Bhojpuri: खपड़िया बाबा के अद्भुत हरिकीर्तन परंपरा, जानीं काहें भइल शुरू

एगो विलक्षण तेजस्वी साधु खपड़िया बाबा उत्तर प्रदेश के जिला बलिया जिला के द्वाबा क्षेत्र में घूमत- फिरत अइले आ बैरिया- लालगंज मुख्य मार्ग से करीब 1 किलोमीटर से तनी बेसिए दूरी पर मौजूद श्रीपालपुर गांव में एगो कुटी बना के रहे लगले. उद्देश्य- लोगन के ई समुझावल कि भगवान हमनी के आपन हउवन, सबसे प्रिय आ करीबी, उनुका के पावे के आसान उपाय बा हरिकीर्तन आ जप.

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हो सकेला रउरा खपड़िया बाबा के ना जानत होखीं. एसे कि ऊ प्रचार के कौनो महत्व ना देत रहले ह. खाली ईश्वर के नाम जप आ संकीर्तन के अपना चेतना के केंद्र में राखत रहले ह. जप करत करत जब मनुष्य प्रेम/भक्ति के गहराई में उतरेला त उच्चारण कब अजपा जप में रूपांतरित हो जाला, केहू ना कहि सकेला. आजु से लगभग 68 साल पहिले के बात ह. उनइस सौ तिरपन ईस्वी में एगो विलक्षण तेजस्वी साधु खपड़िया बाबा उत्तर प्रदेश के जिला बलिया जिला के द्वाबा क्षेत्र में घूमत- फिरत अइले आ बैरिया- लालगंज मुख्य मार्ग से करीब 1 किलोमीटर से तनी बेसिए दूरी पर मौजूद श्रीपालपुर गांव में एगो कुटी बना के रहे लगले. उद्देश्य- लोगन के ई समुझावल कि भगवान हमनी के आपन हउवन, सबसे प्रिय आ करीबी, उनुका के पावे के आसान उपाय बा हरिकीर्तन आ जप.

धीरे- धीरे उनकरा विद्वता, ईश्वर प्रेम आ साधना के कारण उनुकर नांव चारो तरफ फइल गइल. आज देश- बिदेश में कई लोग खपड़िया बाबा के भक्त मिल जाई. एह आश्रम के नांव परि गइल बा- संकीर्तन नगर. खपड़िया बाबा के चर्चा बिना वैश्विक परिदृश्य अधूरा लागता. बाबा चौबीस घंटा में एक बार भोजन करत रहले ह. कौना बर्तन में? खपड़ा में. ई खपड़ा का ह? त सरकार खपड़ा कौनो माटी के बर्तन के एगो टुकड़ा के कहल जाला. मान लीं कौनो माटी के गगरी फूटि के टुकड़ा- टुकड़ा हो गइल. त ओही टुकड़वा के खपड़ा कहल जाला. एगो अउरी अर्थ बा खपड़ा के. पहिले घर खपड़ैल के बनत रहले ह सन. घर के छत नरिया- थपुआ के रहत रहल ह. अबो गांवन में पुरान खपड़ैल के घर मिल जइहन स. बाकिर ओ खपड़ा में बाबा ना खात रहले ह. माटी के गगरी फुटला पर जौन टुकड़ा होले सन, ओही में से एक टुकड़ा लेके बाबा राखत रहले ह. ओही में कौनो घर से जौन कुछ मिल जाई ओकरे के भोजन के रूप में स्वीकार करत रहले ह. ऊहो चौबीस घंटा में एक बार. बहुते सरल जीवन. बाकिर साधना उच्च कोटि के. चूंकि बाबा खपड़ा में खात रहले ह एही से उनुकर नांव परल खपड़िया बाबा. एतरे उनुकर नांव मुनीश्वरानंद जी रहल ह. साधु लोगन के नांव ईश्वर के मन परावेला. हमनी का अपना नांव खातिर मुअत- जियत रहेनी जा आ साधु लोग के नांव- गांव से कौनो फरके ना परे. इहे भारी अंतर बा. एक ओर अहं ऊंचा कुरसी पर बइठल बा त दोसरा ओर अहं के कौनो अस्तित्वे नइखे. रउवां कुछू नांव ध दीं. साधु लोग लोक कल्याण के काम करत रही.

खपड़िया बाबा के बारे में प्रसिद्ध बा कि ऊ हरिकीर्तन के बहुत महत्व देत रहले ह. कहत रहले ह कि हरिनाम के जप- “हरे राम, हरे राम, राम राम हरे हरे. हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे” के जाप मनुष्य के रक्षा करी, बुद्धि दी आ अनंत प्रकार से कल्याण करी. एही से उनुका आश्रम में चौबीस घंटा हरिकीर्तन होला. उनुकर शुरू कइल परंपरा आजुओ जारी बा. चौबीस घंटा हरिकीर्तन कइल साधारण बात नइखे. रउरा घर में अगर चार आदमी बा आ चारो आदमी अगर चौबीस घंटा हरिकीर्तन करी त एक आदमी का जिम्मा छव घंटा हरिकीर्तन करे के रही. पहिला हाली छव घंटा हरिकीर्तन क के तनी देखीं त! रउरा तीने घंटा में थाके लागब. कीर्तन के आदत नइखे, परेशान होखे लागब. बाकिर खपड़िया बाबा लोगन के एतना अभ्यस्त क देत रहले ह कि एक आदमी के छवो घंटा कीर्तन करे के बा त ऊ आनंदे में रहेला. शर्त ई बा कि ओकरा हरिकीर्तन के अभ्यास होखे. खपड़िया बाबा मान्यता रहल ह कि हरिकीर्तन से लोक कल्याण होला. एह पृथ्वी पर रहे वाला हर जीव के रक्षा होला. माने-

