Bhojpuri: एगो लालू जी 1974 के एगो ‘लालू’ जी 1959 के, पढ़ीं दूनों के कनेक्शन

लालू जी के पहिला नांव 1974 में भइल रहे जब ऊ छात्र नेता बनले. लेकिन उनका छात्र नेता बने से 15 साल पहिले भी लालू नांव के गूंज भइल रहे. 1959 में गांव-गांव, शहर-शहर में होत रहे ‘लालू’ के बखान. कमाल के रहे लालू-भुलू के जादू. ई ‘लालू’ के रहन अउर कहां होत रहे उनकर बखान ? जानी नांव के महिमा के कहानी

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घर के ओसारा में बइठ के दीपेंदु अउर देवाशीष चाह पीयत रहन. चाह के चुस्की लेके दीपेंदु कहले, बिधि के बिधान के अदभुत लीला बा. कबो कबो भाग-जोग के संकेत बहुत पहिले मिल जाला लेकिन आदिमी ओकरा के पहचान ना पावे. 1959 नें लालू प्रसाद यादव एगारह साल के लइका रहन. ओह घरी गोपालगंज के फुलवरिया गांव से बहरी उनका के केहू ना जानत रहे. ई केहू सोचत भी ना रहे कि एक दिन लालू नांव लइका के पूरे देश में आपन डंका बजा दिही. लेकिन ई संजोग देखीं कि लालू के जवन नांव से बिहार अउर देश के लोग अंजन रहे ऊ बंगाल के गांव-गांव में गूंजत रहे.

1959 में एगो बांग्ला फिलिम रिलीज भइल रहे जेकर नांव रहे- लालू-भुलू. एकर डायरेक्टर रहन अग्रदूत. ई फिलिम में दूगो अपाहिज संघतिया के कहनी अतना मार्मिक रहे कि सिनेमाहौल में अदिमी के रेला उमड़े लागल. फिलिम सुपरहिट हो गइल. ओह घरी सिनेमा के जीवन पs बहुत गहिड़ छाप रहे. घर-घर में ‘लालू-भुलू’ के कहानी कहाये लागल. बिधि के बिधान ओही घरी बता देले रहे कि एक दिन लालू के नांव पूरे देश में चरचित हो जाई. फिलिम लालू-भोलू अतना हिट भइल कि एकर धमक बमबई तक पहुंच गइल. हिंदी में एही कहानी पs यादगार फिलिम बनल रहे ‘दोस्ती’. 1964 में रिलीज भइल ‘दोस्ती’ हिंदी सिनेमा में नया इतिहास रच देलस. दीपेंदु के बात सुन के देवाशीष कहले, दोस्ती फिलिम आजो देखला पs मन खुश हो जाला. अइसन ऐक्टिंग, अइसन गाना केहू जिनगी भर ना भूला सकेला.

रामू-मोहन (लालू-भुलू ) के कमाल
देवाशीष कहले, हमनी के लइकाईं में सुनले रहीं जा कि दोस्ती फिलिम एतना हिट भइल रहे कि ओह घरी के बड़का-बड़का हीरो लोग डेरा गइल रहे. एगो नामी हीरो के हाल्ला उड़ल रहे कि ऊ आपन गद्दी बचावे खातिर दोस्ती फिलिम के दूनो हीरो के मरवा देले रहन. ई बात सुन के दीपेन्दु हंसे लगले, ई बिल्कुल गलत बात बा. पता ना कइसे ई अफवाह उड़ गइल रहे. दोस्ती फिलिम में रामू (लंगड़ा) के रौल सुशील कुमार कइले रहन. दृष्टिहीन मोहन के रौल सुधीर कुमार कइले रहन. दोस्ती फिलिम के बाद ई दूनो हीरो के साथ का भइल ई कहानी हम पढ़ले रहीं नामी लेखक अउर शोधकर्ता शिशिर कृष्ण शर्मा के बलौग में. दोस्ती फिलिम जब रिलीज भइल तs लहलका मचा देलस. एकर गाना (राही मनवा दुख की चिंता, कोई जब राह न पाये, चाहूंगा में तुझे सांझ-सवेरे, मेरा तो जो भी कदम है, जाने वालों जरा मुड़ के देखो इधर, गुड़िया हमसे रुठी रहोगी) जे सुने भावभिभोर हो जाए. ऐह गीतन के मिठास आज ले कायम बा. सुशील कुमार अउर सुधीर कुमार के उमिर ओह घरी 17-18 साल के रहे. सुशील कुमार मैट्रिक पास के कौलेज में नांव लिखवले रहन. एकरा पहिले ऊ लोग बाल कलाकाकर के रूप मैं काम कइले रहे. लेकिन दोस्ती के बाद दूनो जना के गिनती बड़का हीरो के रूप में होखे लागल.

