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Bhojpuri: मुंशी प्रेमचंद के जनमदिन पर जानीं लमही क हाल, का ह उनकर असली नाम!

प्रेमचंद के जनमदिन पर हर साल लमही में तीन दिन क मेला लगयला. राज्य क संस्कृति विभाग पूरे आयोजन क जिम्मेदारी संभारयला. संगोष्ठी, चर्चा-परिचर्चा अउर प्रेमचंद के कहानी-उपन्यास पर आधारित नाटक क मंचन पूरे तीन दिन चलयला. देश-विदेश क रचनाकार, संस्कृतिकर्मी, रंगकर्मी तीन दिन लमही में जुटयलन.

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बनारस शहर से आजमगढ़ जाए वाली सड़क पर लगभग साढे़ आठ किलोमीटर गइले के बाद एक गांव पड़यला, नाम हौ लमही. इ गांव कवनो मामूली गांव नाहीं हौ. इहां क मट्टी एक अइसन कलमकार पैदा कइले हौ, जवन हिंदी कहानी अउर उपन्यास के देश में ही नाहीं, बल्कि दुनिया में सम्मान दियउले हौ. ओनकर लिखल आज भी ओतनय ताजा हौ, जेतना तब रहल जब उ लिखल गयल रहल. इ रचनाकार ध्रुव नक्षत्र की नाईं आज भी अपने जगह बनल हौ, अउर रोशनी बिखेरत हौ. जी हां, हम बात मुंशी प्रेमचंद क करत हई. सन 1880 में 31 जुलाई के लमही में ही धनपत राय श्रीवास्तव क जनम भयल रहल. बाद में उ मुंशी प्रेमचंद के नाम से लिखय लगलन अउर एही नाम से सरनाम होइ गइलन. प्रेमचंद अपने कहानी, उपन्यास के बल पर एतना सरनाम भइलन कि ओनकर गांव आज रचनाकारन बदे तीर्थ बनि गयल हौ. लेकिन इ तीर्थ शासन-प्रशासन के उपेक्षा क शिकार हौ.

प्रेमचंद के जनमदिन पर हर साल लमही में तीन दिन क मेला लगयला. राज्य क संस्कृति विभाग पूरे आयोजन क जिम्मेदारी संभारयला. संगोष्ठी, चर्चा-परिचर्चा अउर प्रेमचंद के कहानी-उपन्यास पर आधारित नाटक क मंचन पूरे तीन दिन चलयला. देश-विदेश क रचनाकार, संस्कृतिकर्मी, रंगकर्मी तीन दिन लमही में जुटयलन. लेकिन जेकरे बदे सबकुछ होला, ओकर स्मारक तमाम घोषणा के बाद भी नाहीं बनि पइले हौ.

लमही में 10 साल पहिले तक इ तीन दिन क कार्यक्रम भी नाहीं होत रहल. नागरी प्रचारिणी सभा के अगुआई में 31 जुलाई के लेखक-साहित्यकार लोग गांव में जुटय अउर प्रेमचंद के प्रतिमा के सामने मैदान में सभा-संगोष्ठी कइके उपन्यास सम्राट के श्रद्धांजलि अर्पित करय. बाद में शहर क पुरानी नाटक संस्था गोकुल आटर््स सन 1984 से लमही में मुंशी प्रेमचंद के कहानी पर आधारित नाटक क मंचन करय क परंपरा शुरू कइलस. शहर क दूसर संस्था भी बाद में आपन नाटक लेइके 31 जुलाई के लमही पहुंचय लगलिन. अब लमही में 31 जुलाई के पूरे दिन भर क कार्यक्रम होवय लगल. गांव में मेला क माहौल रहय. प्रेमचंद क मुरीद लोग दुनिया भर से लमही के मट्टी क तासीर जानय बदे 31 जुलाई के गांव में पहुंचय लगलन. गांव क लोग भी लिट्टी-चोखा से सबकर स्वागत करय. जे भी 31 जुलाई के कभौ लमही गयल होई, लिट्टी-चोखा क स्वाद आज भी ओहके याद होई.

कोरोना के नाते पिछले साल लमही में आयोजन नाहीं भयल, अउर एह साल भी सार्वजनिक कार्यक्रम न होई. लेकिन कुछ संस्था अपने स्तर पर प्रेमचंद के श्रद्धांजलि देवय के तइयारी में हइन. प्रेमचंद मार्गदर्शन केंद्र प्रतीकात्मक रूप से एक संगोष्ठी कार्यक्रम क रूपरेखा बनइले हौ, अउर शहर क नाटक संस्था प्रेरणा कलामंच प्रेमचंद क कहानी देवी पर आधारित नाटक क मंचन करी. निजी स्तर पर अउर भी कुछ कार्यक्रम होइहय. प्रेरणा कलामंच क निदेशक फादर आनंद के अनुसार, गांव में ही मौजूद एक सभाकक्ष में लगभग 100 लोगन के उपस्थिति में नाटक क मंचन होई.

