Bhojpuri: बुढ़वा मंगर ले फगुआ-जोगीरा के सरसता परवान चढ़ेला, पढ़ीं होली विशेष

बसंत पंचमिए से त समहुत हो जात रहे फगुआ गावे के. बिरज, बरसाना आ वृंदावन से अलगा हटिके भोजपुरिया होरी के आपन खासियत रहल बा. छकिके एक-दोसरा से रंग-गुलाल, अबीर खेले आ बहुरंगी फगुआ गावे के खासियत. फागुनी पुरनवासी आ चइत के पहिलके दिन ले ना, बुढ़वा मंगर ले फगुआ-जोगीरा के सरसता परवान चढ़ेला.

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  • Last Updated: March 24, 2021, 3:11 PM IST
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अलमस्त फागुनी महीना. सरसों आ टेसू के फूलन से सजल-संवरल,बसंती चुनरी झमकावत, लहरात-बलखात प्रकृति रानी.धूरि-गरदा के गुबार लेले छेड़छाड़ करत उतपाती पवन के झकोरा. लखरांव में आम के मोजर से टपकत मद-पराग. रस भरल महुआ के उज्जर-उज्जर मादक फूल. नयना में नेह जगावत पलाश,सेमर आ कचनार. कोइलर के 'कुहू-कुहू' के कूक. आलस के आलम. मन में फूटत बसंती कोंपड़. का सचहूं फागुन आ गइल?

बाकिर आजु काहें नइखे लउकत ऊ फागुनी नजारा? आखिर कहवां हेरा गइल कन्हैया के इंद्रधनुषी रंग से लबालब भरल फिचुकारी? काहें नइखी नजर आवत भींजल चुनरी में सकुचात-लजात राधा? रंग रंगीली फुहार का जगहा ई सुखार काहें? एक-दोसरा से चुहलबाजी आ मीठ छेड़खानी! भादों के भींजल तन-मन के सुखावे खातिर आंचर के खोलि देबे के सलाह अब काहें नइखे देत कवनो रसिया?

खोलि दऽ अंचरवा, लागे घाम

भादों के भींजल बा जोबनवा!
बसंत पंचमिए से त समहुत हो जात रहे फगुआ गावे के. बिरज, बरसाना आ वृंदावन से अलगा हटिके भोजपुरिया होरी के आपन खासियत रहल बा. छकिके एक-दोसरा से रंग-गुलाल, अबीर खेले आ बहुरंगी फगुआ गावे के खासियत. फागुनी पुरनवासी आ चइत के पहिलके दिन ले ना, बुढ़वा मंगर ले फगुआ-जोगीरा के सरसता परवान चढ़ेला. गवैया गोल के गोल ढोलक, झाल, झाझ आ डफ लेले निकलि परेलन. एक-दोसरा से चुहलबाजी करत, रंग-अबीर खेलत फाग राग अलापे में मस्त नर-नारी. अइसना में केकरा फिकिर बा राह-कुराह के! जदी जाने-अनजाने लौंग के कांट गड़िओ गइल, त देवर आखिर कवना दिन-रात खातिर बाड़न? ऊ त निकलबे करिहन.फेरु दरद के छूमंतर-अस भगावे वाला प्रियतमो त बाड़न-

चले के रहिया त चललीं कुरहिया से

गड़ि गइले ना,



लवंगिया के कंटवा से गड़ि गइले ना!

देवरा ऊ कंटवा निकलिहें ननदिया

से पिया मोरे ना,

से हरिहें दरदिया से पिया मोरे ना!करे

सम्मत जरावे माने होलिका दहन के नायाब प्रतीकात्मक परिपाटी. माघ सुदी पंचमी का दिनहीं से बांस-बल्ला, लकड़ी, गोइंठा तय चौक चौराहा पर जमा करेके होड़. चोरा-चोरा के जुटावल लकड़ी के ढेरी शुभ मुहूरत पर अगजा जरावे के रसम. हवन सामग्री का संगहीं नवान्न-बूंट के झेंगरी, गहूं के बाली,नीम के पतई आ लरिकन के उबटन लगवला से निकलल मइल के सम्मत में डालिके उठत धुआं के दिशा से नया सम्मत के शुभ-अशुभ के अंदाज. सरसों के तिलाठी बान्हिके मशाल जुलूस के शकल में जरत लुकाठी भांजत गांव के सिवाना का बहरा फेंकि आइल आ सम्मत का बगल में बइठिके झलकूटन करत फगुआ गावे के मस्ती के का कहे के! सम्मत जराके रोग-बियाध का संगहीं बैरभाव, मन के मइल, ईर्ष्या-द्वेष जइसन तमाम बुराई जरा दिहल गइली स. फेरु त मन चंगा हो गइल. दिल के कोना-अंतरा में लुकाइल काम-प्रवृत्ति मुखर हो उठल. आजु कवनो पाबंदी ना रहल.'अररर भइया--सुनि लऽ मोर कबीर!' जोगीरा भा कबीर का जरिए अगर गारिओ दे देबऽ,त केहू अमनख थोरहीं मानी-

