Bhojpuri: महामारी से कइसे जूझतारे स गांव, जानीं हाल!

कोरोना महामारी अब देश के गांवों तक पहुंच गई है.

कोरोना महामारी अब देश के गांवों तक पहुंच गई है.

उत्तर भारत के गांवन के सबसे बड़ दिक्कत ई बा कि उहवां डॉक्टरे नइखन. लोग चांद दवाखाना, बिजली दवाखाना नाम से चले वाला कम पढ़ल लिखल बंगाली डाक्टरन भा दवाई के दोकानि से काम चलावे ले. दवाई के दोकानिए वाला कहीं त एक तरहि से प्राथमिक डाक्टर बा गंउअनि में. बाकिर हंफनी के बेमारी के ओकरो पता नइखे, बिजुली भा चांदों डाक्टर के समझ में ना आइल कि एकर का दवाई बा.

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मी लॉर्ड के दबाव में उपी में अपरैल में जब पंचायित के चुनाव भइल, गांवां-गाईं हफनी के बेमारी बढ़ि गइल. अब ई मति पूछीं कि उपी का ह? भोजपुरिया समाज आपाना प्रांत के उपीए कहेला. लइका के बियाह में जब लइकी वाला लोग तिलक चढ़ावे आंगाना में आवेला, तब मेहरारू सभ एगो गीति बाड़ा पुरहर टानि लेके के गावेला...उपी में इज्जत हमारी है जी उपी में..

बिजुली के मामिला में अब उपी के गांव बदलि गइल बाड़े स. पुरनका राज नियर दिन आ राति के हफ्ता-हफ्ता भर के पारी में छव घंटा के बजाय कम से कम सोलह घंटा ले बिजुली रहतिया. एह वजह से घर-घर अब टीवी चलता. तीस-चालीस साल पहिले नीयर अब अखबार खातिर दस बजिया गाड़ी के बाट जोहे जाए के नइखे. सबेरहीं हर गांव में बीस-पचीस को अखबार आ जाता.

कहे के मतलब ई बा कि एह सभसे सबके पाता बा कि कोरोना नामक कवनो अइसन बेमारी आ गइल बा, जवन ध लिहलसि त खतरनाको हो सकेले. गंउआ में मंगल चाचा नियर कतने लोग बाड़े, जवन अखबार के नांव से लेके आखिरी पन्ना के प्रिंट लाइन चाटि जाले. फेरू खबरन पर चर्चो खूब होला. सबेरे-सांझि के जुटान में पूरा चीड़फाड़ होला.

एकरा बादो अगर लोग मानि जइते कि कोरोना उनुको किहां आ सकेले, त फेरू उनुकर गंवई ज्ञान आ मोंछि के इज्जति पर सवाल ना उठि जाई. त कहे के ई मतलब बा कि सुरू में लोग एह के मनबे ना कइले. मजाक में लोग इहां तक ले कहत रहले कि हथेली के ताल पर जइसे मलाइल खइनी के धूरि उड़ि जाला, ओइसे कोरोनवो उड़ि जाई. कुछु लोगन के गजबे तर्क रहे कि खइनी तींत होले, गला के साफ कई देले त खइनी खाए वालन के ई रोग ना धरि पाई.
एही वजह से जब गांवन में केहू के सांस फूले लागल, बोखार – खांसी होखे लागल त लोग ओकरा के ओइसहीं लिहले, जइसे सामान्य खांसी- बोखार आ सरदी के लेत रहले. एही में जब कुछु बूढ़ लोग निबटियो गइले. त लोगन के तर्क रहे कि उनुकर उमिर हो गइल रहल हा, एह से निकलि गइले.

लेकिन जब घरे-घरे ई हंफनी चढ़े लागल, तब लोगन के लागन कि ई त ऊ रोग बा, जवन खइनी के धूरि नियर उधियाते नइखे, उलुटे लागत का गरदनिये के जाम कई देले बा त लोग चेते लगले.