प्रेमचंद जेतना बड़ा लेखक रहलन, ओह हिसाब से ओनके स्मृति के सजावय, संवारय क काम आजतक नाहीं होइ पइले हौ. जनमदिन पर 31 जुलाई के शासन-प्रशासन के तरफ से हर साल बड़ी-बड़ी घोषणा त होला, लेकिन जमीन पर उतरल कुछ नाहीं हौ. सन 2005 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन क सरकार प्रेमचंद के 125वीं जयंती पर बड़ा आयोजन कइले रहल. एकरे बदे अच्छा-खासा बजट आवंटित भयल रहल अउर पूरे सालभर देशभर में कार्यक्रम चलल रहल. मुख्य कार्यक्रम 31 जुलाई के लमही में भयल रहल अउर ओह समय क केंद्रीय संस्कृति मंत्री एस. जयपाल रेड्डी अउर मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव कार्यक्रम में शामिल भयल रहलन. मंच से दूनों नेता प्रेमचंद बदे घोषणा क बौछार कइ देहलन. प्रेमचंद के स्मृति में लाइब्रेरी, संग्रहालय, प्रेक्षागृह, शोध संस्थान, प्रेमचंद के पुश्तैनी घर क स्मारक के रूप में जीर्णोद्धार आदि क घोषणा भइल रहल. लेकिन एक ठे छोट क सभाकक्ष छोड़ि द त आजतक कवनो घोषणा जमीन पर नाहीं उतरल हौ. इहय नाहीं, ओकरे बाद भी हर साल 31 जुलाई के घोषणा भयल हौ, लेकिन अइसन लगयला जइसे प्रेमचंद घोषणा क देवता होइ गयल हयन अउर घोषणा चढ़उले से ही उ प्रसन्न होइ जालन.

प्रेमचंद क पुस्तैनी घर आज भी खड़हर के रूप में ओइसय पड़ल हौ. गांव में जाए वाली सड़क क मरम्मत भी 31 जुलाई से पहिले होला, ताकि सरकारी अधिकारिन के गांव में पहुंचय में दिक्कत न होय. हां, गांव तक शहर क मंडी जरूर पहुंचि गइल हौ. बनारस क बड़ी सब्जी मंडी अब लमही में लगय लगल हौ. अपने उपन्यास रंगभूमि में जवने उद्योगीकरण अउर शहरीकरण के नफा-नुकसान क विरोध प्रेमचंद सूरदास के माध्यम से कइले हउअन, आज खुद ओनकर गांव बजार के नफा-नुकसान में फंसि गयल हौ. अइसन लगयला जइसे प्रेमचंद अपने खड़हरे पर बइठि के रंगभूमि के सूरदास की नाईं गांव में बजार क धमक टुकुर-टुकुर निहारत हयन.

प्रेमचंद हिंदी क एकमात्र अइसन लेखक हयन, जेकरे परिचय बदे ओनकर नाम ही काफी रहयला. आम से लेइके खास तक प्रेमचंद के जानयला, समझयला. अइसन केव न होई जेकरे जबान पर प्रेमचंद क दुइ-चार कहानी न होय. अपने लिखावट के बल पर प्रेमचंद सबके दिल पर राज करयलन. ओन्हय कथा सम्राट, उपन्यास सम्राट कहल जाला. प्रेमचंद भारत क, इहां के समाज क, समाज में समाइल समस्या क असली चित्र शब्द के माध्यम से कगजे पर उतरले हउअन. ओनके लेखन क इहय बड़ी खासियत हौ. गांव, गरीब, किसान, मजदूर, साहूकार, ऊंच-नीच, जाति-धरम क समस्या ओनके निशाने पर रहल हौ. इ कुल समस्या आज भी देश-समाज में मौजूद हइन, रूप भले ही बदलि गयल होय. एही बदे जे भी ओनकर लिखल पढ़यला, सीधे एकाकार होइ जाला. विषय पर प्रेमचंद क पैनी पकड़ रहल अउर इहय पैनापन ओनके कालजयी रचनाकार बनइलस. हिंदी में लिखि के जेतना उ देश में लोकप्रिय भइलन, ओहसे कम विदेश में लोकप्रिय नाहीं हयन. ओनके एक-एक कहानी, किरदार पर शोध भयल हौ, अबही भी होत हौ, आगे भी होअल करी. ओनके जनमदिन पर लमही में जवन मेला लगयला, उ ओनके प्रतिमा पर फूल चढ़ावय बदे नाहीं, बल्कि जवन उ प्रतिमान बनउले हयन, ओहपे श्रद्धा क फूल चढ़ावय बदे. (सरोज कुमार वरिष्ठ स्तंभकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

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