीत के रचनात्मक काम से से जोड़ल. ऐ खातिर  गांधी जी 18 सूत्रीय कार्यक्रम पेश कइली. गांधीजी स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस के  भंग करके लोक सेवक संघ बनावे के सुझाव देत रहनी ताकि कांग्रेस कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर ग्रामीण विकास के काम में लागे. गांधीजी गांव के गणराज्य के जरिए भारत के लोकतंत्र के नींव मजबूत कइल चाहत रहनी हा. जयप्रकाश जी लोक शक्ति के जगआ के लोकतंत्र के नीव मजबूत कइल चाहत रहली हा जयप्रकाश जी के भरोसा रहें कि सामाजिक क्रांति खाली हिंसा के जरिए ना आवे जइसन कि  मार्क्सवाद, लेनिनबाद आ माओवाद  के बुनियादी मान्यता रहें, बल्कि  पुनर्निर्माण  की  गांधीवादी  प्रक्रिया जिसका भूदान, ग्रामदान  और ग्राम स्वराज  के रूप में प्रकट दर्शन हो रहा है.

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    सन् 1929 में जब अमेरिका से भारत लौटनी त तब ओ समय जयप्रकाश जी घोर मार्क्सवादी रहानि.खुद गांधीजी जयप्रकाश नारायण के समाजवाद की समझ के बारे में दावा कर रहे हैं कि समाजवाद के बारे में जो बात जयप्रकाश नहीं जानते, उसे दुनिया का कोई भी आदमी नहीं जानता है. फिर जयप्रकाश जी समाजवाद से सर्वोदय की ओर अपनी पतली सी पुस्तक में विस्तार से बतवले बानी कि मार्क्सवाद से उहा के कइसे मोहभंग भइल आ कइसे गांधीबाग आ विनोबा के सर्वोदय आंदोलन के नजदीक आवत गईली. अपने पुराने साथियों के नाम पत्र में इस पीड़ा को उन्होंने व्यक्त किया है.उहा के ऐ पुस्तक में इहा तक दावा कइले बानी कि दुनिया में यदि कभी शांति, स्वतंत्रता और बंधुत्व स्थापित होते हैं तो समाजवाद को आखिरकार सर्वोदय में विलीन होना ही पड़ेगा. जयप्रकाश जी को इस बात का भी अफसोस था कि जब गांधी जी हमारी भी उपस्थित थे तो विचार के इस निर्णय पर मैं नहीं पहुंच सका फिर भी कुछ वर्ष पूर्व मुझे विश्वास हो गया कि हमारा आज का समाजवाद मानव जाति को स्वतंत्रता बंधुत्व समानता और शांति के उत्कृष्ट लक्ष्य तक नहीं ले जा सकता.

    जयप्रकाश जी के एह बात के भी लेके कम अफसोस ना रहें कि पता ना देश के राजनीति से लोगन के काहे अतना भरोसा ब जइसे जीवन के कुल समस्या के निदान करें अलावा कवनों दोसर विकल्प लोगन के नइखे देखात. उहा के कहत बानी कि लोगों का राजनीति पर कितना विश्वास है, यह देखकर उन्हें दया आती है. सर्वोदय के गया अधिवेशन जब जयप्रकाश जी अपने को राजनीति से अलग होखे के घोषणा कइली बहुत लोगन के मनमे ई सवाल पैदा भइल कि अब जेपी के नया दिशा का होई. जयप्रकाश जी खुद बतवले बानी कि मैंने ढल और सत्ता की राजनीति से अलग होने का निश्चय है इसलिए नहीं किया कि मैं उससे ऊब गया या निराश हो गया था बल्कि इसलिए किया कि मुझे यह स्पष्ट हो गया था कि अब सिर्फ राजनीति से काम नहीं बनेगा क्योंकि राजनीति केवल राज्य या सत्ता का विज्ञान है. एह नतीजा पर गांधी जी सन्1909 मे हिंद स्वराज  लिखते बखत पहुंच गइल रहनी. उहा के ब्रिटेन में रही के  उहा के संसदीय लोकतंत्र के  खामी देख चुकल रहनी.

