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Bhojpuri Spl: गांधी जी के अनसुना किस्सा पढ़ला के बाद रउओ हो जाइब गदगद

महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर आईं जानल जाव उनकर कुछ अनसुना किस्सा

महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर आईं जानल जाव उनकर कुछ अनसुना किस्सा

एह साल 26 जनवरी के दिल्ली (Kisan Protest Delhi) के सड़क पर ओकर एगो नज़ारा दुनिया देखल. ये से ज्यादा खतरनाक स्थिति देश में तब पैदा भइल रहें जब मुस्लिम लीग के सीधी करवाई दिवस के आह्वान पर कलकत्ता, नोवाखाली फिर ओकरा प्रतिक्रिया में बिहार में दंगा (Riots in Bihar) फइलल रहें.

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देश जब आजादी के जश्न मनावत रहें, गांधीजी ओह वक्त कलकत्ता में अपना जान जोखिम में डाल कर लोगन के समझावत रहनी कि हिंसा के जनून आ साम्प्रदायिक उन्माद में जवन कुछ अभी से देखात बा,ओसे देश के भविष्य पर अउर कई खतरा पैदा हो जाई. ई बात हमेशा ध्यान में रहें के चाही कि कवनों तरह के उन्माद के समय तर्क के गुंजाइश रहें ना, आ जुनून विवेक सम्मत सोच के कुछ समय खातिर रोक देला. एह साल 26जनवरी के दिल्ली के सड़क पर ओकर एगो नज़ारा दुनिया देखल. ये से ज्यादा खतरनाक स्थिति देश में तब पैदा भइल रहें जब मुस्लिम लीग के सीधी करवाई दिवस के आह्वान पर कलकत्ता, नोवाखाली फिर ओकरा प्रतिक्रिया में बिहार में दंगा फइलल रहें. गांधीजी हर जगह अकेले आपन जान जोखिम में डाल के दूनो समुदाय के लोगन के समझावे आ सर्वधर्मप्रार्थना के आयोजन कर सद्बुद्धि जगावें के प्रयास में लागल रहनी.

गांधीजी के अइसने प्रयास एगो खास विचारधारा से प्रभावित लोगन के ठीक ना लागत रहें. गांधीजी एहि अतिवादी विचारधारा के विरोध में अहिंसक तरीका से लड़त आपन जान गववले बानी. एह प्रसंग में ई बात याद राखल जरूरी बा कि गांधीजी अपना हत्या के साजिश रचे वाला के जानत भी रहनी आ पहिले लंदन के इंडिया हाउस आ फिर भारत के रत्नागिरी जेल में मिल भी चुकल रहनी.उ लोगन के गांधीजी अपना जीवन आ देश खातिर जवन प्रयोग करत रहनी,उ मंजूर ना रहें. गांधीजी अपना विरोधी के बीच जाकर अपना सोच के मुताबिक प्रयोग करेके जुनून दक्षिण अफ्रीका में वकालत के सिलसिला में जाते शुरू हो गइल रहें.ट्रेन में प्रथम श्रेणी के टिकट भइला के बावजूद रंग से काला होखे के वजह से ट्रेन के डब्बा से गांधीजी के सामान समेत उठा के फेंकल जाता,काहे की गोर अंग्रेजन के संगे ओ समय करिया आदमी के चले के इजाजत ना रहें.

कड़कड़ाती ठंड में,दक्षिण अफ्रीका के मैरिटसवर्ग रेलवे स्टेशन के अनजान जगह में अलोता में बइठके मन में सोचत बानी कि लंदन से वकालत के पढ़ाई ई जलालत झेले खातिर न भइल रहें.ओने हृदय से ई पुकार उठता का जाने विधाता एह जुलुम के प्रतिकार करें खातिर तैयार करत होखस.गांधीजी के ओह धरम संकट के घड़ी में अपना हृदय के पुकार पसंद आइल, जइसे हर आध्यत्मिक चेतना संपन्न आदमी के ई आवाज पहिले सुनाई देला.गांधीजी वकालत के अलावा दक्षिण अफ्रीका में टिक के एह जुलुम खिलाफ अहिंसक तरीका से मुखालफत खातिर अपना के तैयार करत बानी.दूसरा बार जब 13 जनवरी 1897में अपना परिवार संगे दक्षिण अफ्रीका के डरबन बंदरगाह पर उतर बानी त आजकल जवना के भीड़ हत्या कहल जाता ओकर पहिलका शिकार होखे वाला राजनीतिक व्यक्ति शायद गांधीजी रहनी.दैवीय संजोग अइसन रहें ओहि समय उहा के स्थानीय एस पी के पत्नी जेन अलेक्जेंडर छाता ओढाके गांधीजी के स्थानीय मित्र के घरे पहुँचवली.

