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Bhojpuri: बाबा साहेब के जीवन क अंतिम तीन महीना रहल खास, पुण्यतिथि पर जानीं आज

Bhojpuri: बाबा साहेब के जीवन क अंतिम तीन महीना रहल खास, पुण्यतिथि पर जानीं आज

आज बाबा साहेब अंबेडकर (Babasaheb Ambedkar) के पुण्यतिथि हौ. लेकिन अपना के बता देईं कि उनकर पूरा जीवन संघर्ष क एगो लंबी कहानी हौ. लेकिन जीवन क अंतिम तीन महीना कहानी क अइसन उपसंहार हौ, जवने से लगयला कि उ कवनो साधारण मनुष्य नाहीं, बल्कि महामानव रहलन. अक्टूबर 1956 में ऊ हिंदू धरम त्याग के बौद्ध धरम अपना लिहलें और दिसंबर में ही पुण्यलोक के प्रस्थान कर गइलें. आज पढ़ीं उनका जीवन से जुड़ल एह खास किस्सा के बारे में...

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संविधान निर्माता बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर क पूरा जीवन संघर्ष क एक लंबी कहानी हौ। लेकिन जीवन क अंतिम तीन महीना कहानी क अइसन उपसंहार हौ, जवने से लगयला कि उ कवनो साधारण मनुष्य नाहीं, बल्कि महामानव रहलन। बाबा साहेब अक्टूबर 1956 में हिंदू धरम छोड़ि के बौद्ध धरम अपनइलन, नवंबर में धरम नगरी काशी क यात्रा कइलन, और काशी से कुरुक्षेत्र यानी दिल्ली लउटले के बाद दिसंबर में पुण्यलोक बदे प्रस्थान कइ गइलन।

इ बात हर कोई जानयला कि बाबा साहेब महार जाति क, यानी दलित समुदाय से रहलन। समाज में ओह समय छुआ-छूत अपने चरम पर रहल। भीमराव के बचपन में ही छुआ-छूत अउर जातीय भेदभाव क सामना करय के पड़ल। कुशाग्र बुद्धि क भीमराव हर मुश्किल क मुकाबला करत आगे निकलत गइलन। जवने समस्या क उ बचपन से सामना कइलन, ओही समस्या के खिलाफ संघर्ष ओनकरे जीवन क मूल मकसद बनि गयल। जब देश में अजादी क आंदोलन चलत रहल, बाबा साहेब दलित समुदाय के छुआ-छूत, जातीय भेदभाव से अजाद करावय क लड़ाई लड़त रहलन। ओनकरे उप्पर आरोप भी लगल कि उ इ सब अंगरेजन के इशारे पर करत हउअन, लेकिन उ सामाजिक न्याय क आपन लड़ाई जारी रखलन। ओनकरे संघर्ष क परिणाम रहल कि सामाजिक न्याय क मुद्दा देश में उभरि के सामने आयल अउर दलितन के कई अधिकार भी मिलल। ओनकर लड़ाई जाति या वर्ग विशेष के खिलाफ नाहीं, बल्कि व्यवस्था के खिलाफ रहल, जवने में समाज के गरीब अउर दलित समुदाय के न्याय नाहीं मिलि पावत रहल।

कुछ लोग ओन्हय बाभन विरोधी बतावय, लेकिन कई बाभन बाबा साहेब क समर्थक रहलन, ओनकरे जीवन में महत्वपूर्ण योगदान कइलन। अइसन कई लोगन क गुणगान भीमराव कई बार कइले हउअन। भीमराव क दूसरकी महरारू डॉ. सविता आंबेडकर बाभन रहलिन। हाईस्कूल में भीमराव क शिक्षक कृष्ण केशव आंबेडकर बाभन रहलन, अउर ओनही के नाते भीमराव के आंबेडकर उपनाम मिलल। कृष्ण केशव भीमराव के अपने लड़िका की नाईं मानय, एह बात क जिकर बाबा साहेब खुद कई जगह कइले हउअन। लेकिन सामाजिक न्याय क लड़ाई लड़त-लड़त भीमराव के इ बात समझ में आइ गइल रहल कि हिंदू धरम में जवने व्यवस्था के खिलाफ उ लड़त हउअन, ओहके समाप्त करब अउर दलितन बदे जगह बनाइब असान काम नाहीं हौ। ओन्हय एह बात क बहुत दुख भी रहल। एही दुख में उ 13 अक्टूबर, 1035 के नासिक के पास यओला में एक सभा में धरम बदलय तक क आपन मंशा जाहिर कइ देहलन। उ कहले रहलन कि दुर्भाग्य रहल कि हिंदू धरम में पैदा भए, एहमें हमार जोर नाहीं रहल, लेकिन अंतिम सांस हिंदू धरम में न लेब।