दोस्ती के बाद का भइल ?
दीपेंदु के कहानी जारी रहे. दोस्ती सिनेमा के निरमाता रहन ताराचंद बड़जात्या. उनकर निरमान कंपनी के नांव रहे राजश्री प्रोडक्शन. पारिवारिक सिनेमा बनावे में राजश्री के कवनो जोड़ा ना रहे. ताराचंद बड़जात्या सुशील कुमार अउर सुधीर कुमार के साथे तीन साल के करार कइले रहन. दूनो जना के तीन सौ रोपेया महीना तय भइल रहे. ओह घरी तीन सौ रोपेया बहुत बड़ रकम रहे. दोस्ती के बाद ताराचंद जी दूनो जना के लेके एगो अएउर फिलिम के जोजना बनावत रहन. करार के मोताबिक तीन साल तक इनका लोग के राजश्री के अलावा कवनो दोसरा निर्माता के फिलिम ना करे के रहे. लेकिन बड़का बड़का निरदेशक सुशील कुमार अउर सुधीर कुमार के अपना फिल्म में लेवे के खातिर बोरा में पइसा लेके खाड़ा रहन. एही बीच दक्षिण भारत के नामी फिलिम कंपनी एभीएम ‘लाड़ला’ खातिर सुधीर कुमार के रजामंद कर लेलस. एभीएम सुधीर कुमार के अतना पइसा देलस कि ऊ राजश्री के हरजाना भर के करार तूर देले. एकरा चलते सुशील कुमार अउर सुधीर कुमार के जोड़ी टूट गइल.

दोस्ती के कामयाबी दोहरा ना पइले दूनो हीरो
देवाशीष पूछले, एकरा बाद का भइल ? दीपेंदु जबाब में कहले, सुधीर कुमार के अलगा भइला के बाद ताराचंद बड़जात्या के सुशील कुमार पs कम धेयान हो गइल. करार खतम भइला के बाद 1967 में सुशील कुमार काम के तलाश में जुटले. दू-तीन जगह से बोलहटा आइल लेकिन बात ना बनल. तब सुशील कुमार के सिनेमा से मोहभंग हो गइल. ऊ आपन धेयान पढ़ाई में लगावे लगले. एही बीच ताराचंद बड़जात्या 1968 में सुशील कुमार के लेके फिल्म तकदीर बनवले. तकदीर हिट भी रहल. लेकिन सुशील कुमार फिल्मी जीवन के उतार चढ़ाव के समझ गइल रहन. ऊ फिल्मी दुनिया छोड़े के मन बना लेले. बीए पास कइले के बाद उनकर नौकरी एयर इंडिया में लाग गइल. एह तरे सुशील कुमार फिल्म दोस्ती के कामयाबी के भुला के आपन रोजी रोटी खातिर दोसर रास्ता चुन लेले. सुधीर कुमार दोस्ती के बाद फिल्म लाड़ला, जीने की राह जइसन कुछ सिनेमा अइलन. लेकिन रास्ता लंबा ना रहल. फिलमी दुनिया के उहो अलविदा कह देले. 1993 में जब मुम्बई दंगा भइल रहे तs ओह घरी सुधीर कुमार के तबीयत बहुत खराब रहे. करफू के चलते उनकर समय पs इलाज ना हो पावल. धीरे-धीरे रोग बढ़त गइल जवना से उनकर मौत हो गइल. दीपेंदु आपन बात कह के रूक गइले. देवाशीष देने देख के कहले, अब समझ गइल नूं कि दोस्ती के हीरो के साथे असल में का भइल रहे. ई वक्त के नाइंसाफी कहाई कि अतना निमन कलाकार होखे के बादो लालू-भुलू (रामू-मोहन) के जोड़ी गुमनाम हो गइल. देवाशीष भी अफसोस के साथे मुड़ी डोला देले. (लेखक अशोक कुमार शर्मा वरिष्ठ स्तंभकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)