गांधीजी के मित्र के घर रात के अन्हरिया में लगभग पांच हजार लोग पहुंच गईल हत्या के फिराक में.दरअसल भइल ई रहें कि ए पी न्यूज़ के एगो खबर में ई बतावल गईल रहें कि गांधीजी दक्षिण अफ्रीका में भारत के लोगन के ले जाकर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ विद्रोह के साजिश रची रहल बाड़े.ई संजोगे कहाई कि जवना समय गांधीजी परिवार लेके डरबन बंदरगाह पर पहुँचनी, ओहि समय भारतीय गिरमिटिया मजदूरन के लेके दूसरका जहाज भी पहुँचल. एह वजह से अंग्रेजन के ई आशंका अउर पोख्ता हो गइल कि गांधीजी उहे करें आवत बाड़न जवन अखबार के रिपोर्ट में छपल बा. नटाल में गांधीजी के विरोध करे खातिर यूरोपियन प्रोटेक्शन सोसाइटी अउर कोलोनियन पेट्रियाटिक यूनियन के स्थापना भी भइल रहें. तब नटाल के कार्यवाहक प्रधनमंत्री जनरल हैरी एस्काम्बे रहलन. तब जइसन आज पूरा दुनिया में कोरोना के महामारी फलल बा ओइसने महामारी के बहाना बनाके भारतीय लोगन के बंदरगाह पर उतरे के इजाजत ना मिलल, आ उ लोगन के 23 दिन तक कवारेटाईन में भेंज दिहल गईल.

जनरल एस्काम्बे के मकसद ई रहें कि भारतीय गिरमिटिया मजदूर ओही जहाज से वापस भारत चल जा,या अगर उतर भी जाय त गांधी समेत ओह लोगन के हत्या करवाना था.ताकि आगामी चुनाव जीतल जा सकें.लेकिन विडंबना देखल जा कि ओहि एस्काम्बे के गांधीजी बाद में न सिर्फ पड़ोसी हो गइले, बल्कि अपना मरे के तीन घंटा पहिले एस्काम्बे अपना कुकृत्य खातिर क्षमा मंगले आ गांधीजी के बड़पन देखल जा कि उहाके एस्काम्बे के माफी भी दे देनी. गांधीजी अइसन महान व्यक्तित्व के लिए ही ई संभव बा. दक्षिण अफ्रीका में अइसन दुगो अउर प्रयास भइल गांधीजी के हत्या खातिर, जवना प्रारूप आजके नागरिकता संसोधन कानून जइसन रहें. ओइसने अध्यादेश के विरोध करें खातिर ही दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह के जनम भइल.

एह सत्याग्रह के भारत के आजाद करावें में बड़हन भूमिका रहें.एह सत्याग्रह के मकसद रहें अपना देश में अहिंसक लोकतंत्र के बुनियाद खड़ा कइल. गांधीजी भीड़ हत्या से बाल बाल बचला के बाद अपनी पुस्तक सत्याग्रह इन साउथ अफ्रीका में लिखत बानी कि मुझे लगता है कि ईश्वर मुझे सत्याग्रह के आचरण के लिए तैयार कर रहा है.एह सत्याग्रह के जनम दक्षिण अफ्रीका में 11 सितंबर 1906 को जोहान्सबर्ग के पुराने जुइस इम्परियल थियेटर मैदान में आयोजित सभा से भइल.लगभग तीन हजार हिंदुस्तानी ओह अध्यादेश पर विचार करे खातिर जुटल रहलन जवना के तहत हर हिंदुस्तानी के अपना नागरिकता के पंजीयन करावें के रहें आ पंजीयन के कार्ड हमेशा साथे रखें के रहें.ओह सभा में सेठ हाजी हबीब ख़ुदा के नाम पर उहा इकट्ठा लोगन से एह कानून के सामने ना झुके के अपील कर तानी आ दूसरा लोगन से भी अइसही कसम लेबे के दरख्वास्त करत बानी. गांधीजी एह सभा में ई सोच के न गईल रहनी कि कवनों शपथ लेबे के बा या लोगन के शपथ दिलावे के बा.गांधीजी सेठ हाजी हबीब के एह प्रस्ताव के ना सिर्फ गरमजोशी से स्वागत कइली, बल्कि अपना भाषण में चेतवली कि अगर इस तरह की शपथ लेने के बाद हम अपने वादे से मुकरते हैं,तो हम ईश्वर और आदमी दोनों के सामने अपराधी होंगे.

