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Bhojpuri: खरमास बितला के बादे जनजीवन पूरी तरह से पटरी पर आवेला

Bhojpuri: खरमास बितला के बादे जनजीवन पूरी तरह से पटरी पर आवेला

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खरमास महीना के हिन्दू धर्म में पौष महीना कहल जाला.एह साल खरमास 16 दिसंबर के चढ़त बा अउर 14 जनवरी के उतरत बा. ऋतु के हिसाब से एह समय शिशिर ऋतु चलत बा. अपना देश में तीन तरह के मौसम- जाड़ा, गर्मी, बरसात अउर छः तरह के ऋतु के वर्णन वेद में भी मिलेला. ग्रीष्म, वर्षा, हेमंत, शिशिर, शरद अउर बसंत.

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शिशिर ऋतु के बारे में यजुर्वेद में कहल गईल बा कि एह ऋतु में- वृक्षों की शोभा चली जाती हैं. दिन बल पूर्वक आगे बढ़ता है. भोजपुरी में कहल गईल बा कि “पूस के दिन फुस”. अपना देश में मौसम अउर ऋतु के खेती के संगे बड़ा नजदीकी सम्बन्ध बा. एकर बरनन एगो कविता में देखल जाय-पूस मास अति फूस ए सखि, जउवा फूटेला बालि/ एक बालि सुगवा ले आइत, दिहितीं लाख असीस.

भोजपुरी भाषा में ‘बारहमासा’ के खूब नीमन बरनन मालिक मुहम्मद जायसी जी कइलें बानी. विरह के बेधक बरनन उहां के बारहमासा गीतन में मिलेला. एगो अइसने गीत में विरहिणी के दशा के बरनन के देखल जाय-
पूस में सखि परेला कुहेरा, धूंध काल ना सूझहीं.
अस पुरुष असि नारि नाहीं, और सो मन लावहीँ..

एह महीना के खरमास कहें के पीछे एगो कथा परचलित बा. ‘खर’ के मतलब होला गदहा.कहल ई जाला कि सूर्य देवता सात घोड़ा वाला रथ पर सवार होके अनवरत पूरा ब्रह्मांड के चक्कर लगावें लें.एक बार एक सरोवर के पास, अपना रथ के रोक के घोड़न के पानी पिलावें लगलन. पानी पियला के बाद घोड़न में सुस्ती आ गईल. सूर्य देवता के पास में दुगो गदहा के चरत दिखाई देलन. सूर्य देवता अपना रथ में एह गदहन के अपना रथ में नाधी के रथ हांक दिहलन. एक महीना बाद, जब लौटलन तब फेरु से अपना घोड़न के रथ में जोते खातिर नधलन. लगातर चलला के बाद घोड़न के कुछ आराम मिलल. एकरा बाद घोड़ा फेरु अपना पहिले वाला चाल में पूरा बेग से दौड़ लगावें लगलन.

एह कथा के अलावा ज्योतिषीय गणना के हिसाब से सूर्य जब धनु राशि में प्रवेश करेलन,तब आपन सारा तेज गुरु के घर में समेट लेने.सूर्य के दूसरा राशि में प्रवेश के समय के संक्रांति काल कहल जाला. अइसन मान्यता बा कि जब सूर्य एह राशि में प्रवेश करेलन तब तमाम तरह के बीमारी, मन में चंचलता, ग्राहस्थिक जीवन में सुख-चैन-समृद्धि से वंचित होवें के पड़ेला. एह से शादी-सगाई, यज्ञोपवीत, गृहप्रवेश, मुंडन आदि संस्कार से परहेज करें के हिन्दू धर्म मे विधान बतावल बा. विवाह होई त शारीरिक आ भावनात्मक सुख ना नसीब होई. व्यवसाय में घाटा लागि. कर्ज बढ़ी जाई. गृह प्रवेश चाहें खरमास में नया घर बनवला पर परिवार कभी सुख-निरोग से ना रहीं पाई. एह खरमास काल में सब तरह के शुभ कार्य करें से मनाही बा. बाकी प्रेम विवाह, स्वंम्बर करें के मनाही नइखे. मांगलिक पूजा कार्य भी वर्जित नइखे.

समय चक्र बदला के बाद ही ग्राहस्थिक जीवन के नया सिरा से संजोये के कोशिश शुरू होला. खेती के काम में लागल किसानन के खेत में फसल देख के अभी मन में हुलास ना पैदा होला. काहे कि पौधन के बाढ़ अभी छोट रहेला. एह जाड़ा के रात में कहानीकार प्रेमचंद के कहानी “पूस की रात” के अक्सर याद आवेला. जब हल्कू किसान अपना पालतू कुकुर झबरा के संगे खेत के रखवारी में कड़कड़ाती ठंड के मार झेलत पशुअन से फसल के रक्षा खातिर खेत अगोरे के विवश रहलन. जब यकायक कउड़ा के गरमी पाकर थोड़ा झपकी लागल कि पशुअन के झुंड पूरा खेत चट कर गइलन.

अल सुबह जब मेहरारू खेत पहुँचल, त ई देखि के हैरान हो गईल कि अब साहूकार के कर्ज कइसे दियाई. हल्कू किसान एह बात से जरूर थोड़ा सकून महसूस कइलन कि अब कम से कम जाड़ा के ठिठुरत रात में खेत के रखवारी से त पिंड छूटी. बाकी साहूकार के कर्ज मेहनत-मजूरी कर के चुका दिहल जाई. दरअसल प्रेमचंद ‘पूस की रात’ कहानी के जरिये किसानन के खेती छोड़ि के मजदूर बनें के दास्तान बतावत बाड़न. आजु भी लगभग ऊहे स्थिति बा. छुटा गोवंश की वजह से हर गांव में किसानन के हल्कू किसान वाली जलालत झेले के पड़त बा. अब खेती- किसानी के काम अइसन फायदेमंद नइखे रही गईल. अगर खेती के अलावा कवनों और विकल्प मिलीं, तब एगो अनुमान के मुताबिक लगभग सत्ताईस सौ किसान प्रति दिन खेती छोड़े खातिर तैयार बाड़न.

एह तरह से देखल जाय तब, भले खरमास महीना में कवनों शुभ काम करें से मना कइल बा. बाकी किसानन खातिर एह महीना के बहुत लाभदायक भी न कहल जा सकें. एह समय खेती के नाव अभी बीच दरियाव मझधार में अटकल बा. खेत में पटवन से लेकर खाद-छिड़काव के में खर्च बढ़ल जाट बा. फसल पर कब मौसम के मार पड़ीं, ओह से कतना नुकसान होइ, ओकर कइसे भरपाई होई, एकर अनुमान अभी ना लगावल जा सकें.एह तरह से देखल जाय त भले कवनों शुभ काम खरमास महीना में ठीक ना मानल जाला. बाकि, खेती- किसानी के लिहाज से भी पूस महीना के हरहर फुलहल ना मानल जा सकें.

(मोहन सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

Tags: Article in Bhojpuri, Bhojpuri News

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