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Bhojpuri: जयंती पर जानीं ओह प्रेमचंद के जेकरा के रउआ ना जानेनी

आजु हिंदी के कथा सम्राट प्रेमचंद के जयंती ह

आजु हिंदी के कथा सम्राट प्रेमचंद के जयंती ह

आज हिंदी के महान कहानीकार प्रेमचंद जी के जयंती ह. प्रेमचंद के जन्म 31 जुलाई के भइल रहे. अइसे में आज हमनी के रउआ के ओह प्रेमचंद के बारे में बतावे जा तानी जा, जेकरा के रउआ शायद ना जानत होखब.

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आजु हिंदी के कथा सम्राट प्रेमचंद के जयंती ह. प्रेमचंद के असली नांव धनपत राय रहे. जब ऊ हिंदी में लिखे लगले त आपन नांव प्रेमचंद कइ लिहले.
भोजपुरिया माटी के लाल धनपतराय के भोजपुरी में एकहू रचना नइखे. देश में कम्युनिस्ट पार्टी में सक्रिय साहित्यकारन के पहल पर अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ के 1936 में स्थापना भइल रहे. ओकर पहिलका अधिवेशन लखनऊ में 9 आउर 10 अप्रैल 1936 के लखनऊ में भइल रहे, जवना के अध्यक्षता प्रेमचंद कइले रहले. एकरा बाद उनुका के वामपंथी मानहीं के रहे.

चूंकि मार्क्सवाद के प्रणेत मार्क्स बाबा धरम के अफीम घोषित कइ दिहले त वामपंथी धारा के लोग धरमे के खारिज करे लागल बा लोग. आजु मार्क्सवादी आ वामपंथी धारा के पत्रकार-लेखक लोगन से धरम आ भगवान पर लिखला के उमेदियो ना कइल जा सकेला. अगर लिखबो करिहें त ऊ भगवान के अस्तित्व के खारिज करिहें आ धरम के आलोचने करिहें. अइसना में सायदे केहू के भरोसा होई कि प्रेमचंद कबो भगवानो पर लेख लिखले होइहें.

बाकिर अइसन भइल बा. बहुत कम लोग जानता कि प्रेमचंद अइसनो लेखन कइले बाड़े. सनातन समाज के लोगन के गोरखपुर के गीता प्रेस के ठीक से पाता बा. आजु घर-घर में जवन राम चरित मानस, हनुमान चालीसा, गीता, महाभारत आदि-आदि धार्मिक ग्रंथ बाड़े स, ओह में ज्यादातर गीते प्रेस से छपल बा. गीता प्रेस से एगो पत्रिको निकलेले, जवना के नांव ह कल्याण. बहुत कम लोग जानता कि ऊ कल्याणो में लिखले बाड़े.

कल्याण के 1931 में एगो श्रीकृष्ण विशेषांक निकलल रहे. ओह में योगावतार श्रीकृष्ण शीर्षक से प्रेमचंद भगवान श्रीकृष्ण पर लिखले रहले. एह विषय पर हिंदी के दूगो शीर्ष साहित्यकारन में साल 2004 में जम के बहस चलल रहे.

प्रेमचंद 1932 में प्रकाशित ‘कल्याण’ के ईश्वरांक में भी लिखले रहले. एह खातिर ऊ ‘कल्याण’ के संस्थापक-संपादक भाई जी याने हनुमानप्रसाद पोद्दार के चिट्ठी के जवाबी पत्र भी लिखले रहले. ई चिट्ठी अच्युतानंद मिश्र के संपादन में प्रकाशित पुस्तक ‘पत्रों में समय-संस्कृति’ के पेज नंबर 40 पर छपल बा. हिंदी में छपल ई चिट्ठी प्रस्तुत बा,

गणेशगंज, लखनऊ
3/3/32
प्रिय बंधुवर,
बंदे
आपके दो कृपा पत्र मिले। काशी से पत्र यहां आ गया था। हंस के विषय में आपने जो सम्मति दी है, उससे मेरा उत्साह बढ़ा है। मैं कल्याण के ईश्वरांक के लिए अवश्व लिखूंगा।
क्या कहें, आप काशी गए और मेरा दुर्भाग्य कि मैं लखनऊ में हूं। भाई महावीर प्रसाद जी बाहर हैं या भीतर, यह मुझे ज्ञात नहीं। उनकी स्नेह स्मृतियां मेरे जीवन की बहुमूल्य वस्तु हैं। वह तो तपस्वी हैं, उन्हें क्या खबर कि ‘प्रेम’ भी कोई चीज है।
……………………..
भवदीय,
धनपत राय

प्रेमचंद जी के बारे में हमनीं के बचपने से पढ़त आइल बानीं जा कि उनुकर जीवन गरीबी में बीतल रहे.एह में काताना तथ्य भा आ काताना फसाना, एह के समझे खातिर काशी के रईस कला प्रेमी आ मसहूर लेखक राय कृष्णदास के बेटा राय आनंद कृष्ण के विचार देखे के चाहीं.
व्योमेश शुक्ल के साक्षात्कार पर आधारित ललित कला अकादमी से प्रकाशित पुस्तक ‘कला विमर्श’ पढ़ला के बाद प्रेमचंद जी के बारे में अलगे राय बनता.राय आनंदकृष्ण जवन व्योमेश शुक्ल के बतवले बाड़े, ओकर भोजपुरी अनुवाद इहवां पेश बा,

” बाबू जी (रायकृष्ण दास) के संगे (प्रेमचंद के) संहतियाई आपाना जगहि पर रहे, आ केस आपाना जगहि पर। उहन लोगन के रिस्ता में कवनों अंतर ना आइल रहे. रोजे प्रेस (प्रेमचंद के सरस्वती प्रेस) में दुपहरिया के खाना के छुट्टी भइला पर ऊ (प्रेमचंद) सभा (राय कृष्णदास के सभा) में आ जात रहले। थे। बाबूजी उहवें रहत रहले। कला भवनो उहवें रहे। उहवें बइठत रहले. ओही जगहहि पर बाबू जी के प्रेमचंद जी देखवले रहले कि उनुकरा बैंक के पासबुक में आठ हजार रूपया बा। तब के आठ हजार रूपया आजु (2016 ) के बारह लाख रूपया के बराबर रहे। प्रेमचंद जी आपाना दूनों लइकन के पढ़े खातिर मसूरी भेजले रहले। ऊ सब बहुते खर्चीला रहे. प्रेमचंद जी के खाए-पीए के कबो कवनो दिक्कत ना रहे. घर यानी लमही से सब रासन आवत रहे.जइसन उनुका गरीबी के प्रचार बा, ओइसन हालति उनुकर कबो ना रहे. उनुका प्रेस में किताबिन के भरपूर स्टाक रहे. प्रेमचंद के प्रसंग में भुखमरी आ गरीबी के जिकिर लोकापवाद बा. ऊ त श्रीपत आउर अमृत राय (प्रेमचंद के दूनों बेटा) जब कम्युनिस्ट लोगन के संगति में अइले, तब एहके बहुते उछालल गइल.”

इहवां ई बता देबे के बा कि प्रेमचंद जी सरस्वती प्रेस राय कृष्णदास के ही कोठी में किराया पर रहे आ किराया के लेके दूनों जना में मुकदमो चलत रहे.
कथा सम्राट के लेके जइसन परचार बा, ई बातन के भी जाने के चाहीं.

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