ओकरा बाद सन्1907 में ट्रांसवाल एशियाटिक रजिस्ट्रेशन एक्ट पारित भइल.तब ट्रांसवाल में लगभग13000 हिंदुस्तानी लोग पंजीयन करावें से इनकार कर दिहल, तब गांधीजी के गिरफ्तार करके जेल भेंजल गइल आ दू महीना के सजा भी भइल. ई गांधीजी के दक्षिण अफ्रीका में पहिला जेल यात्रा रहें. फिर कुछ ही दिन बाद एगो चालाकी के तहत उहा के गृह मंत्री जनरल स्मट्स गांधी जी के जेल में ई प्रस्ताव भेंजले कि अगर ज्यादातर हिंदुस्तानी स्वेच्छा से आपन पंजीयन कराले तब ई क़ानून रद्द कर दिहल जाई. गांधीज एक सत्याग्रही के नाते ई प्रस्ताव मान लेनी. जबकि हिंदुस्तानी लोग गांधीजी के चेतावत रहें कि अगर अपना वादा से सरकार पलट जाइ,तब का होई? उहे भइल जवन आशंका रहल.स्मूट्स अपना बात से पलट गइले. फिर भी गांधीजी जी के भरोसा रहें कि अगर विरोधी बीस बार धोखा दे तब भी सत्याग्रही को इक्कीसवीं बार भरोसा करने के लिए तैयार रहना चाहिए. इस समझौते के तहत 10 फरवरी 1908 को जब गांधीजी अपना पंजीयन करावें खातिर ऑफिस पहुँचनी तब मीर आलम नामक एक पठान लाठी से गांधीजी के सिर पर मरलस. गांधीजी बेहोश होकर गिर गइनी.मीर आलम अउर उनकर साथी लोग गांधीजी के धुन दिहल.

गांधीजी होश में अइला के बाद मीर आलम के बारे में पूछत बानी आ गिरफ्तार मीर आलम के रिहाई के मांग करत बानी.अइसने एक अउर घटना के जिक्र गांधीजी के सहयोगी हैनरी पोलक की पत्नी मिली पोलक करत बाड़ी. ई सन्1908 के बात ह दू आदमी बहुत धीमी आवाज में बात करत सड़क पर चलत रहें. सड़क के एक किनारा पहुचकर उ आदमी गांधीजी के एगो समान सउपलस आ फेर आगे चल देलस. उ समान एगो चाकू रहें, जवन उ गांधीजी के हत्या करे खातिर अपना संगे ले ऑइल रहें.मिली पोलक के नज़र में आदमी पागल रहें, आ गांधीजी के ओकरा के गलतफहमी के शिकार बतावत रहनी.जवन बाद में गांधीजी से बातचीत कइला के बाद आपन चाकू सौंप देलस. गांधीजी के ई मान्यता रहें नशा खाली गांजा,भांग शराब के ना होला विचार के नशा भी उतने नुकसानदेह होला. जवना प्रभाव में आकर मदन लाल धींगरा जइसन नौजवान कर्नल वाइली के हत्या कर देला.कवनों अनंत कनाहरे जइसन 16साल के नौजवान नासिक के मजिस्ट्रेट जैक्सन हत्या कर देला.मदनलाल पाहवा खुद गांधीजी पर बम फेंकेला. नाथूराम गोडसे झुके परनाम करके गांधीजी हत्या करेला.

जइसे गांधीजी भौतिक हत्या कइले पर्याप्त नइखे, ओह चेतना के जड़ से समाप्त कइल जरूरी बा. काहे कि एह देश के अइसन तासीर ह कि हर मुश्किल घड़ी में गांधीजी के याद कइके उनके दिखावल राह पर चल दी. अइसन आजादी के बाद भी कई बार भइल बा. आज भी ओह चेतना से प्रेरणा लेकर दक्षिण अफ्रीका में रंग भेद समाप्त भइल.अमेरिका में जॉर्ज फ्लॉयड के साथ भइल जुल्म के खिलाफ पूरी दुनिया से आवाज उठल तब ट्रम्प प्रशासन के झुके के पड़ल.फिर भी सत्याग्रह आ अहिंसा के रास्ता पर चलल अतना आसान नइखे.गांधीजी के राजनीतिक योगदान के चर्चा करत आचार्य नरेंद्र देव जी ठीके कहले बानी कि गांधीजी आम आदमी को अभय बना दिया.एकरा बाद वह अन्याय के खिलाफ आपन लड़ाई खुद लड़े लागी. ए ट्रिब्यूट टू गांधी नामक लेख में थॉमस मर्टन बताते है कि अहिंसा एक अलौकिक साहस की मांग करती है, जिसको केवल प्रार्थना और आधात्मिक संयम से हासिल किया जा सकता है.यह साहस सम्पूर्ण निर्भीकता के साथ मृत्यु का सामना करने और बिना प्रतिशोध के दुख को सहने की क्षमता से कम की मांग नहीं करता. दक्षिण अफ्रीका से लेकर भारत के स्वाधीनता आंदोलन के दरमियान गांधीजी अहिंसा, अउर सत्याग्रह के रास्ता पर साहस के साथ चली के कई दफे आपन जिंदगी दांव पर लगवले बानी.73वीं पुण्य तिथि पर अहिंसा के इस साहसिक पथिक को सलाम. (लेखक मोहन सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

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