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Bhojpuri Special: देशभर में मकर संक्रांति, लेकिन बिहार में कहल जालाss खिचड़ी

बिहार में मकर संक्रांति के खिचड़ी कहल जाला, जानीं एकर का महत्व बा.
बिहार में मकर संक्रांति के खिचड़ी कहल जाला, जानीं एकर का महत्व बा.

धार्मिक शास्त्र के अनुसार, मकर संक्रांति से सूर्य देव के रथ उत्तर दिशा के ओर मुड़ जाला. तब सूर्य देव के मुख पृथ्वी के ओर हो जाला आ उ पृथ्वी के निकट आवे लागेलें. जइसे-जइसे उ पृथ्वी के ओर बढ़ेलें, ओइसे-ओइसे सर्दी कम होखे लागेला आ गर्मी बढे लागेला. फसल पाके लागेला.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 13, 2021, 1:38 PM IST
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अब लगन चरचराए लागी..अगुआ लोग गंवागईं घूमी. शुभ आ नया काम शुरू कइल जाई.
आज मकर संक्रांति ह. हमनी किहां खिचड़ी कहल जाला, खाये वाला ना मनावे वाला. अइसे एह दिन खिचड़ी खइला के एगो अलगे महत्व बा आ तिल-तिलकुट-तिलवा, दही-चिउरा खइला के अलगे. ऐतिहासिक आ वैज्ञानिक महत्व.
दरअसल हिन्दू धर्म में मकर संक्रांति के विशेष महत्व बा. सुरुज भगवान जब मकर राशि में प्रवेश करेलें, त उ घटना सूर्य के मकर संक्रांति कहाला. सूर्य के मकर राशि में आवते मांगलिक कार्य जइसे कि बिआह, मुंडन, जनेऊ, गृह प्रवेश आदि होखे लागेला. मकर संक्रांति के भगवान सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होलें. मकर संक्रांति के आगमन के साथ ही एक माह के खरमास खत्म हो जाला.
धार्मिक शास्त्र के अनुसार, मकर संक्रांति से सूर्य देव के रथ उत्तर दिशा के ओर मुड़ जाला. तब सूर्य देव के मुख पृथ्वी के ओर हो जाला आ उ पृथ्वी के निकट आवे लागेलें. जइसे-जइसे उ पृथ्वी के ओर बढ़ेलें, ओइसे-ओइसे सर्दी कम होखे लागेला आ गर्मी बढे लागेला. फसल पाके लागेला. शास्त्र एगो अउर बात बतावेला, दक्षिणायन के देवता लोग के रात्रि अर्थात् नकारात्मकता के प्रतीक आ उत्तरायण के देवता लोग के दिन अर्थात् सकारात्मकता के प्रतीक मानल गइल बा. एही से एह दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलाप के विशेष महत्व बा. अइसन धारणा बा कि एह अवसर पर दिहल गइल दान से सौ गुना बढ़के पुण्य प्राप्त होला. एह दिन शुद्ध घी आ कम्बल के दान मोक्ष दियावेला. जइसन कि निम्न श्लोक से स्पष्ठ होता -
माघे मासे महादेव: यो दास्यति घृतकम्बलम।
स भुक्त्वा सकलान भोगान अन्ते मोक्षं प्राप्यति॥
मकर संक्रान्ति के अवसर पर गंगास्नान आ गंगातट पर दान के अत्यन्त शुभ मानल गइल बा. एह पर्व पर तीर्थराज प्रयाग आ गंगासागर में स्नान के महास्नान के संज्ञा दीहल गइल बा. आज के दिन सूर्य देव के लाल वस्त्र, गेहूं, गुड़, मसूर दाल, तांबा, स्वर्ण, सुपारी, लाल फूल, नारियल, दक्षिणा आदि अर्पित कइल आ दही-चूड़ा के साथ तिलकुट खाइल अत्यंत शुभकारी होला.



