Bhojpuri Spl: शिव के काशी से शिवाजी क अइसन नाता, पढ़ीं अउर जानीं

इतिहास कहयला कि शिवाजी आगरा से मथुरा पहुंचलन. अउर मथुरा से फिर काशी गइलन. अपने कैद के दौरान शिवाजी अपने रिहाई बदे औरंगजेब के पास जवन प्रस्ताव भेजले रहलन, ओहमें एक प्रस्ताव इ भी रहल कि अगर बादशाह ओन्हय रिहा कइ देय त उ सबकुछ छोड़ि के संन्यासी बनि जइहय अउर काशी वास करिहय.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 25, 2021, 2:49 PM IST
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भगवान शिव क नगरी काशी से छत्रपति शिवाजी क अटूट नाता रहल हौ. शिवाजी के छत्रपति बनावय में काशी क बड़ा योगदान रहल. कम लोगन के पता हौ कि छत्रपति बनय से पहिले शिवाजी काशी आयल रहलन अउर अपने सम्राज्य बदे बाबा विश्वनाथ से गुहार लगउले रहलन. औघड़दानी के दरबार में जे भी सच्ची श्रद्धा से आवयला, बाबा भोलेनाथ ओकर मुराद जरूर पूरा करयलन. काशी से वापस रायगढ़ लौटले के बाद शिवाजी क मुराद पूरा भयल रहल. काशी में शिवाजी पंचकोसी परिक्रमा कइले रहलन अउर काली माई क एक ठे मंदिर भी बनवउले रहलन. छत्रपति शिवाजी क बनवावल काली मंदिर आज भी भोजूबीर में मौजूद हौ.

औरंगजेब के सेनापति राजा जयसिंह के साथ छत्रपति शिवाजी 22 जून, 1665 के पुरंदर क संधि कइलन. जयसिंह के ही कहले पर सुरक्षा क पूरा आश्वासन मिलले पर उ मुगल बादशाह औरंगजेब से आगरा में मिलय बदे तइयार भयल रहलन. छत्रपति शिवाजी नौ मई, 1666 के अपने पुत्र संभाजी अउर चार हजार मराठा सैनिकन के साथ आगरा दरबार पहुंचलन. लेकिन औरंगजेब अपने दरबार में शिवाजी क अपमान कइलस, जवने के नाते उ भरे दरबार में औरंगजेब के विश्वासघाती कहिके उहां से निकलि गइलन. बाद में औरंगजेब शिवाजी के बंदी बनाइ लेहलस. ओकर योजना शिवाजी क हत्या करावय क रहल. लेकिन अपने चतुराई से शिवाजी संभाजी के साथ फल के टोकरी में छिपि के 13 अगस्त, 1666 के औरंगजेब के कब्जा से निकलि गइलन.

इतिहास कहयला कि शिवाजी आगरा से मथुरा पहुंचलन. अउर मथुरा से फिर काशी गइलन. अपने कैद के दौरान शिवाजी अपने रिहाई बदे औरंगजेब के पास जवन प्रस्ताव भेजले रहलन, ओहमें एक प्रस्ताव इ भी रहल कि अगर बादशाह ओन्हय रिहा कइ देय त उ सबकुछ छोड़ि के संन्यासी बनि जइहय अउर काशी वास करिहय. औरंगजेब हलांकि शिवाजी के रिहा नाहीं कइलस, लेकिन जब उ अपने चतुराई से कैद से बाहर निकललन तब उ मथुरा के बाद काशी पहुंचलन. उहां उ पंचकोसी परिक्रमा कइलन अउर पंचकोसी परिक्रमा मार्ग पर भोजूबीर में काली माई क मूर्ति स्थापित कइलन. काशी में पंचकोसी परिक्रमा क बहुत धार्मिक महत्व हौ. भगवान राम से लेइके पांडव तक काशी में पंचकोसी परिक्रमा कइले रहलन.



काशी में छत्रपति शिवाजी क स्थापित काली मंदिर आज भी भोजूबीर में सड़क किनारे मौजूद हौ. मंदिर बिना गुंबद क हौ. एह के नाते बहरे से देखय में इ सामान्य घर जइसन लगयला. बिना गुंबद वाला मंदिर बनवावय के पीछे संभवतः मकसद इ रहल कि मुगल सैनिकन के पता न चलि सकय कि इहां मंदिर हौ. ओह समय औरंगजेब काशी में तमाम मंदिर तोड़वावत रहल. काली मंदिर क दीवार दुइ फुट मोटी हौ. एतना समय बीति गइले के बाद भी मंदिर क इमारत मजबूत हौ. इ ओह समय के खास निर्माण तकनीक क प्रमाण हौ. मंदिर के गर्भगृह में माई काली के साथ ही माई दुर्गा, गणेश भगवान, नरसिंह भगवान अउर बाबा भैरव क मूर्ति स्थापित हौ.
पंचकोसी यात्रा के तीसरे पड़ाव रामेश्वर में मौजूद तुलजा भवानी मंदिर के बारे में भी कहल जाला कि शिवाजी ही बनवउले रहलन. लेकिन कुछ लोगन क मत हौ कि तुलजा भवानी मंदिर रामेश्वर में पहिलय से रहल, अउर शिवाजी मंदिर में दर्शन-पूजन कइले रहलन. तुलजा भवानी के शिवाजी क कुलदेवी कहल जाला.