लोका: समस्ता: सुखिनो भवंतु. अब देखीं अध्यात्म के विद्वान लोग कहले बा कि कौनो चिंतन भा शब्द के बार- बार दुहराव/ आवृत्ति बहुते गहिर आ मूर्त- अमूर्त फल देबे वाला होला. ओकर फल स्थाई होला. अच्छा त कौनो पाठ या जप जब समूह में कइल जाउ तब का होई? ओकरा शक्ति, स्पंदन आ वेग के कारण ओकर प्रभाव चमत्कारी आ अनंतगुना हो जाला. इहां तक कि हरिकीर्तन खतम भइला पर जे ओइजा प्रणाम करे जाला ओकर पर हरिकीर्तन के स्पंदन के प्रभाव परेला. एकरे के अंग्रेज लोग रेजीडुअल वाइब्रेशन कहेला. भजन भा कीर्तन भा ध्यान खतम हो गइल तबो ओह जगह के पवित्रता के स्पंदन बनल रहेला. त एही से लागता कि खपड़िया बाबा के समूचा पृथ्वी के कल्याण करे वाला साधक कहे के चाहीं. कुछू खा लिहें, सादा वस्त्र पहिर के भजन- कीर्तन के दिव्य नशा में डूबल आनंद मनावत रहले ह.
खपड़िया बाबा के बारे में एगो अउरी बात प्रसिद्ध बा. जेकरा कौनो संतान ना होखत रह ह, ऊ खपड़िया बाबा के शरण में जात रहल ह. आ चमत्कार देखीं कि ओकरा संतान प्राप्ति हो जात रहल ह. एकर शुरूआत कइसे भइल. त एगो सोनार भाई रहले. उनुका कौनो संतान ना होखत रहले. ऊ आपन दुख लेके खोपड़िया बाबा का लगे पहुंचले. बाबा पूजा- पाठ, हरिकीर्तन करेके कहले. आ सचहू उनुका संतान हो गइल. तबसे निसंतान लोग खपड़िया बाबा के दरबार में जुटे लागल. बाकिर ईहो बात प्रसिद्ध बा कि खपड़िया बाबा केहू से कहत ना रहले ह कि तोहरा संतान होई भा ना होई. बस लोग उनुका के प्रणाम करी आ चलि जाई. एही के लोग बाबा के मूक आशीर्वाद बूझत रहल ह.

खपड़िया बाबा के एगो शिष्य बतवले कि पिछला साल यानी 2020 में बाबा के 35वां निर्वाण दिवस मनावल गइल रहे. त बाबा के महासमाधि के तिथि के पता चलि गइल. सन 2020 में बाबा के शरीर छोड़ला 35 साल हो गइल रहे. अइसन महान साधु शरीर भले छोड़ि देला लोग, ओह लोगन दिव्य आशीर्वाद हमेशा बनल रहेला. एह घरी 24 घंटा हरिकीर्तन आ आश्रम के देखरेख खपड़िया बाबा के शिष्य स्वामी हरिहरानंद जी के जिम्मे बा. हरिहरानंद जी भी उच्च कोटि के साधु बाड़े. त चौबीस घंटा हरिनाम के परंपरा आज भी जारी बा. हरिकीर्तन चलत रहेला आ लोग ओमें आके घंटा- दू घंटा बइठि के हरिकीर्तन करेला. केहू आधा घंटा भी कके चलि जाला. बाकिर ओतने में ऊ ईश आशीर्वाद से ओतप्रोत हो जाला. नाम जप के प्रत्यक्ष फल एकरा से बड़ का होई? बस अतने ख्याल रहे कि नाम जप का घरी मन शांत रहे. साधु- संत कहले बा लोग कि चंचल मन के शांत करे खातिर भगवान का आगा सरेंडर क दिहल जाला.

हमनी के उपनिषद कहतारे सन कि अमूर्त से मूर्त के उत्पत्ति भइल बा. हमनी के स्थूल शरीर के पीछे सूक्ष्म शरीर बा आ सूक्ष्म शरीर के पीछे कारण शरीर बा. त अमूर्त के महत्व ढेर हो गइल. अजपा जप भी अमूर्त बा. बाकिर ऊ मूर्त जप से ढेर प्रभावशाली बा. ईहे खपड़िया बाबा नियर उच्च कोटि के संत बतावेला लोग. हमनी के जौन बात बार- बार सोचबि जा ऊ हम के जीवन में घटित हो जाई. थाट प्रासेस भा सोच के बहुत गहिर प्रभाव होला. हरिकीर्तन आ जप में राउर ध्यान भगवान का ओर रहेला, एही से भगवान के आशीर्वाद के स्पंदन रउरा आत्मा के गहराई तक चलि जाला. खपड़िया बाबा के आश्रम में रामचरित मानस के अखंड पाठ, महायज्ञ, रुद्राभिषेक वगैरह भी होत रहेला. समूचा आश्रम परम पवित्रता आ ईश्वरीय आभा से ओत- प्रोत रहेला. (लेखक विनय बिहारी सिंह वरिष्ठ स्तंभकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

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