अपना शहर चुनें

States

Bhojpuri Special: काशी में 365 दिना में 365 भूखंड दान करय वाली महारानी, जानीं उनका बारे में

.
.

काशी में कई ठे महान योगी-संन्यासी पैदा भइलन त कई ठे राजा-महाराज, रानी-महारानी इहां आइके योगी बनि गइलन। पश्चिम बंगाल के नाटोर राज्य क महारानी रानी भवानी एही में से एक रहलीं।

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 22, 2021, 5:54 PM IST
  • Share this:
मुक्तिधाम काशी धर्म के साथ ही इतिहास क भी अनोखी नगरी हौ। इहां के मट्टी में धर्म-अध्यात्म अउर इतिहास क ढेर सारा किस्सा-कहानी दफन हयन, जवने के बारे में कम लोगन के जानकारी हौ। इहां कई ठे महान योगी-संन्यासी पैदा भइलन त कई ठे राजा-महाराज, रानी-महारानी इहां आइके योगी बनि गइलन। पश्चिम बंगाल के नाटोर राज्य क महारानी रानी भवानी एही में से एक रहलीं। काशी में उ हर रोज सबेरे गंगा नहइले के बाद एक भूखंड दान करय अउर इ सिलसिला पूरा एक साल तक चलल। यानी रानी भवानी 365 दिना में 365 संपत्ति दान कइ देहलिन। कम लोगन के पता हौ कि काशी में तमाम कुंड मंदिर, धर्मशाला रानी भवानी क बनवावल हयन। काशी में जेतना घाट, धर्मशाला, तलाब, कुंड, कुंआ, मंदिर हयन या त इंदौर क महारानी अहिल्या बाई बनवउले हइन या फिर रानी भवानी बनवउले हइन।

रानी भवानी ट्रस्ट क प्रबंधक श्यामा प्रसाद क कहना हौ कि महारानी के दान-पुण्य क परंपरा ट्रस्ट के तरफ से आज भी जारी रखल गयल हौ। समय-समय पर जरूरतमंदन के जरूरत क समान जइसे कपड़ा, कंबल, भोजन ट्रस्ट के तरफ से दान कयल जाला। काशी में रानी भवानी के हाथे क बनवावल तारा मंदिर में हर अमावस्या के विशेष काली क पूजन क आयोजन होला।

नाटोर एक समय बंगाल क एक बहुत बड़ा अउर संपन्न राज्य रहल। नाटोर क सीमा 13 हजार वर्गमील के क्षेत्र में फइलल रहल। नाटोर राज्य में वीरभूम, मुर्शिदाबाद, नादिया, राजशाही, पावना, बगुरा, रंगपुर, मैमन सिंह, जसोहर अउर ढाका जइसन नगर शामिल रहलन। बतावल जाला कि नाटोर रियासत क सालाना आमदनी ओह समय भी डेढ़ करोड़ रुपिया से अधिक रहल। रानी भवानी क जनम 1716 में बोगरा में एक गरीब बाभन परिवार मे भयल रहल। आठ साल के उमर में ही नाटोर महाराज क दत्तक पुत्र रमाकांत के संगे ओेनकर बियाह होइ गयल। रमाकांत बहुत अय्यास रहलन अउर भोग-विलास में पूरी तरह डूबि गयल रहलन। राजकाज क सारा बोझा रानी भवानी के ऊपर आइ गयल रहल। बाद में मराठा सरदारन के हमला में रमाकांत मारल गइलन। रानी भवानी बिधवा होइ गइलिन। एक ठे बिटिया रहल तारा सुंदरी, उहो बहुत कमय उमर में बिधवा होइ गइल। तारा सुंदरी संुदरता क खजाना रहलिन। बंगाल क नवाब सिराजुद्दौल क नजर तारा सुंदरी पर पड़ल त उ ओनकर दीवाना होइ गयल। उ तारा से बियाह करय क ठानि लेहलस।