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    आ ई दावा कइली कि संसद बाँझ और वेश्या है. काहे की की ई जेकर बहुमत रहेला ओकरे साथ दिही. अल्पमत के आवाज के कवनों सुनवाई इहा संभव नइखे. जयप्रकाश जी अइसन लोग त ई जानल चाही कि 100 लोगन में 51 लोग जवन बोलत  कहत बा ऊहें काहे साच ब. बाकी 49 लोगन के बात कदर करे आ माने के सम्भवना एह लोकतंत्र में बा?आम सह्माति के बात तबे काहै होला जब कवनों सरकार अल्मत में होला?संसदीय लोकतंत्र में बहुमत के जोम में दरेरा देबे के अइठ कहा तक ठीक बा? एह ऐठन के रोके खातिर जयप्रकाश जी लोकतंत्र पर जनता के अंकुश लगावे के जरूरत महसूस करत रहनी. चाहत रहनी कि चुनाव लड़े वाला प्रत्याशी के चयन में जनता के भागीदारी होखे के चाही, आ  द चुनाव जीतला के बाद प्रतिनिधि लोगन पर जनता के अंकुश बरकरार रहे ऐ खातिर जनता के आपन चुनल प्रतिनिधि के वापस बुलावे के भी अधिकार होखे के चाही, ताकि चुनाव जीतल प्रतिनिधि अपना लोकतंत्र के राजा समझे के गलती मत करे.

    ई लोकतंत्र के भारतीय संदर्भ अनोखा सुझाव रहे, अभी तक अपना देश मे ऊपर से नीचे तक आजमवल नइखे गइल. इहे न उहा के  उहा के दलीय राजनीति से ऊपर उठी के दलविहीन लोकतंत्र के बात भी बतवले रहनी. काहे की  आज के राजनीति पांच साल के बाद चुनाव होत बा, दल के  उम्मीदवार चुनाव लड़त बा लोग आ  आम जन वोट देबे के अलावा कवनों अउर अधिकार नइखे.उहा के इहो बतवले रहनी कि किसी विशेष निमित्त और विशेष अवसर के लिए यह प्रयोग सफल नहीं हो सकता फिर भी मनोवैज्ञानिक वातावरण तैयार हो जाए, तो इस प्रकार का राजनीतिक प्रयोग आज भी सफल हो सकता है. उन्हें यह भरोसा था कि जनता के स्व शासन की ओर गांधीजी की जो निर्दलीय विधायक दृष्टि थी, उसमें अन्वेषण का एक आशा जनक मार्ग दिखाई देता है. इहे ना एशियाई मुल्कों के समाजवाद के बारे में भी उहा के राय ई रहे कि मैं यह नहीं समझा रहा हूं कि हमें पाश्चात्य समाजबाद या रूसी साम्यवाद से कुछ सीखना नहीं है, मेरा कहना है चिंतन, प्रयोग और परिवर्तन करने के जो काम हमारे सामने हैं, उनका बहुत बड़ा हिस्सा हमें अपने आप ही करना पड़ेगा.

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    ऐकरा मूल में विकेंद्रीकरण, साधन साध्य की पवित्रता और नैतिक दृष्टि से निकलल निष्कर्ष हो सकेला. सवाल इब की दूसरा देश के क्रन्ति काहे असफल भईल? जयप्रकाश जी बता रहे हैं कि उन क्रांतियों के कर्णधारों ने ऐसे साधनों का उपयोग किया, जो उनके साध्य्योके अनुकूल नहीं थी. इहे दृष्टि साधन आ साध्य के पवित्रता के लेकर गाँधी जी रहे जवना वजह से जयप्रकाश बाबू गांधी जी के करीब अईनी. अपना जवनी दिन निरा निरीश्वरवादी जयप्रकाश नारायण अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर आधात्मिक्ता के शरण में चलीं गइल रहनी. उहा के ई दावा रहें कि आध्यात्म बुढ़ापे की बुढ़भस नहीं हैं, तरुणाई की उतुंगतम उड़ान है. आपन किताब मेरी विचार यात्रा में जयप्रकाश जी कहत बानी कि सांस्कृतिक क्रांति के बिना भारत का एवम भारतीयता का बचना दुष्कर प्रतीत हो रहा है यह मानवीय क्रांति होगी, आंतरिक क्रांति होगी, क ऐसी ऐसी क्रांति जिसमें भारत का आध्यात्म व्यक्ति व्यक्ति के जीवन में उतर जाएगा.तब व्यक्ति अपने हितों का दर्शन  समूह के हितों में  करने लगेगा और वैसा ही जीवन जीने लगेगा.उस क्रांति के बिना न समाजवाद आ सकेगा न साम्यवाद, सर्वोदय तो उसी क्रांति का दूसरा नाम हैं एक तरह से देखल जा त जयप्रकाश जी के चिंतन में घोर कम्युनिस्ट से लोकतांत्रिक समाजवाद आ सर्वोदय के यात्रा चिन्तन के विभिन्न पड़ाव रहें. निरंतर ओ अपना अनुभव आ  समझ से ओह चिंतन विकास भईल. ई बात जयप्रकाश जी खुद स्वीकार कईले बानी. कुछ लोग एह वैचारिक बदलाव के जयप्रकाश जी के वैचारिक भटकाव मनेला. जयप्रकाश जयंती पर उनके स्मृति के बार बार नमन बा.
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