गाँवे वाला पंडी जी बतावेनी कि तिल के सीधा संबंध शनि से बा. एही से मकर संक्रांति के दिन तिल आ गुड़ खाये के परंपरा बा. एह से शनि, राहू आ केतु से संबंधित सारा दोष दूर हो जाला. आयुर्वेद में भी ठंड के मौसम में तिल-गुड़ खाइल बहुत अच्छा आ स्वास्थ्यवर्धक मानल गइल बा. इ शरीर के गर्म रख के इम्यून सिस्टम के मजबूत बनावेला. तिल में मौजूद तेल शरीर के तापमान के सही रखेला. उहवें गुड़ के तासीर गर्म होला आ एह में मौजूद आयरन आ विटामिन सी गला आ सांस के परेशानी के दूर करेला. एही से मकर संक्रांति के दिन तिल आ गुड़ के ढेर आइटम बनेला आ खाइल जाला.

ओही तरे मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी खइला के एगो अलगे महत्व बा. धर्म वैज्ञानिक पंडित वैभव जोशी के अनुसार मकर संक्रांति पर खिचड़ी के परंपरा सदियन पहिले बाबा गोरखनाथ शुरू कइले रहलें. ज्‍योतिषशास्‍त्र के मुताबिक खिचड़ी के मुख्‍य तत्‍व चावल आ जल चंद्रमा के प्रभाव में होला आ एह दिन खिचड़ी में डालल जाये वाली उड़द के दाल के संबंध शनि देव से मानल गइल बा. उहवें हल्‍दी के संबंध गुरु ग्रह से, हरी सब्जियन के संबंध बुध से आ खिचड़ी में पड़े वाला घीव के संबंध सूर्य देव बा. एकरा अलावा घी से शुक्र आ मंगल भी प्रभावित होला. अर्थात मकर संक्रांति पर खिचड़ी खइला से आरोग्‍य में वृद्धि होला.

खिचड़ी पर गंवई आनंद कुछ अलगे रहेला
ई सब त ज्ञान-विज्ञान आ दर्शन के बात भइल बाकिर खिचड़ी के त्यौहार के गंवई आनंद कुछ अलगे रहे. अब त गांवों बदल गइल बा. ना बगइचा में पतई बीनत गोड़िन लउकत बाड़ी ना गोंसार झोंकात लउकत बा. गोंसार के पलानी वीरान बा. ओह पलानी के आगे-पाछे पतहर-बोझा राखल देख के मन में तनी मसोस त होते बा. बाजार खिचड़ी खातिर अलगे सजल बा. पॉलिथीन में लाई, चिउरा के भूजा आ गुड़ के कई गो फुटपाथी दुकान एक जोराहे से लागल बा. ब्रांडेड कंपनी के तिलकुट के डिब्बो के दुकान लागल बा. गया के तिलकुट छपरा, सीवान, गोपालगंज के चट्टी-बाजार प आपन कब्जा जमा लिहले बा. खिचड़ी के पांच दिन पहिलहीं से घरे-घरे तिलवा पराये लागी, गोसार गुलजार रही. काकी, ईया गांव भर के खबर एक दोसरा से साझा करिहे. दउरी-सिकउती में आनाज लिहले गोसार जाये वाली लइकियन के रेला लागल रही. नदिया के नदिया दही बहंगी प लदले टोला-मोहल्ला घूम-घूम के बेचे वाला अब गायब बाड़े. डेयरी कंपनी के दूध-दही गांव के गुमटी तक आपन पहुंच बना लिहले बा. एह तरह से गांव के अब नजारा दोसरे बा.
खिचड़ी खाली एगो परब ना हवे, ई सामाजिक सद्भाव के एगो अइसन त्योहार हवे, जवन संस्कार से ले के आपसी मेलजोल के धागा के बरियार करेला. जवना आंगना में तिल-चिउरा-लाई के तिलवा बान्हें खातिर अड़ोस-पड़ोस के चाची-काकी-भउजी जुटत रहली आजु ऊ सब आंगना छोट हो गइल बा.
एह सब के बावजूद आजो खिचड़ी के त्योहार त मनावले जाता, बाकिर अब ऊ पहिले वाला माहौल नइखे रह गइल. ना दही के बयाना देवे के झंझट बा ना तिलवा पारे के टेंशन. सब कुछ बनल बनावल बाजार में मौजूद बा. ह, गांव के कुछ प्रतिष्ठित परिवार किहाँ खिचड़ी के अवसर पर दही-चिउरा के भोज जरुर आयोजित कइल जाता. एह पारी खिचड़ी के त्यौहार पर होखे वाला पंचायत चुनाव के ले अबहिये से चुनावी चौकस सजे लागल बा.

