Bhojpuri: निर्गुनिया परंपरा के पुरोधा भोजपुरी के आदि कवि कबीर, आज ह जयंती

Kabir Das Jayanti: कबीर के जनम के सवा छव सइ साल गुजरि चुकल बा, बाकिर आजुओ उन्हुकर प्रासंगिकता इचिकियो कम नइखे भइल. कहल जाला कि सन् 1398 में काशी में उन्हुकर अवतरण भइल रहे आ 1518 में 120 बरिस पूरा भइला पर मगहर में दैहिक अवसान भइल. इहो कहाला कि कबीर के जनम हिन्दू परिवार में आ लालन-पालन मुस्लिम परिवार में भइल.

  • Share this:
कबीर जयंती 24जून पर खास (Kabir Jayanti): जेठ महीना के पुरनवासी के कबीर जयंती भोजपुरी दिवस का रूप में मनावल जाला, काहें कि भोजपुरी के आदिकवि रहलन कबीर. कबीर के माने होला-सभसे बड़हन,सर्वश्रेष्ठ, सभसे सेसर. बाकिर एगो जोलहा के लरिका सभ केहू से सेसर कइसे हो सकेला? इहे सवाल उठल रहे ओह मौलवी के मन में, जे कुरान के पन्ना पलटत नामकरन कइले रहे-कबीर!

दरअसल भइल ई कि काशी के लहरतारा ताल का लगे जब बेऔलाद जोलहा दंपति नीरू आ नीमा केआं-केआं करत एगो लावारिस नवजात शिशु के पथल प दूब जमला-अस पवलन,त मुलबी साहेब से नांव रखवावे गइलन.मुलबी के खुदे अचरज भइल कि कइसे उन्हुका मुंह से ई नांव निकलि गइल-कबीर! खैर, कबीर जोलहा का घर में आ गइलन. दूनों परानी मिलिके पालल-पोसल जरूर, बाकिर ई पता ना रहे कि माई-बाप के रहे? जाति का रहे?धरम का रहे? तबे नू समाज-सुधारक आ विद्रोही कवि बनलन कबीर.

कबीर के जनम के सवा छव सइ साल गुजरि चुकल बा, बाकिर आजुओ उन्हुकर प्रासंगिकता इचिकियो कम नइखे भइल. कहल जाला कि सन् 1398 में काशी में उन्हुकर अवतरण भइल रहे आ 1518 में 120 बरिस पूरा भइला पर मगहर में दैहिक अवसान भइल. इहो कहाला कि कबीर के जनम हिन्दू परिवार में आ लालन-पालन मुस्लिम परिवार में भइल. उन्हुका कविता में 'झीनी-झीनी बिनी चदरिया' नियर बेरि-बेरि काते-बीने के जवन बात आवेला,ओकरा मूल में जोलहा परिवार के पेशा रहे ,जवना के ऊहो अपनवले रहलन.
कबीर कहलहूं रहलन-

काशी में हम प्रकट भए हैं, रामानंद चेताए.
समरथ को परवाना लाए हंस उबारन आए..

बाकिर रामानंद जी सहजे आपन चेला ना बनवलन. जब ऊ कबीर के गुरु बने से साफ मना कऽ दिहलन, त कबीर एगो उपाइ सोचलन. ऊ ओह सीढ़ी प जाके सूति गइलन, जवना पर गोड़ धइके रामानंद जी भोर में गंगा नहाए जात रहलन. कबीर के देह पर गोड़ परते अचके में उन्हुका मुंह से फूटल-'राम'! फेरु उन्हुकर निगाह कबीर प परल. बाकिर कबीर त भाव विभोर होके गुरुजी के चरन धऽ लिहलन आ 'राम' के गुरुमंत्र मानि लिहलन.