उत्तर भारत के गांवन के सबसे बड़ दिक्कत ई बा कि उहवां डॉक्टरे नइखन. लोग चांद दवाखाना, बिजली दवाखाना नाम से चले वाला कम पढ़ल लिखल बंगाली डाक्टरन भा दवाई के दोकानि से काम चलावे ले. दवाई के दोकानिए वाला कहीं त एक तरहि से प्राथमिक डाक्टर बा गंउअनि में. बाकिर हंफनी के बेमारी के ओकरो पता नइखे, बिजुली भा चांदों डाक्टर के समझ में ना आइल कि एकर का दवाई बा. ओइसे देखीं त देश के बड़का महानगरन के बड़का चमकत अस्पतालन में लाखन रूपिया कमाए वाला डाक्टरनो के नइखे पाता कि एह रोग का का सटीक दवाई बा, त गंउवा वालन के का कहल जा सकेला.



एह घरी देखबि त उत्तर भारत के देहाति प्रधान इलाकन में एमबीबीएस-एमएस आ एमडी पढ़ल डाक्टर बड़का मालधनी बनि के उभरल बाड़े. उनुकर घर देखबि त दंग रहि जाइबि, गाड़ी आ अस्पताल के पूछहिं के नइखे. एह पर फेरू कबो चर्चा...

महामारी के दौर से पहिले लोगन के इलाज के नाम पर खूब माल कूटे वाला एह डाक्टरन में से ढेरे कोरोना के डर से अस्पताले बन कई के बइठि गइले स. अइसना में गांवन के ओह लोगन के इलाज कठिन हो गइल, जेकरा कोरोना संक्रमण के केस बिगड़ि गइल. अइसन लोगन के जिनिगी भगवाने के हाथ में रहि गइल.

ई ठीक बा कि राज्य सरकार के पेंच कसला से सरकारी महकमा टाइट भइल. बाकिर ओकरा त काम करे के आदतिए नइखे. अखबारन के सेट कइके जिला स्तर के अस्पतालन के डाक्टर आ प्रशासन आपन गुण खूब गवावत बा. बाकिर लोगो जानता कि ई लोग काताना काम करेले आ उ का-का कइ सकेले.

अइसन में सवाल ई बा कि लोग कइसे बांचता. एकर वजहि बा कि ठोकर लागाला के बाद लोग चेते लागल बा. जेकरा खांसी-बोखार होता, तुरुंते भाप लेबे लागता. ओह देसी दवाइन के खोजे लागता, जवना का पिछला तीस-चालीस साल में लोग भुला गइल बा. आजुकाल्हु घर-घर लोग हरदी-गुर डालि के दूध पियता. नाकि में नीबू के रस हर हाफ्ता दू-दू दिन डालता. टोला-महल्ला के जे लोग कवनो सहर में नोकरी-चाकरी करता, ऊ लोग कूरियर से जरूरी दवाई भेजवावता. एह ताकीद के साथ कि ई दवाई टोला में केहू अउरियो के ई रोग भइल त ई दवाई दे दीह. जेकर थइली मजबूत बिया, ऊ चवनप्राश मंगा लेले बा. गांवे- गांवे फइललि जवन बांवरि के लोग बेकार समझत रहल हा, ओकर ताकत आ अहमियत लोग जानि गइल बा. इहवां बता दीं कि बांवरि ऊ ह, जवना के एह घरी इम्युनिटी बढ़ावे खातिर बाड़ा चरचा बा. रंउआ ठीके समझनिं, अमरबेल भा गिलोय. संस्कृत में एही के अमृतवल्लरी कहल जाला. एह बीचे सरकारों के तरफ से दवाई बंटाइल बा. बाकिर सबके ऊ नइखे मिलि पवले.

गांव के लोगन के मुश्किल से मुश्किल समय आ आफति-विपत्ति काटे के आदति बा, ओहि में से नया राहि निकाले के अनुभव बा. एही जिजिविषा के भोजपुरिया गांव परिचय दे रहल बाड़े स आ एह आफति से निकले के कोशिश कइ रहल बाड़े स. (लेखक उमेश चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

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