भीमराव एह घोषणा के बाद भी 21 साल तक धरम नाहीं बदललन। एहसे समझल जाइ सकयला कि हिंदू धरम से ओन्हय केतना लगाव रहल। उ दुखी रहलन त खाली धरम में मौजूद पाखंड से। लेकिन 1956 में बाबा साहेब के जीवन क घटनाक्रम तेजी से बदलल। अउर उ 14 अक्टूबर, 1956 के नागपुर में अपने पांच लाख समर्थकन के साथे बौद्ध धरम अपनाइ लेहलन। ओनके धरम बदलय क मंशा जाहिर कइले के बाद कई लोग आशंका जतइले रहलन कि उ ईसाई, या मुसलमान बनय वाला हयन। लेकिन बाबा साहेब पहिलय स्पष्ट कइ देहले रहलन कि अगर उ धरम बदलिहय त अइसन, जवन भारत के धरती पर जनम लेहले होई। ओन्हय हिंदू धरम के व्यवस्था से दिक्कत हौ, लेकिन हिंदुस्तान से ओन्हय मोहब्बत हौ अउर उ अंतिम सांस एही धरती पर लेइहय। बौद्ध धरम भीमराव के सोच के बिल्कुल करीब रहल। इ भी कहल जाइ सकयला कि उ बौद्ध धरम के भले ही 1956 में अपनइलन, लेकिन बुद्ध के रस्ता पर उ जीवन के शुरुआत से ही चलय शुरू कइ देहले रहलन।

अब एहके संजोग कहा या कुछ अउर, जइसे ज्ञान मिलले के बाद भगवान बुद्ध सीधे काशी पहुंचलन, अउर आपन पहिला उपदेश सारनाथ में देहलन, ओही तरह बाबा साहेब भी बौद्ध धरम अपनइले के बाद काशी क यात्रा कइलन। रेलगाड़ी से एक बजे राती के जब कैंट स्टेशन उतरलन त बनारस क विद्यार्थी लोग ओनकर जोरदार स्वागत कइलन। उ सारनाथ जाइ के बुद्ध मंदिर में मत्था टेकलन अउर ओकरे बाद 24 नवंबर के काशी हिंदू विश्वविद्यालय अउर काशी विद्यापीठ में विद्यार्थिन के संबोधित कइलन। बाबा साहेब क इ संबोधन भाषण कम प्रबचन जादा रहल। उ अपने भाषण में कहलन -शंकराचार्य ’ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या’ क विचार पेश कइलन। जब ब्रह्म सर्वव्यापी हौ त बाभन अउर अछूत भी बराबर भइलन। लेकिन शंकराचार्य आपन इ विचार समाज में लागू नाहीं कइलन, बल्कि ओहके वेदांती स्तर पर ही रखलन। अगर उ आपन विचार समाज के स्तर पर लागू कइले होतन त इ विचार अधिक गंभीर अउर विचारणीय भयल होत। ….आंबेडकर इ बात ओही काशी में बोलत रहलन, जहां क स्वामी करपात्री महराज आंबेडकर के हिंदू कोड बिल क विरोध कइले रहलन, अउर इ बिल संसद में पास नाहीं होइ पइलस।

काशी में प्रबचन देहले के बाद बाबा साहेब कुरुक्षेत्र यानी दिल्ली पहुंचलन अउर अगले ही महीना (छह दिसंबर, 1956) पुण्यलोक बदे प्रस्थान कइ देहलन। जीवन के अंतिम तीन महीना में घटल इ तीन घटना से अइसन लगयला कि बाबा साहेब के अपने अंतिम दिन क आभास होइ गयल रहल। अगर इ बात सही हौ त इ साधारण बात नाहीं हौ। भीमराव बचपन से असाधारण रहलन, असाधारण प्रतिभा क धनी रहलन। ओनके पास 32 डिग्री रहल, नौ भासा क ज्ञान रहलन। लेकिन इ तीन घटना ओन्हय महामानव बनावयला। अंतिम समय में पति के काशी यात्रा क असर पत्नी डॉ. सविता आंबेडकर पर एतना रहल कि उ बाबा साहेब क अंतिम संस्कार काशी लेइ जाइके सारनाथ में ही करय चाहत रहलिन। लेकिन ओनकर इ इच्छा पूरी नाहीं होइ पइलस।

(लेखक सरोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

Tags: Bhojpuri, Bhojpuri News

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