ओह घरी समाज में जाति-पांति, छुआ-छूत के बोलबाला रहे. पंडित-मुल्ला निचिला तबका के लोगन के घोर उपेक्षा आ शोषन करत रहलन. कबीर जाति-पांति के खारिज करत ई साबित कइलन कि अदिमी करम से महान बनेला, जनम से ना. भगती,करम आ ज्ञान के महातम बतावल उन्हुकर कहनामो रहे-

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान.
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान..

कबीर 'कागज के लेखी' के जगहा 'आंखिन देखी' में बिसवास राखत रहलन. ऊ डंका के चोट पर कहले रहलन-'मसि-कागद छुओ नहीं, कलम गही नहिं हाथ.' ऊ पांडित्य के पैमाना मोट-मोट ग्रंथन के पढ़ला का जगहा प्रेम के अढ़ाई आखर पढ़ला में रहे-

पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय.

कबीर आडंबर आउर अंधभक्ति के घोर विरोधी रहलन. चाहे हिन्दू होखे भा मुसलमान, ऊ दूनों के कमजोरी प जमिके चोट कइलन आ मेहनत के प्रतिष्ठा दिअववलन-

पाहन पूजे हरि मिले तो मैं पूजूं पहार,
तासे तो चाकी भली, पीस खाय संसार.

आ-
कांकर-पाथर जोरिके मसजिद लई बनाय,
ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय?

ऊ इंसान आ इंसानियत के हिमायती रहलन. भगवान मंदिर-मसजिद में ना,मनई के दिल में रहेलन, एह से सभका भीतर ईश्वर के दर्शन कऽके ऊ एक-दोसरा से नेह-छोह करेके सीख देत रहलन. उन्हुकर बतावल राह कबीर-पंथ के नांव से मशहूर भइल. ऊ संतन में सुच्चा इंसान के खोज कइलन. ऊ साधुए का,जे नि:सार चीझन का पाछा भागल फिरे!

साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुहाय,
सार-सार को गहि रहे, थोथा देइ उड़ाय.

कबीर के भाषा खांटी भोजपुरी रहे. उन्हुका के भोजपुरी के आदिकवि मानल जाला. भक्ति आन्दोलन के कवि लोग अपना मातृभषे में कविता लिखल-विद्यापति मैथिली में, तुलसी आ जायसी अवधी में, मीराबाई राजस्थानी में, सूरदास ब्रजभाषा में. एह दिसाईं कबीर के कहनाम रहे-

बोली हमरी पूरबी, हमको लखै न कोय,
हमको तो सोई लखै, जो धुर पुरबिया होय.

ओइसे त अलगा-अलगा दौर में कविता के कई गो आन्दोलन भइल, कई गो धार बहल, बाकिर ओहू सभ में भक्तिकाल के सोनहुला जुग का रूप में आजुओ इयाद कइल जाला. भक्तिकाल कई गो अमर कवि दिहलस. ओह सभके सिरमौर रहलन संत कबीर दास. ऊ निर्गुनिया परंपरा के बतौर प्रवर्तक ऐतिहासिक भूमिका अदा कइले रहलन.

कबीर के आविर्भाव अइसना समय में भइल रहे, जब चारू ओरि जातीय विद्वेष आ कठमुल्लापन हाबी रहे. एक तरफ शासकन के अतियाचार से त्राहि त्राहि करत मनुजता, उहंवें दोसरा ओरि रूढ़ि,अंधबिसवास, धरम-मजहब के नांव प किसिम-किसिम के ढकोसला आउर ऊंच-नीच के भेदभाव में आकंठ डूबल समाज.

जोलहा परिवार में पलल-बढ़ल कबीर ई गौर कइलन कि मुसलमान में द्विज आ शूद्र के भेद नइखे. ऊ अनीश्वरवाद के भारतीय अद्वैतवाद आ मुसलमानी एकेश्वरवाद से जोड़िके निर्गुण भक्ति के नया राह देखवलन आ मूरतपूजा के विरोध करत जाति-पांति के भेद मेटावत हिन्दू-मुस्लिम एकता में अगहर भूमिका निबहलन. ऊ जवना राम के उपासक रहलन, ऊ निर्गुण ब्रह्म रहलन-

दशरथ सुत तिहुं लोक बखाना,
राम नाम का मरम है आना.

