Bhojpuri: एगो संन्यासी शिवलिंग के प्रणाम ना कइले त का भइल, पढ़ीं एगो रोचक प्रसंग

शिवलिंग अनादि आ अनंत ब्रह्म के प्रतीक ह. शिवलिंग निराकार ब्रह्म के भी प्रतीक ह. मुकुंद के मन:स्थिति ओह घरी वैराग्य से एतना भरल रहे कि उनकरा शिवलिंग के प्रणाम करे के इच्छा ना भइल. उनुका लागल कि ईश्वर अपना आत्मा में खोजे के चाहीं. त ऊ बिना प्रणाम कइले मंदिर से बहरा आ गइले और रणबाजपुर के दिशा में चल दिहले.

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  • Last Updated: April 13, 2021, 12:49 PM IST
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मशहूर किताब “योगी कथामृत” के लेखक परमहंस योगानंद के जीवन के एगो रोचक प्रसंग बहुत कुछ कहेला, समझावेला. अभी योगानंद जी के परमहंस के पदवी ना मिलल रहे. ऊ संन्यास भी ना लेले रहले. उनुकर संन्यास से पहिले के नांव रहे मुकुंद घोष. बाकिर मशहूर योगी श्यामा चरण लाहिड़ी के उन्नत शिष्य स्वामी श्रीयुक्तेश्वर जी के ऊ चेला बनि के उनुका आश्रम में संन्यासी बने के ट्रेनिंग लेत रहले. आश्रम रहे कलकत्ता से कुछुए दूर श्रीरामपुर में जहवां रेलवे स्टेसन भी बा.

ट्रेनिंग का समय उनुका आश्रम के देख-रेख आ आश्रम के कई गो काम करेके परे. कौनो आश्रम में ई जिम्मेदारी, ट्रेनिंग के हिस्सा होला. मुकुंद के लागल कि आश्रम के काम अधिका बा आ उनुका के ध्यान आ ईश्वर भक्ति के पर्याप्त समय नइखे मिल पावत. मन में आइल कि हिमालय में जाके गहिर साधना करेके चाहीं. सोचले कि जाके अपना गुरु से आज्ञा मांगीं. गुरु कहले कि हिमालय में कई गो पहाड़ी लोग रहेले, ओह लोगन के त कौनो ईश्वरानुभूति नइखे भइल. जड़ पहाड़ के बदले कौनो आत्मज्ञानी आदमी से ज्ञान पाव, साधना कर त ईश्वरलाभ होई. बाकिर तबो मुकुंद अपना गुरु से फेर प्रार्थना कइले कि उनुका के हिमालय जाए दिहल जाउ. स्वामी श्रीयुक्तेश्वर जी चुप लगा गइले. एह चुप्पी के मुकुंद स्वीकृति मानि के तारकेश्वर धाम के नजदीक रणबाजपुर चलि दिहले जहवां ओह घरी एगो महान साधक रामगोपाल मजूमदार रहत रहले. रामगोपाल मजूमदार के पता मुकुंद अपना एगो अध्यापक से लेले रहले.

ट्रेन से तारकेश्वर उतरि के मुकुंद ओइजा के सुविख्यात मंदिर में गइले. लोगन के मन में एह मंदिर के प्रति बहुते श्रद्धा भाव रहेला. कारन ई बा कि एह मंदिर में का जाने कतना लोगन के कठिन- कठिन रोग ठीक भइला के चमत्कार भइल बा. आज भी एह मंदिर के अलौकिक घटना वाला मंदिर मानल जाला. मुकुंद घोष के सबसे बड़की चाची के संगे घटल एगो प्रसंग सुनीं, उनहीं के कहल- “हम मंदिर में एक हफ्ता ले बइठल रहनी एकदम उपासे आ तोहरा (मुकुंद के) चाचा (अपना पति) के एगो पुरान रोग से छुटकारा खातिर प्रार्थना करते रहि गइनी. सातवां दिने हमरा हाथ में अपने आप एगो बूटी परगट हो गइल. हम ओह बूटी के काढ़ा बना के तोहरा चाचा के पिया दिहनी. उनुकर रोग तुरंते ठीक हो गइल आ फेर कबो ना भइल.” त मुकुंद ओही चमत्कारी पवित्र मंदिर में गइले.

