Bhojpuri: वाराणसी जयंती पर जानीं कइसे काशी भयल रहे वाराणसी

24 मई को काशी का नाम बदलकर वाराणसी किया गया.

24 मई को काशी का नाम बदलकर वाराणसी किया गया.

वाराणसी नाम दरअसल इहां मौजूद दुइ नदीन से लेहल गयल बतावल जाला -वरुणा अउर असी. वरुणा नदी फूलपुर के ताल से निकलि के आदिकेशव घाट के पास गंगा में मिलल हौ. असी नदी भदैनी के पास गंगा में मिलल हौ. इ दूनों संगम के बीच के क्षेत्र के ही वाराणसी कहल जाला. गंगा के अलावा वरुणा अउर असी नदी क भी पौराणिक महत्व हौ.

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दुनिया क एक सबसे पुराना नगर, देश क संस्कृति अउर विद्या क राजधानी, बाबा विश्वनाथ क नगरी काशी क अनेक नाम हौ, जवने में से 12 नाम परसिद्ध हयन -काशी, वाराणसी, अविमुक्त क्षेत्र, आनंदकानन, महाश्मशान, रूद्रावास, काशिका, तपःस्थली, मुक्तिभूमि, शिवपुरी, त्रिपुरारिराजनगरी, अउर विश्वनाथनगरी. लेकिन काशी क अधिकारिक नाम अब वाराणसी हौ. वाराणसी गजेटियर के अनुसार, काशी क वाराणसी करण 24 मई, 1956 के भयल रहल. ओह समय डॉ. संपूर्णानंद उत्तर प्रदेश क मुख्यमंत्री रहलन, अउर देश क प्रधानमंत्री रहलन पंडित जवाहरलाल नेहरू. डाॅ. संपूर्णानंद काशी क ही रहलन अउर उ काशी नगरी क अधिकारिक नाम भी काशी ही रखय चाहत रहलन. लेकिन नेहरू दबाव बनाइ के काशी के वाराणसी कराइ देहलन.

वाराणसी नाम दरअसल इहां मौजूद दुइ नदीन से लेहल गयल बतावल जाला -वरुणा अउर असी. वरुणा नदी फूलपुर के ताल से निकलि के आदिकेशव घाट के पास गंगा में मिलल हौ. असी नदी भदैनी के पास गंगा में मिलल हौ. इ दूनों संगम के बीच के क्षेत्र के ही वाराणसी कहल जाला. गंगा के अलावा वरुणा अउर असी नदी क भी पौराणिक महत्व हौ. तीनों नदी बहुत पवित्र मानल जालीन. वाराणसी नाम भले ही वरुणा अउर असी से लेहल गयल बतावल जाला, लेकिन इ नाम क जिक्र वेद में भी मिलयला. अथर्ववेद में वाराणसी क जिक्र वर्णावती नदी के रूप में कयल गयल हौ. असी नदी के पुराण में अस्सिंभेद तीर्थ कहल गयल हौ. अग्निपुराणा में असी नदी क नाम नासी हौ. वाराणसी क जिक्र मत्स्यपुराण में भी हौ. मत्स्यपुराण में भगवान शिव पार्वती से वाराणसी के बारे में कहले हउअन -

वाराणस्यां नदी पु सिद्धगंधर्वसेविता.

प्रविष्टा त्रिपथ गंगा तस्मिन्न क्षेत्रे मम प्रिये.
एकर अर्थ हौ - हे प्रिया, सिद्धगंधर्व से सेवित वाराणसी में जहां पुण्य नदी त्रिपथा गंगा बहयला, उ स्थान हमय प्रिय हौ. इहां असी नदी क जिक्र नाहीं आयल हौ. वाराणसी क्षेत्र के विस्तार के बारे में मत्स्यपुराण में एक जगह अउर कहल गयल हौ -

वाराणसी नदीमाय यावद्यावच्छुष्क नदी तवै.

भीष्मचंडीकमारम्भ पर्वतेश्वरमंतिके.



यानी वाराणसी क पूरब से पश्चिम वरुणा से असी तक क लंबाई दुइ या ढाई योजन हौ. अउर चैड़ाई भीष्मचंडी से पर्वतेश्वर तक आधा योजन. पुराण के एह बात में अउर मौजूदा वाराणसी क्षेत्र के विस्तार क्षेत्र में कवनों अंतर नाहीं हौ.

हलांकि काशी क जिक्र भी पुराण में आयल हौ. स्कंद महापुराण में त पूरा एक खंड ही काशी पर हौ, जवने क शीर्षक काशीखंड देहल गयल हौ. काशीखंड में काशी क परिचय, महात्म्य अउर ओकरे आदिदैविक स्वरूप क वर्णन कयल गयल हौ. काशीखंड में 100 अध्याय अउर 11 हजार से अधिक श्लोक हयन. श्लोक के जरिए काशी के तत्कालीन भूगोल, प्राचीन मंदिरन के निर्माण क कथा, मंदिरन में मौजूद देवी-देवतन क परिचय, काशी क इतिहास अउर परंपरा के बारे में बतावल गयल हौ. काशी के महिमा क बखान एक दइया स्वयं भगवान विश्वनाथ भगवती पार्वती से कइले रहलन. इ बखान ओनकर पुत्र कार्तिकेय यानी स्कंद अपने माई के गोदी में बइठल-बइठल सुनले रहलन. कार्तिकेय बाद में काशी महिमा क वर्णन अगस्त्य ऋषि से कइलन. अउर उहय कुल कथा स्कंदपुराण के काशीखंड में मौजूद हौ.

बहरहाला, मुख्यमंत्री डॉ. संपूर्णानंद के पहल पर वाराणसी क अधिकारिक स्वीकृति बहुत ही शुभ मुहूर्त में देहल गयल रहल. ओह दिना एक त वैशाख पूर्णिमा रहल, अउर दूसरे चंद्रग्रहण क भी संयोग रहल. संपूर्णानंद क ज्योतिष अउर खगोलशास्त्र में गहरी रुचि रहल. अपने समय में उ दूनों विद्या के काफी बढ़ावा भी देहलन. संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में खगोल अउर ज्योतिष विद्या से संबंधित शोध अउर अध्ययन केंद्र क स्थापना एकर प्रमाण हौ.

संपूर्णानंद हलांकि बाबा काशी विश्वनाथ के नाते नगर क अधिकारिक नाम काशी ही रखय चाहत रहलन. लेकिन नेहरू वैज्ञानिक सोच क रहलन अउर उ कवनों भी काम वैज्ञानिक तर्क के अधार पर ही करय. ओन्हय वाराणसी नाम जादा वैज्ञानिक अउर तर्कसंगत लगल, काहें से कि इहां वरुणा अउर असी नदी क प्रवाह मौजूद हौ. दूनों नदी गंगा में मिलल हइन, अउर दूनों संगम के बीच मौजूद क्षेत्र ही वाराणसी हौ. वाराणसी नामकरण के पीछे इहय तर्क प्रचारित अउर प्रसारित भी कयल गयल. प्रधानमंत्री के जोर देहले के नाते संपूर्णानंद के झुकय के पड़ल अउर कागज में काशी वाराणसी के नाम से दर्ज होइ गयल. लेकिन बोल-चाल के भाषा में आज भी लोग झूमि के वाराणसी के काशी अउर बनारस कहयलन. (लेखक सरोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

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