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Bhojpuri स्पेशल: कर्दमेश्वर महादेव काशी में 12वीं सदी क एकमात्र मंदिर, जानीं एह मंदिर के महत्व

काशी क महत्वपूर्ण धार्मिक यात्रा, पंचकोसी के दौरान पहिला पड़ाव कर्दमेश्वर महादेव ही होला।
काशी क महत्वपूर्ण धार्मिक यात्रा, पंचकोसी के दौरान पहिला पड़ाव कर्दमेश्वर महादेव ही होला।

काशी के एह कर्दमेश्वर मंदिर (Kardmeshwar Temple Kashi) के बारे में कहल जाला कि मंदिर क निर्माण चंदेल राजा करउले रहलन। कर्दम ऋषि इहां कई साल तक तपस्या कइले रहलन।

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 14, 2021, 6:24 PM IST
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काशी नगरी बाबा विश्वनाथ अउर गंगा के नाते जानल जाला। पौराणिक नगरी में पुराने मंदिरन क एक लंबी श्रृंखला हौ। लेकिन काशी में जेतना मंदिर आज अस्तित्व में हयन, ओहमें कर्दमेश्वर महादेव मंदिर क ढांचा सबसे पुराना हौ। काशी के कर्दमेश्वर महादेव क बहुत महत्व भी हौ। एह मंदिर क उल्लेख स्कंद पुराण के काशी खंड अउर पंचकोसी महात्म्य में भी मिलयला। मंदिर क संबंध कर्दम ऋषि से हौ, जवने के नाते ही इ कर्दमेश्वर महादेव मंदिर के नाम से प्रचलित हौ। मान्यता हौ कि मंदिर में शिवलिंग क प्राण प्रतिष्ठा कर्दम ऋषि कइले रहलन। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के दक्षिण पश्चिम में पांच किलोमीटर दूर कंदवा पोखरा के पश्चिमी किनारे पर मौजूद कर्दमेश्वर महादेव क मंदिर काशी में 11-12वीं सदी क अस्तित्व में मौजूद एक मात्र मंदिर हौ। काशी क महत्वपूर्ण धार्मिक यात्रा, पंचकोसी के दौरान पहिला पड़ाव कर्दमेश्वर महादेव ही होला। श्रद्धालु इहां एक दिन विश्राम करयलन, फिर अगले पड़ाव क यात्रा शुरू करयलन।

कर्दमेश्वर महादेव मंदिर के बारे में कई ठे कथा हौ। प्रचलित कथा के अनुसार, एक दिन प्रजापति कर्दम ऋषि शिव के पूजा में ध्यानमग्न रहलन। ओही समय ओनकर पुत्र कर्दमी अपने मित्रन के संघे तलाब में स्नान करत रहल। तलाब में घड़ियाल कर्दमी के खींचि लेइ गयल। कर्दमी क मित्र लोग कर्दम ऋषि के पास गइलन अउर ओन्हय घटना क पूरी जानकारी देहलन। लेकिन कर्दम ऋषि के ऊपर एह खबर क कवनो असर नाही पड़ल, उ आपना पूजा जारी रखलन। ध्यान के अवस्था में ही उ देखलन कि कर्दमी के एक ठे जल देवी सुरक्षित बचाइके ओन्हय समुद्र के सौंपि देहलस। समुद्र कर्दमी के भगवान शिव के गण के सौंपि देहलस। शिव के आज्ञा से शिव क गण कर्दमी के वापस ओनके स्थान पर पहुंचाइ देहलस। प्रजापति कर्दम जब आपन आंख खोललन तब कर्दमी के अपने सामने पइलन। एकरे बाद कर्दम ऋषि कर्दमी के काशी जाए क सलाह देहलन। कर्दमी काशी में पहुंचि के एक ठे शिवलिंग स्थापित कइलन अउर पांच हजार साल तक कठोर तपस्या कइलन। भगवान शिव प्रसन्न होइके कर्दमी के वरुणा के पश्चिम क्षेत्र में मौजूद प्रत्येक जलस्रोत क स्वामी घोषित कइ देहलन। भगवान शिव अपने दूसरे वरदान में कहलन कि मणिकर्णेश के दक्षिण-पश्चिम में जवन शिवलिंग स्थापित हौ, उ वरुणेश के नाम से जानल जाई। एकरे अनुसार वरुणेश मंदिर ही कर्दमेश्वर मंदिर हौ।

कहल इ भी जाला कि मंदिर क निर्माण चंदेल राजा करउले रहलन। कर्दम ऋषि इहां कई साल तक तपस्या कइले रहलन। ओनके तपस्या से प्रसन्न होइके भगवान विष्णु वरदान मांगय बदे कहलन। कर्दम ऋषि पुत्र क इच्छा प्रकट कइलन। ओकरे बाद कर्दम ऋषि कर्दम कूप बनवउलन। ओही कूप में उ अपने पत्नी देहुती के संगे स्नान कइलन। कहल जाला कि स्नान कइले के बाद दूनों पति-पत्नी जवान होइ गइलन। बाद में दूनों के कपिलमुनि के रूप में पुत्र रत्न क प्राप्ति भयल। कर्दम ऋषि जब तपस्या में लीन रहलन, ओही दौरान कवनो बाती पर ओनके आंखी में आंसू आइ गयल रहल। उहय आंसू जमा होइके उहां सरोवर बनि गयल। आज उहय सरोवर कंदवा पोखरा के नाम से परसिद्ध हौ। मान्यता हौ कि पोखरा में जे भी आपन परछाई देखि लेला, ओकर उमर बढ़ि जाला। मान्यता इ भी हौ कि कंदवा पोखरा में स्नान कइके कर्दमेश्वर महादेव क दर्शन कइले से देव ऋण से मुक्ति मिलि जाला।



काशी खंड अउर तीर्थ विवेचन खंड के अनुसार, मंदिर में स्थापित वरुणेश लिंग गहड़वाल काल क हौ, जवने क संबंध कर्दम से हौ। मूर्तिकला के लिहाज से इ मंदिर चंदेल इतिहास क एक प्रतीक हौ। संभवतः उत्तर भारत स्थापत्य कला क इ अंतिम कड़ी हौ। एक अभिलेख के अनुसार, जवने चतुर्भुज तलाब के किनारे इ मंदिर मौजूद हौ, ओकरे घाटे क निर्माण बंगाल के नाटोर राज्य क महारानी रानी भवानी 1751 या 1757 में करउले रहलिन। मौजूदा मंदिर क दीवार देखि के लगयला कि मंदिर 12वीं सदी के बाद बनल हौ। मंदिर क बाकी हिस्सा मध्यकालीन स्थापत्य क आभास करावयला। एह आधार पर कहल जाइ सकयला कि पूरे मंदिर क निर्माण 12वीं शताब्दी के बाद कवनों पुराने मंदिर के ध्वंसावशेष पर भयल होई। नागर शैली में निर्मित इ मंदिर वास्तु योजना के अनुसार, पंचरथ प्रकार क हौ। मंदिर के योजना में एक चैकोर गर्भगृह, अंतराल अउर एक चैकोर अर्धमंडप बनल हौ। मंदिर क निचला हिस्सा अधिष्ठान, बीच क दीवार मांडोवर भाग हौ। दीवार पर सुंदर ताखा बनल हयन। मंदिर के ऊपरी हिस्सा में नक्काशीदार कंगूरा वरांदिका अउर आमलक सहित खूबसूरत शिखर हौ।
मंदिर क मुख्य दरवाजा पूरब की ओर हौ, जवने क चैड़ाई तीन फुट पांच इंच अउर ऊंचाई छह फुट हौ। वास्तुशिल्प अउर मूर्तिशिल्प के लिहाज से इ मंदिर बहुत ही सुंदर हौ। कर्दमेश्वर मंदिर के अर्धमंडप के दूनों खंभन पर अभिलेख मौजूद हयन, जवन 14वीं-15वीं शताब्दी क हयन। कर्दमेश्वर मंदिर के दीवार पर जवन मूर्ति बनावल गयल हयन ओहमें वामन, अर्धनारीश्वर, ब्रह्मा अउर विष्णु के अलावा कई देवी-देवता हयन। दीवार पर उत्कीर्ण मूर्ती सामान्य तरह क हयन। लेकिन दक्षिणी दीवार पर बनल उमा महेश्वर जइसन कुछ मूर्ती खजुराहो के मंदिरन में मौजूद आकृतिन जइसन हयन। एही तरह से उत्तरी दीवार पर मौजूद रेवती अउर ब्रह्मा के मूर्ती के केश के सजावट से मंदिर पर साफ तौर पर गुप्तकालीन मूर्तिकला क प्रवाव देखाला। मंदिर चूंकि बहुत प्राचीन हौ, अउर एकरे निर्माण क सही-सही समय क पता नाही हौ, एह के नाते एकरे देख-रेख क पूरा जिम्मा उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व विभाग के वाराणसी इकाई के पास हौ।
(सरोज कुमार जी वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हईं)
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