एही से कबीर उपदेश देत रहलन -'निरगुन राम निरगुन राम जपहु रे भाई!'

कबीर के दुख त सउंसे संसार खातिर रहे, एह से सामाजिक चेतना जगावे के गरज से उन्हुकर दुखी भइल सुभाविके रहे-

सुखिया सब संसार है, खावै अरु सोवे,
दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोवै.

संसार के कीच में धंसल बा आत्मा के हीरा. का हिन्दू, का मुसलमान-सभे एकर खोज पूजा-पाठ,तीरथ-बरत में करत बाड़न, बाकिर हीरा के परख त कबीर लेखा जौहरिए नू कऽ सकेला-

तोर हीरा हेराइल बा कीचरे में.
केहू ढूंढ़े पूरब,केहू ढूंढ़े पछिम, केहू ढूंढ़े पानी पथरे में.
दास कबीर ई हीरा के परख,बान्हि लिहले जतन से अंचरे में.

'माया महाठगिनि हम जानी ' से लेके 'कवनो ठगवा नगरिया लूटल हो' तक कबीर बेरि-बेरि चेतावत बाड़न आ अपना 'पी' के रिझावे के अदो समुझावत बाड़न-

नैनों की करि कोठरी, पुतली पलंग बिछाय,
पलकों की चिक डारिके पिउ को लिया रिझाय.

कबीर के उलटबांसिओ मशहूर बाड़ी स-
बरिसे कम्मर, भींजे पानी!
ठाढ़े सिंह चरावे गाइ!

कबीर के जिनिगिए ना,मउवतो मानवता के सीख दे गइल. हिन्दू आ मुसलमान-दूनों अपना-अपना धरम के तौर-तरीका से उन्हुकर अंतिम संस्कार करे खातिर झगड़त रहलन,बाकिर जब लोथ देखल गइल त सभे दंग रहि गइल.उहवां पार्थिव शरीर के जगहा फूल रहे. झगड़ा अपने आप खतम हो गइल. सांचो ,दास कबीर जतन से ओढ़ी,ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया!

दरअसल कबीर भारतीय समाज में नवजागरण के अग्रदूत रहलन आ भोजपुरिया समाज के प्रगतिशील चेतना के प्रतीक पुरुष रहलन. उन्हुकर जयंती भोजपुरी दिवस का रूप में मनावल जा रहल बा. बाकिर जवना भोजपुरी खातिर कबीर आपन जिनिगी समर्पित कऽ देले रहलन, ओकरे आजु घोर उपेक्षा हो रहल बा आ संविधान के आठवीं अनुसूची में शामिल होखे खातिर लमहर समय से बाट जोहेके परि रहल बा. जवन भाषा में सभ तरह से समृद्ध साहित्य बा,देश-विदेश में फइलल-पसरल पचीस करोड़ के आबादी बा,स्नातकोत्तर स्तर तक पढ़ाई आ शोध के शृंखला बा,टीवी-फिलिम से शोहरत के बुलंदी बा,ओकरा संगें ई सियासी साजिश काहें? भोजपुरी दिवस संकल्पो लेबे के दिन बा. धरम के अच्छाई के आदर आ आडंबर-देखावा-रूढ़ि-अंधबिसवास के खिलाफत करत सामाजिक चेतना जगावे के उतजोग भोजपुरियत के प्रतीक संत कबीर का प्रति सांच सरधांजलि होई. (भगवती प्रसाद द्विवेदी वरिष्ठ साहित्यकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

पढ़ें Hindi News ऑनलाइन और देखें Live TV News18 हिंदी की वेबसाइट पर. जानिए देश-विदेश और अपने प्रदेश, बॉलीवुड, खेल जगत, बिज़नेस से जुड़ी News in Hindi.