रानी भवानी बिटिया के सिराजुद्दौला से बचावय बदे गंगा के रास्ते नावे से काशी आइ गइलिन। बाद में ओन्हय पता चलल कि सिराजुद्दौला भी काशी प्रस्थान कइ देहले हौ। फिर उ तारा से चर्चा कइलिन। तारा कहलिन कि हमय भले ही जिंदा जमीन में गाड़ि दिहा, लेकिन ओह पापी के हाथे मत पड़य दिहा। अंत में रानी भवानी करेजा पर पाथर रखि के बिटिया के जमीन में जिंदा गड़वाइ देहलिन, अउर समाधी के ऊपर रातोरात माई तारा क मूर्ति स्थापित कइके ओहमें प्राण प्रतिष्ठा कराइ देहलिन। ओकरे बाद ओही ठिअन एक ठे बहुत बड़ा मंदिर बनवउलिन। मंदिर 1752 में बनय शुरू भयल अउर छह साल में यानी 1758 में बनि के तइयार भयल। बनारस के पांडेय घाट महल्ला में मौजूद इ मंदिर आज ताराबाड़ी के नाम से जानल जाला। बंगाल क परसिद्ध शक्तिपीठ दक्षिणेश्वर मंदिर भी रानी भवानी क बनवावल हौ, जहां रामकृष्ण परमहंस के बोलउले पर माई काली हाजिर होइ जाय।
पहिले पति अउर फिर बिटिया के दुनिया से गइले के बाद रानी भवानी बिल्कुल अकेला पड़ि गइलिन। ओनके भीतर वैराग्य पैदा होइ गयल। दान-पुण्य क भावना ओनके भीतर अइसन समायल कि हर रोज उ गंगा नहइले के बाद एक संपत्ति दान करय लगलिन। इ सिलसिला पूरा एक साल तक चलल। जवने दिना दान लेवय वाला केव न रहय त कुमारस्वामी मठ क लोग मकान, भूखंड दान लेइ लेय। काशी में कुमारस्वामी मठ क जादातर संपत्ति रानी भवानी क दान देहल हौ। रानी भवानी एकरे अलावा साधु-संन्यासिन के, गरीबन, विधवन के हर रोज भोजन करावय। रोज कन्या क पूजा करय। काशी में दुर्गाकुंड से लेइके तमाम कुंड, तलाब, धर्मशाला रानी भवानी क बनवावल हयन। पंचकोसी मार्ग पर जादातर धर्मशाला ओनही क बनवावल हयन।

काशी के ताराबाड़ी या तारा मंदिर के बारे में कम लोगन के जानकारी हौ। लेकिन काशी में या संभवतः देश में इ अपने तरह क इकलौता मंदिर हौ, जहां विग्रह के नीचे एक राजकुमारी के जिंदा दफन कयल गयल हौ। रानी भवानी काशी के तारा मंदिर के पूजा अउर बाकी कुल परंपरा वीरभूम में स्थित मां तारा पीठ से जोड़ि देहले रहलिन। आज भी मंदिर ओही परंपरा से संचालित होला। मार्कंडेय पुराण में माई तारा क वर्णन हौ। माई तारा मतलब मनुष्य के तारय वाली माई। मार्कंडेय पुराण में कहल गयल हौ कि जब महामाया दुखिया संसार क रक्षा करय क सोचलिन तब उ काली अउर तारा सहित कुल 10 रूप धारण कइलिन। बाद में एही 10 रूपन से माई क अनगिनत रूप पैदा भइल अउर उ संसार क रक्षा कइलिन।

तारा मंदिर अपने बनावट के मामले में भी अनोखा हौ। मंदिर में कुल चार अंगना हयन। मुख्य अंगना में माई विशालाक्षी, राधा-कृष्ण, माई ललिता अउर गोपाल कृष्ण विराजमान हयन। पतील क गलियारा से दूसरे अंगना में पहुंचा त उहां अलग तरह क अनुभव होला। एही अंगना में राजकुमारी तारा सुंदरी क समाधी हौ अउर ओही समाधी पर माई नील तारा क विग्रह स्थापित हौ। माई तारा के तंत्र क देवी मानल जाला। एकरे बाद तीसरे अंगना में माई काली क मंदिर हौ। मंदिर के चउथे अंगना में महिषासुरमर्दिनी क अद्भुत विग्रह स्थापित हौ। मंदिर क स्थापत्य कला बहुत सुंदर हौ, जहां हर अंगना में खूबसूरत फव्वारा लगल हयन। नवरातर में इहां हर दिन कुमारी पूजा अउर चंडी हवन होला। गंगा के किनारे बसल पांडेय घाट महल्ला में पतली गली में मौजूद इ मंदिर बहरे से पता नाही चलत। लेकिन अंदर गइले के बाद मंदिर के महानता क अहसास होला। तारा मंदिर हर दिन सबरे साढे़ छह बजे से दुपहरे डेढ़ बजे तक अउर ओकरे बाद शाम के चार बजे से रात 10 बजे तक श्रद्धालुन के दर्शन बदे खुलल रहयला। सबेरे क आरती सात बजे अउर राती क आरती नौ बजे होला। (लेखक सरोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज