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    भोजपुरी में पढ़ें - बंगाल में काली पूजा के परंपरा, थाना कैंपस में भी पंडाल सजेला

    शक्ति पूजा बंगाल के खाली धार्मिक आयोजन ना ह, बल्कि उहां के परंपरा भी बन गइल बा.
    शक्ति पूजा बंगाल के खाली धार्मिक आयोजन ना ह, बल्कि उहां के परंपरा भी बन गइल बा.

    दीवाली से शुरू होके काली पूजा तीन दिन तक चलेला. शक्ति के इ उपासना में पुलिस के लोग भी जुट जाला.

    • News18Hindi
    • Last Updated: November 30, 2020, 5:20 PM IST
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    देवाली के दिने देवी काली क पूजा होवे क बात सुनि के अजबे लागी लोगन के लेकिन देस एगो अइसन परदेस ह जहां जौन दिन मय देस में लक्ष्मी गनेस क पूजा होला उ दिन उहंवा देवी काली के पूजल जाला . उहों घरे घरे ना बलुक पंडालन में देवी काली क माटी क मूरत बइठा के. इ सब शक्ति के पूजे वाला परदेस बंगाल में होला. काहे से कि काली के भी शक्ति क परतीक देवी दुर्गा के कई रूपम में से एगो रूप मानल जाला. बंगाल में दो किसिम क मान्यता हव. पूरबी पाकिस्तान बा बांगलादेस बनने से पहले जब दूनो बंगाल पूरबी अउर पच्छमी बंगाल भारते क हिस्सा रहल तब्बो दोनों ओर क लोगन क खान पान बा लोकाचार में अंतर रहे. खाली इहे अंतर नाही बलुक पच्छमी अउर पूरबी दूनों बंगाल के लोग अपना के हर माने में दोसरा से श्रेष्ठ माने अउर इ भेद भाव आजो चलल आवत हव. पच्छिम बंगाल के लोग कहे ला कि बांगाल लोग खानपान का जाने. एही तरह देस बटैइले के बाद पच्छिम बंगाल बा देस के दोसरा परदेस में आके बस गइल पूरबी बंगाल के लोग कहे ला कि घटी लोगन क खाना गाला से नीचे ना उतरे. बंगाल में पूरबी हिस्सा के लोगन के बांगाल कहल जाला अउर पच्छिम बंगाल के लोगन के घटी. एक समय अइसन रहे कि दूनो तरफ के लोगन बीच सादी बियाहो ना होखे.

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    खानपान अउर लोकाचार के अलावे कउनो कउनो पूजा पाठो में भी दूनो बंगाल में अंतर साफे नजर आवे ला. लछमी पूजा अउर काली पूजा में इ अंतर साफ देखाई देला. पूरबी बंगाल क लोग बिजय दसमी के पांच दिन बाद पड़े वाला शरद पूरनिमा के देवी लछमी क पूजा करेला अउर देवाली के दिने माने कार्तिक अमौसा के देवी काली क. जब पूरा देस कार्तिक अमौसा के दिने घरे घरे लछमी गनेस क पूजा करेला अउर दिया मोमबत्ती जरा के देवाली मनावेला त बंगाल में माटी क मूरती पंडालन में बैइठा के देवी काली क पूजा करेला उहो रात के बारह बजे. मनौती माने वाला लोग त दिन भर बरत रखे ला अउर रात क बारह बजे पूजा होइला के बाद कुछो खाला. घटी लोग माने पच्छिम बंगाल के लोग त देस के दोसरा परदेस के लोगन जइसन अपना घरे में लछमी गनेस क पूजा करेला. वइसे समय बीतला के साथे सब परब त्योहार में बांगाल अउर घटी क अंतर अब देखाई ना देला. कहे क माने इ ह कि अब बंगाल में रहे वाला सब लोग देवाली के साथे साथे कालिओ पूजा खूबे चाव से मनावे ला. चाहे उ आपन बंगाल क घटी लोग होखे बा बंगाल में रहे वाला बिहारी - पूर्वांचली भाई लोग.