शिवाजी राजे क काशी यात्रा ओन्हय छत्रपति बनावय में हर तरह से मददगार साबित भइल. शिवाजी 22 सितंबर, 1666 के वापस रायगढ़ पहुंचलन अउर ओकरे बाद धीरे-धीरे उ आपन सारा हारल सम्राज्य अउर 23 किला वापस जीति लेहलन, जवन पुरंदर के संधि के तहत ओन्हय मुगल सम्राज्य के देवय के पड़ल रहल. बाद में नौ मार्च, 1668 के औैरंगजेब शिवाजी के स्वतंत्र राजा घोषित कइ देहलस. एकरे साथ ही 1674 में पश्चिम भारत में स्वतंत्र मराठा सम्राज्य क नीव पड़ि गइल. अब शिवाजी राजे के राज्याभिषेक क तइयारी शुरू होइ गयल. राज्याभिषेक बदे ब्राह्मण क जरूरत रहल. लेकिन रायगढ़ अउर पूना क ब्राह्मण तइयार नाहीं भइलन. ब्राह्मण लोग शिवाजी के क्षत्रिय मानय से ही इनकार कइ देहलन.

संकट के समय में भगवान शिव क काशी शिवाजी क सहाय भइल. शिवाजी काशी संदेश भेजवउलन. काशी यात्रा के दौरान कुछ ब्राह्मणन से ओनकर संबंध बनि गयल रहल. पंडित गंग भट शिवाजी के निमंत्रण पर रायगढ़ पहुंचलन अउर ओन्हय राजस्थान क सिसोदिया क्षत्रिय घोषित कइके छह जून, 1974 के ओनकर राज्याभिषेक कइ देहलन. शिवाजी राजे एक जागीरदार से अब छत्रपति शिवाजी महाराज होइ गइलन. शिवाजी क जनम 19 फरवरी, 1630 के शिवनेरी दुर्ग में भयल रहल, अउर तीन अप्रैल, 1680 में रायगढ़ दुर्ग में ओनकर निधन होइ गयल. ओनके पिता क नाम शाहजी भोसले अउर माता क नाम जीजाबाई रहल. कुल 50 साल के जीवनकाल में शिवाजी अपने बुद्धि अउर रण कौशल से उ मुकाम हासिल कइलन, जवन बड़े-बड़े राजा-महराजा बचाइ तक नाहीं पइलन. पचास साल क उमर कवनो जादा नाहीं होत, लेकिन ओह जमाने में एक क्षत्रिय क उमर केतना रहत रहल, राजा परमाल के दरबार क कवि जगनिक के आल्हा खंड क इ दुइ लाइन प्रमाण हौ -

बारह बरिस लौ कूकर जीऐं,
औ तेरह लौ जीए सियार.
बरस अठारह क्षत्रिय जीए,
आगे जीवन को धिक्कार.

काशी के साथ शिवाजी के अटूट नातेदारी के नाते ही काशी के लोगन क पहिले महाराष्ट्र में बड़ी इज्जत होय. उहां क लोग काशी से जाए वालन के देवता की नाईं पूजय. पुरनिया लोग बतावयलन कि जब काशी दादर एक्सप्रेस बनारस से मुंबई के दादर रेलवे स्टेशन पहुंचय तब उहां क मराठी लोग पराते में पानी भरि के बइठल रहय. जे भी रेलगाड़ी से उतरय, ओकर गोड़ धोइके चरणामृत माथे लगावय, ओके अपने घरे लेइ जायं, सेवा-सभाकन करयं. एक जमाना रहल, जब बनारस से एकमात्र रेलगाड़ी काशी-दादर एक्सप्रेस मुंबई जात रहल. पूरे पूर्वांचल अउर बिहार क लोग एही रेलगाड़ी से मुंबई जायं. काशी के नाम पर सबकर उहां पूजा होय. लेकिन आज तस्वीर उलटि गइल हौ. (लेखक सरोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
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