Bhojpuri: दलितन बदे कइसे खुलल काशी विश्वनाथ क दरवाजा, पढ़य पूरी कहानी

दलित समुदाय क लोग कवने मनोदशा में रहत रहल होइहय, कल्पना कयल जाइ सकयला. महात्मा गांधी के अपील के बाद भी काशी क सनातनी पंडा-पुरोहित विश्वनाथ मंदिर में दलितन के प्रवेश देवय के तइयार नाहीं रहलन. समाज के एक वर्ग के साथ इ अन्याय शहर के कई लोगन के खलत रहल. लेकिन आगे आवय क हिम्मत केव नाहीं कइ पावत रहल. अंत में समाजवादी नेता राजनारायण इ बीड़ा उठइलन.

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  • Last Updated: April 28, 2021, 3:12 PM IST
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छुआछूत अउर ऊंच-नीच क समस्या समाज क कोढ़ हौ. महात्मा गांधी इ बात अइसय नाहीं कहले रहलन. पुराने जमाने में इ समस्या एतनी बिकराल रहल कि दलित जाति क लोग ऊंच जाति के कुंआ से पानी न भरि पावय. दलित लोग नटई में घंटी बांधि के चलय, ताकि ऊंच जाति के लोगन के दूरय से पता चलि जाय कि कवनों दलित आवत हयन. दलितन के मंदिरन में प्रवेश क अनुमति नाहीं रहल. अजादी के आंदोलन के समय महात्मा गांधी एह समस्या के खिलाफ भी अभियान चलउलन. छुआछूत अउर समाज में भेदभाव मिटावय क बहुत प्रयास कइलन. प्रयास में काफी सफलता भी मिलल, लेकिन बीमारी पूरी तरह से आज भी खतम नाहीं होइ पइले हौ. दलित उत्पीड़न क खबर अक्सर सुनय के मिलयला.

भगवान शिव के दबे-कुचले लोगन क देवता मानल जाला, लेकिन काशी में ओनही के मंदिर में दलितन के दर्शन क अनुमति नाहीं रहल. दलित समुदाय क लोग कवने मनोदशा में रहत रहल होइहय, कल्पना कयल जाइ सकयला. महात्मा गांधी के अपील के बाद भी काशी क सनातनी पंडा-पुरोहित विश्वनाथ मंदिर में दलितन के प्रवेश देवय के तइयार नाहीं रहलन. समाज के एक वर्ग के साथ इ अन्याय शहर के कई लोगन के खलत रहल. लेकिन आगे आवय क हिम्मत केव नाहीं कइ पावत रहल. अंत में समाजवादी नेता राजनारायण इ बीड़ा उठइलन.

काम आसान नाहीं रहल, काहे से कि काशी क सनातनी पंडन-पुरोहितन क मानना रहल कि दलितन के मंदिर में प्रवेश कइले से मंदिर अपवित्र होइ जाई अउर मंदिर अपवित्र भइले के बाद काशी में दर्शनार्थी न अइहय अउर ओनकर रोजी-रोटी खतम होइ जाई. काशी आवय वाले जजमानन से ही पुरोहितन क रोजी-रोटी चलत रहल, एह के नाते उ कवनों भी हालत में मंदिर के पवित्रता के साथ समझौता करय के तइयार नाहीं रहलन. एकरे बदे उ मरय अउर मारय पर उतारू रहलन. लेकिन राजनारायण विश्वनाथ मंदिर में दलितन क प्रवेश करावय क संकल्प लेइ लेहले रहलन अउर उ अइसन नेता रहलन कि जवन ठानि लेय ओहसे पीछे न हटय, परिणाम चाहे जवन होय.