    कलकत्ता से सटल उत्तर 24 परगना जिला क नैहाटी अउर बारासात क काली पूजा बहुते मसहूर ह. दूनों जगह 20 से लेके 40 फुट क काली क मूरती बइठावल जाला. देखे खातिर दूर दूर से लोग आवेलं. देवाली के दूसरा दिन से लेके मूरती के बिसरजन भइला तक देखवइया क भीड़ कमे ना होला. इ दूनों जगह जइसे मेला लग जाला. वइसे त काली पूजा समूचा बंगाले में होला लेकिन इ दूनों जगह ढेर ऊंच ऊंच देवी काली क मूरत देखे क महातम कुछ अलगे ह. वइसे त देवी काली क 20 से 40 फुट क मूरती के अलावे इ दूनों जगह क महातम त पहिले से ही ह. नैहाटी बंदे मातरम रचे वाला कवि ऋषि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय क जनम स्थान ह त बारासत उत्तर 24 परगना का जिला मुख्यालय हव.
    बंगाल क काली पूजा के बारे में इ कहल जाला कि उहंवा अधिकतर काली पूजा क आयोजन मस्तान लोगन की ओर से होला. दबंग अउर गुंडा टाइप क लोगन के बंगाल में मस्तान कहल जाला. एक ओर त बंगाल में दुर्गा पूजा अउर सुरसती पूजा गली मोहल्लन क क्लबन की ओर मनावल जाला जबकि दोसरा ओर काली पूजा मस्तान अउर उनकर संगी साथी लोग मनावे ला. एकरा चलते कहल जाला कि उ सबके चंदा भी खूब अउर बिना अधिक मेहनत के मिल जाला. देवी काली क एतना ऊंच ऊंच मूरती बैइठावे क कारणों एही हो सकेला. देवाली पर मनावल जाए वाला बंगाल क काली पूजा क एगो अउरो मजे क बात हव. उहवां क अधिकतर थानन में भी काली पूजा मनावल जाला. बाजाफ्ता पंडालनन में मूरती बैइठा के. अउर त अउर पहलइवां थानन के पंडालन में पशु क बलि भी चढ़ावल जाओ. बाद में लौका क बलि होबे लगल.

    मजे क बात इहो ह कि देवाली से पहले सिपाही भाई त लोग पास पड़ोस के मोहल्ला के घर दोकानन से चंदा भी लेत रहे. अब भला सिपाही लोग चंदा लेबे आई त के मना करी देबे से. हां सिपाही भाई लोग इ बात क ख्याल जरूर रखत रहल कि चंदा मांगत समय उन सब क भाखा बोली मास्तानन के संगी साथियन जइसन ना हो. थानन क काली पूजा में गली मोहल्ला के लोगन क भी हर तरह क हिस्सेदारी होवे ला. चंदा देबे से लेके क पूजा पाठ तक में. एकरा अलावा देवाली के बाद वाला दिने से हर रात थानन के पंडाल के पासे लोगन के मन बहलावे क भी बाजफ्ता इंतजाम होला. कहे क माने इ कि कार्तिक अमौसा के बाद के तीन चार रात अलगे अलगे मनोरंजक पोरगराम होवे ला. कौउनो रात जातरा त कौउनो रात आरकेस्टरा.

    अउर अगर थाना बिहारी पूर्वांचली भाई लोगन क इलाका में हव त कव्वालियों क पोरगराम होला. इकरा खातिर बंगाल बा देस क नामी कौव्वालन के बुलावल जाला. एमे कौव्वाल अ कौव्वाला माने मरद अउर औरत दूनों कव्वाल बुलावल जालन. जउन कौव्वाली पोरगराम में दूनों कव्वाल रहे लं त उनका बीच में होबे वाला कंपटिसन में बड़ा मजा आवेला. थानेदार साहब भी सपरिवार अपना स्टाफ के साथ हर पोरगराम क मजा लेबे लं. मजे क बात इहो ह कि लगभग समूचा थाना के पोरगराम में बिजी रहेला के बादो इ रातन के चोर चुहाड़ लोग भी कौउना कांड ना करेला. देवाली के दिन बंगाल में देवी काली के पूजे जाइल अउर ओसे जुड़ल किस्सा कहानी जान के भलेहू अजरज होई लेकिन मजा जरूर आई.
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