ओह मंदिर में शिवलिंग के गोल पत्थर (योगी कथामृत में इहे लिखल बा) के अलावा कुछु ना रहे. शिवलिंग अनादि आ अनंत ब्रह्म के प्रतीक ह. शिवलिंग निराकार ब्रह्म के भी प्रतीक ह. मुकुंद के मन:स्थिति ओह घरी वैराग्य से एतना भरल रहे कि उनकरा शिवलिंग के प्रणाम करे के इच्छा ना भइल. उनुका लागल कि ईश्वर अपना आत्मा में खोजे के चाहीं. त ऊ बिना प्रणाम कइले मंदिर से बहरा आ गइले और रणबाजपुर के दिशा में चल दिहले. रास्ता में एगो आदमी मिलल तो ओकरा से रणबाजपुर के रास्ता पुछले. बहुत सोचला का बाद ऊ कहलसि कि आगे एगो चौराहा आई, ओइजा से दहिने मुड़ि जइह आ चलत चलि जइह. रणबाजपुर पहुंचि जइब.
ओह आदमी के बतवला के मुताबिक मुकुंद एगो नहर के किनारे- किनारे चलत गइले. चलत- चलत अन्हार हो गइल. जुगुनू चमके लगले सन आ सियार- हुआं- हुआं बोले लगले सन. चंद्रमा के प्रकाश एतना मद्धिम रहे कि ठीक से रस्तो ना लउके. दू घंटा ले ऊ ठोकर खात चलते रहि गइले. एगो गांव का नजदीक पहुंचले त एगो किसान मिलले. मुकुंद रामगोपाल मजूमदार के बारे में पुछले. किसान कहले कि एह नांव के कौनो आदमी हमरा गांव में ना रहेला. तूं झूठ बोलतार आ तूं जासूस हउव. ओकर पालिटिकल शंका दूर करे खातिर मुकुंद कारुणिक ढंग से आपन उद्देश्य बतवले. तब जाके ऊ किसान कहले कि रणबाजपुर त एइजा से काफी दूर बा. चौराहा से तोहरा बाएं मुड़े के चाहीं, तूं दाएं मुड़ि गइल बाड़. उल्टा दिसा में आ गइल बाड़. मुकुंद सोचे लगले कि जौन आदमी रास्ता बतवले रहे, ऊ त अनभिज्ञ पथिक खातिर अभिशाप बा, बलाय बा. ऊ किसान उनुका के मोटा चावल के भात, मसूर के दाल आ आलू- कच्चा केला के तरकारी खियवले. भोजन बहुते स्वादिष्ट रहे. मुकुंद खातिर किसान एगो छोट झोंपड़ी में सूते के बेवस्था क दिहले. दूर कहीं कीर्तन होत रहे. मृदंग आ करताल के आवाज आवत रहे. मुकुंद मन में एकांतवासी रामगोपाल मजूमदार के लगे पहुंचे के प्रार्थना करे लगले. उनुका नींदे ना लागल.

सबेरे सूर्योदय होते ऊ रणबाजपुर खातिर चल दिहले. काटल धान के ठूंठ आ खेत के ढेला से बचत- बचावत चले लगले. जेकरा से रणबाजपुर के ठेकाना पूछसु ऊ कहे कि बस एक कोस (दू मील) बा रणबाजपुर. चलत- चलत छव घंटा बीत गइल. मुकुंद के लागल कि रणबाजपुर हमेसा खातिर एक कोस दूरे रही का? आखिर कहां बा रणबाजपुर? आसमान से दुपहरिया के सूर्य भगवान जइसे आगि बरसावत रहले. मुकुंद खेते- खेत चलल चलि जात रहले. तलहीं मुकुंद देखले कि एगो आदमी उनुका ओर चलल आवता. ओकरा से रणबाजपुर का बारे में ना पुछले कि का जाने ऊहो कहि देउ कि – एक कोस दूर बा. ऊ अदिमिया मुकुंद का लगे आके रुकि गइल. नाट कद, दुबर- पातर शरीर बाकिर ओकर आंखि करिया आ हृदयवेधी रहे. माने आंखि अइसन कि जइसे सामने वाला का भीतर तक देखत होखे. आंख के अलावा ओह आदमी के व्यक्तित्व तनिको प्रभावशाली ना रहे. तले ऊ कहलसि- “हम त रणबाजपुर से जाए वाला रहनी हं. बाकिर तोहार उद्देश्य नीमन रहल ह, एही तोहार प्रतीक्षा क लिहनी हं.” फेर कहलसि- तूं बिना सूचना दिहले हमरा किहां चलि आइल बाड़, चतुराई देखावतार? जे तोहरा के हमार पता देले बा, ऊहो अनाधिकार काम कइले बा.