गारी के भइया हो, बुरा न मनिहऽ

होरी हऽ भई होरी हऽ!

धूरखेली आ रंगन के छटा का संगहीं कीच-कादो, धूरि-गोबर आ गारी-गलौज. बूढ़ का संगें जवान मेहरारू के देवर-भउजाई के नेह-नाता.सूतल मनोभाव के जगावे आ उगिले के होड़. दोसरा ओरि राधा-किसुन के परेम में पगल निश्छल होरी-

इत से निकली नवल राधिका

उत से कुंवर कन्हाई,

खेलत फाग परस्पर हिलि-मिलि

सोभा बरनि न जाई

घरे-घरे बाजे बधाई

ब्रज में हरि होरी मचाई!

रस भरल होरी में रसलोलुप पाखियन के उड़ान आसमान छूवेला.अगर सोझ-सपाट मरद घोड़ा बेचिके सूतल रही आ कवनो रसिया कागा यौवन-रस लुटला का संगहीं नकबेसरो लेके उड़न-छू हो जाई, त मेहरारू बेचारी का करी! अइसन अभागा पियक्कड़ पति के नींन के अइसन-तइसन!

नकबेसर कागा ले भागा

सइयां अभागा ना जागा

उड़ि -उड़ि कागा कदम पर बैठा

जोबन का रस ले भागा

सइयां अभागा ना जागा!

मुंह, आंख, चुनरी-किछऊ त बाकी ना रहल. बसंती हवा के छुअन अंग-प्रत्यंग सिहरा देत बा राधिका के. ओहू पर श्याम के फिचुकारी के धार. राधा के हाल बेहाल. ऊ मने-मन निहाल होत कहत बाड़ी-'मत मारो श्याम पिचकारी!' जदी एहू प कान्हा नइखन मानत, त माई जसोदा से शिकायत करहीं के परी.

बाकिर आजु ई कइसन बदलाव? फागुन आके चुपचाप चलल जा रहल बा. एक ओरि महामारी के आफत, दोसरा ओरि चुनावी उठा पटक. सुरसा-अस मुंह बवले महंगी के मार आ दिमागी तनाव से त्रस्त समाज. तबे नू आजु नइखे फूटत आनंद के रससिक्त कऽ देबे वाला उद्गार-निश्छल भाव से फागुनी शुभकामना-

सदा आनंद रहे एहि द्वारे

मोहन खेले होरी!

कतहीं होलिका दहने में हमनीं के हर्षोल्लास, उत्साह आ सांस्कृतिक चेतना के त ना जरा दिहलीं जा? तबे नू नइखे फूटत सांच मन से सिंगार के होली-गीत! साइत हिरदया के फिचुकारी में अब रंगे नइखे बांचल.दिल रसहीन हो गइल बा. फेरु का सिंगार, का हास, का हर्षोल्लास आ का होरी!

रीत गइल मन के फिचुकारी,

रस-रंग कहवां पाईं?

आखिर कब तक हमनीं के नशा में धुत्त होके, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आयातित अपसंस्कृति में आपन सुध बुध खो के गौरवान्वित होत रहबि जा? कब लवटबि जा कुदरत आ कृत्रिमता से सहजता का ओरि? आखिर कब मन परी जिनिगी से गहिरे जुड़ल आपन सांस्कृतिक धरोहर होरी? तनी मुड़िके देखीं, जिनिगी में हर्षोल्लास, उमंग के इंद्रधनुषी रंग भरे खातिर होरी-फगुआ के मदमस्त चितवन राउर पीछा करत बा. तनी सम्हरि के-फागुन महिनवा आइल सुदिनवा--! (डिस्क्लेमर- लेखक भगवती प्रसाद द्विवेदी वरिष्ठ स्तंभकार हैं.)
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