साल 1956 क उ दौर बनारस क पुरनियां लोग आज भी याद करयलन. राजनारायण ओह समय पहिली बार विधायक भयल रहलन. मन में समाजवादी जुनून रहल अउर तन में 39 के उमर क ताकत. बाबा के मंदिर में दलितन क प्रवेश करावय क राजनारायण ऐलान कइ देहलन. ऐलान के साथ ही शहर में चर्चा क बजार गरम होइ गयल. हर तरफ बस एही बात क खुसुर-फुसुर -अब का होई, अब का होई. दूसरी ओर एह ऐलान से सनातनी पंडा-पुरोहित भी आगबबूला. अनहोनी के आशंका के चलते प्रशासन मुस्तैद होइ गयल. काशी विश्वनाथ मंदिर के आसपास पुलिस क भारी तैनाती कइ देहल गयल. माहौल पूरी तरह तनावपूर्ण, लेकिन राजनारायण अपने ऐलान पर अडिग. एह काम में ओनके साथ ओनकर समाजवादी साथी प्रभुनारायण सिंह भी रहलन.
दलितन के मंदिर प्रवेश करावय क सत्याग्रह शुरू होइ गयल. सत्याग्रह लगभग एक महीना तक चलल. रोज दलित सत्याग्रही मंदिर बदे निकलय, अउर गिरफ्तार कइ लेहल जाय. एही दौरान एक दिन राजनारायण अउर प्रभुनारायण सिंह दलित सत्याग्रही दस्ता क नेतृत्व करत क विश्वनाथ गली के ओर बढ़लन. पुलिस क जवान दस्ता के रोकय क कोशिश कइलन, जवने के बाद उहां धक्का-मुक्की होवय लगल अउर अफरा-तफरी मचि गयल. राजनारायण कवनो भी हालत में पीछे हटय के तइयार नाहीं रहलन. एही दौरान पुलिस के साथ उहां मौजूद पंडा-पुजारी सत्याग्रही दस्ता पर हमला बोलि देहलन. विश्वनाथ गली सत्याग्रहीन से ठसाठस भरल रहल. ओही भीड़ में राजनारायण अउर प्रभुनारायण सिंह पीटल अउर घसीटल जात रहलन. दूनों नेतन के घसीटि के गली से बहरे सड़क तक लियावल गयल अउर पुलिस के गाड़ी में भरि के जेल भेजि देहल गयल.

इ खबर पूरे प्रदेश में आगी की नाईं फइलि गइल. आंदोलन क आग भभकि उठल. आंदोलन के उग्र होत देखि के राज्य सरकार के पसीना छूटय लगल. मुख्यमंत्री डाॅ. संपूर्णानंद के हस्तक्षेप करय के पड़ल. राज्य के मंदिरन में दलितन क प्रवेश सुनिश्चित करय बदे नया कानून बनल. काशी विश्वनाथ मंदिर में दलित लोग जाइ के दर्शन-पूजन कइलन. राजनारायण क संकल्प पूरा होइ गयल. आज अगर बाबा के मंदिर में हर धर्म-जाति क लोग बिना रोक-टोक के जाइ के दर्शन-पूजन कइ पावत हयन त एकर पूरा श्रेय राजनारायण के जाला.

लेकिन एह घटना के बाद करपात्रीजी महाराज अउर तत्कालीन काशी नरेश विभूति नारायण सिंह बहुत व्यथित भइलन अउर दूनों जने विश्वनाथ मंदिर में जाब छोड़ि देहलन. करपात्रीजी कहलन कि दलितन के गर्भगृह में गइले से शिवलिंग अपवित्र होइ गयल अउर अब उ ईश्वरविहीन सामान्य पत्थर रहि गयल हौ. महराजजी घोषणा कइलन कि अब उ कभी भी विश्वनाथ मंदिर न जइहय. एकरे साथ ही उ अपने दर्शन-पूजन बदे मीरघाट में एक नया शिव मंदिर क निर्माण करउलन. पत्रकार लोग जब ओनसे पूछलन कि शिवलिंग ईश्वरविहीन कइसे होइ गयल? त उ कहलन कि ’’बाबा विश्वनाथ शिवलिंग से निकलि के चलि गइलन अउर अब उ उहां नाहीं हयन.’’ जब पत्रकार लोग पूछलन कि एकर प्रमाण का हौ, का उ बाबा के निकलि के जात क देखलन? एह सवाल पर करपात्रीजी कहलन कि ’’हां, हम देखे.’’



बाबा क मंदिर आज भी उहय हौ, शिवलिंग भी उहय हौ. अलबत्ता मंदिर क विस्तार होत हौ. बगल में मौजूद ज्ञानवापी मस्जिद के भी मंदिर में मिलावय क कवायद चलत हौ अउर मामला अदालत पहुंचि गयल हौ. अदालत ज्ञानवापी मस्जिद क भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग से सर्वेक्षण करावय क आदेश देइ देहले हौ. हिंदू पक्षकारन क मानना हौ कि ज्ञानवापी मस्जिद जहां मौजूद हौ, उहां पहिले विश्वनाथ मंदिर रहल अउर मुगल बादशाह औरंगजेब मंदिर तोड़वाइ के मस्जिद बनवइलस. एह के नाते ज्ञानवापी मस्जिद वापस विश्वनाथ मंदिर के सौंपल जाय. (लेखक सरोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)
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