मुकुंद देखले कि अइसन सिद्ध पुरुष के आपन परिचय दिहल बेकारे बा. ई त पहिलहीं से सब जानतारे. अचानके ऊ आदमी पुछलसि- “अच्छा बताव त, तोहरा बिचार से भगवान कहां बाड़े?” मुकुंद व्याकुल होके कहले- “काहें? भगवान हमरा भीतर बाड़े आ सब जगह बाडे. सर्वव्यापी बाड़े.”



ऊ आदमी कहलस- “सर्वव्यापी, हं.” दबल हंसी हंसि के कहलस- “तब काहें, युवक महोदय, तूं काल तारकेश्वर मंदिर में प्रस्तर- प्रतीक में विद्यमान ब्रह्म के आगे आपन सिर ना झुकउव? तोहरा अभिमान के कारने तोहरा के ई दंड मिलल ह आ ऊ पथिक दाएं-बाएं के सूक्ष्म भेद के चिंता ना कके, तोहरा के गलत दिशा में भेज दिहुए. आजुओ तोहरा बहुत मुसीबत झेले के परल ह. ” मुकुंद एह बात से विस्मय विभोर हो गइले कि उनुका सामने खड़ा एगो अति साधारण आदमी के भीतर एतना सर्वव्यापी दृष्टि लुकाइल बा. ऊहे आदमी रहले महान साधक रामगोपाल मजूमदार.

रामगोपाल जी कहले- “भक्त में ई सोचे के प्रवृत्ति होला कि ऊ जौन मार्ग अपनवले बा, ऊहे ईश्वर प्राप्ति के एकमात्र मार्ग बा. योग जौना से ईश्वर मिल जाले, निश्चिते सर्वोच्च मार्ग ह, जइसन कि लाहिड़ी महाशय (महान गुरु- श्यामा चरण लाहिड़ी महाशय) कहले बाड़े. अपना भीतर ईश्वर के प्राप्ति हो गइला पर हमनी के जल्दिए बाहरो ओकर अनुभूति करे लागेनी जा. तारकेश्वर आ अन्य जगहन के पवित्र मंदिर के प्रति लोगन के श्रद्धा बिल्कुले सही बा काहें से ई कुल स्थान आध्यात्मिक शक्ति के केंद्र हउवन स.”

रामगोपाल मजूमदार आगे कहले- “छोटका योगी. हम देखतानी कि तूं अपना गुरु से दूर भागतार. उनका लगे ऊ कुल चीज बा, जौना के तहरा जरूरत बा, उनुका लगे वापस लौटि जा. पहाड़ तोहार गुरु ना बन सकेले सन.” ईहे बात त दू दिन पहिले मुकुंद के गुरु स्वामी श्रीयुक्तेश्वर जी कहले रहले. रामगोपाल जी कहले- “सिद्ध लोग खाली पहाड़े पर रहसु अइसन कौनो विधि के विधान नइखे. भारत आ तिब्बत के हिमालय शिखरन के संत लोगन पर एकाधिकार नइखे. जेकरा के अपना भीतर पावे के कष्ट ना कइल जाउ, ओकरा के शरीर कहीं दोसरा जगह ले जाके पावल ना जा सकेला.”

फेर रामगोपाल जी एगो महत्वपूर्ण बात कहले- “तूं अपना घर में एगो छोट कमरा के व्यवस्था क सकेल, जौना के दरवाजा बंद कके तूं एकांत में रहि सक?”

मुकुंद कहले- “जी हं.”

रामगोपाल जी कहले- “त ऊहे तोहार गुफा ह. ऊहे तोहार पावन पहाड़ ह. ओइजे तूं ईश्वर के पा सकेल.”

रात भर रहि के मुकुंद माने परमहंस योगानंद वापस जब तारकेश्वर धाम लौटले त मंदिर में जाके शिवलिंग के परम श्रद्धा से प्रणाम कायिले. उनुका लागल कि शिवलिंग गोलाकार वृत्त में चारो दिशा में अनंत तक फैलल बा. ओकरा बाद ऊ अपना गुरु स्वामी श्रीयुक्तेश्वर जी का पासे लौटि अइले. आ संन्यास के ट्रेनिंग पूरा कके अतना प्रसिद्ध भइले कि आजु उनुका के पूरा दुनिया जानता. कुछ बरिस बादे ऊ भारत में- “योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ इंडिया” आ अमेरिका में “सेल्फ रियलाइजेशन फेलोशिप” नामक संस्था के स्थापना कइले.

(लेखक विनय बिहारी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
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