खिचड़ी के ले के नहान के मेला के रंगो बेरंग बा, कोरोना के कहर के असर अबहियो झलकता. भलहीं गांव-देहात में कोरोना के ओतना दुष्प्रभाव भा आतंक नइखे बाकिर मेला-ठेला सरकार के दिशा-निर्देश के चलते प्रभावित बा. एही मौका प बिहार के सुप्रसिद्ध हरिहर क्षेत्र के मेलो एह साल आयोजित नइखे भइल. ना त गंवई नवजवानन खातिर खिचड़ी के दिने गंगा में नहान के बाद दिन भर मेला घूमे आ राति के थियेटर देखे के लोभ ना छूटत रहे. बाकिर एहिजा के थियेटर बॉलीवुड के फिल्म के आगे आपन अस्तित्व बचावे खातिर अश्लीलता के भंवर में समाये लागल बा. अब के माहौल में कहलो जाला कि हरिहर क्षेत्र के मेला के थियेटर आजु के थर्ड ग्रेड के सिनेमा से भी गइल गुहाइल हो गइल बा.

एकही चीज लउकल जवन तबो रहे आ आजो बा- खिचड़ी के दिने तिल-चिउरा, सीधा छु के पंडित जी के दान देवे के परंपरा. आजो पंड़ित जी के घरे दही-चिउरा खाये के न्यौता दिहल जाता. ह, पंतग बाजी खातिर अब मांझा बनावे के लेके लइकन में कवनो खास उत्साह नइखे ना चिक्का-कबड्डी खातिर उतजोग. साँच कहीं त अब गांवा-गांई क्रिकेट टूर्नामेंट आयोजित हो रहल बा भा चुहानी में बइठ के मोबाइल गेम चलता.
आजु गांव संक्रमण के दौर से गुजर रहल बा... आ एह सक्रमण से निपटे खातिर ‘एंटी बायोटिक’ दूर-दूर तक नइखे लउकत. हाथे-हाथे फोन के उपलब्धता के बावजूद लोग के बीचे आपस में दूरी पहिले के अपेक्षा जादा बढ़ल बा. खिचड़ी के त्योहार एह दूरी के पाटे में सहायक हो सकता बाकिर इहे ना, लगभग सब त्योहार बस रस्म अदायगी भर रह गइल बा.

मशीनीकरण के बढ़ला से पशुधन गांव से गायब हो रहल बाड़े. बाछा बियइला प पशुपालक के चेहरा प जवन चमक आवत रहे आजु उ चमक उदासी में गइल बा. कारण कि गांव में बैल के उपयोगिता नगण्य हो गइल बा. पशुधन के लगातार कम होखे से ना खाली दूध-दही के सहज उपलब्धता खतम भइल बा बलुक एकरा साथहीं जैविक खाद के कमी से गांव जूझ रहल बा. रासायनिक खाद के उपयोग के दुष्प्रभावो साक्षात लउकता. खेत उसर होत जात बाड़ी स. रोजगार सिमटता, पलायन जारी बा. महानगर, शहर आ कस्बा से लॉकडाउन में मेहनत मजूरी करे वाला जवन लोग गांवे आइल, ओकरा में अधिकांश लोग अब ले गांवहीं अटकल बा. रोजगार बा ना, खेती बंटत-बंटत रकबा में अतना छोट आ उसर-पासर भइल बा कि ओकरा से गुजारा संभव नइखे. एह बीचे पारिवारिक रार आ झूर-डरेर के फरिअवता से अलगे तनाव के माहौल सृजित भइल बा. हालात अइसन बा कि अब सुरुका धान के चिउरा कहीं देखे के नइखे मिलत. ई तथाकथित सभ्य आ विकसित गंवई समाज के विद्रूपता भरल दौर बा. खिचड़ी यानी कि मकर संक्रांति मोक्ष के द्वार खोले वाला पर्व हवे. एह दिन से सूर्य के तपिस बढ़े लागेला आ ओकरा से असीम ऊर्जा मिलेला. एह ऊर्जा से गांव ऊर्जावान होखे. तबे गांव में सकारात्मक बदलाव फेर लउकी. एह साल के खिचड़ी से बस अतने आकांक्षा बा.
( लेखक मनोज भावुक भोजपुरी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं.)
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