Bhojpuri:भोजपुरिया माटी के शेर रहन मंगल पांडे, जे छोड़इले रहन अंग्रेजन के छक्का!

गंगा के माटी के असरे कहल जाई कि इहवां जनमल लोग के केतनो दुख झेले के परो, बाकिर ऊ आपाना स्वाभिमान पर आंच ना आवे देला. भरोसा नइखे त 1763 से करीब 1800 ईस्वी तक चले वाला संन्यासी विद्रोह के यादि करीं.

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भोजपुरिया समाज गंगा जी के गंगा माई कहेला. तीनों लोकन के तारे वाली गंगा माई के धार के एगो आउर खासियत बा. गंगा माई के पानी खाली तरावटे ना देला, सिर्फ पवित्रता के ही जरिया ना ह, बल्कि एह के तासीर बड़ा तेज होला. ऊ जब भोजपुरिया इलाका में चहुंपेला त ओकर तासीर पूछहिं के नइखे. भरोसा नइखे त 1763 से करीब 1800 ईस्वी तक चले वाला संन्यासी विद्रोह के यादि करीं. बिहार से लेके बंगाल तक ले गंगा के किनारे वाला इलाकन के साधु-संन्यासी बागी हो उठल रहले. भोजपुरिया आ गंगा किनरही माटी के बांकपन पर छपरा के कवि राणा परमार ठीके लिखले बाड़े,

साखी गवाह, आसमान इतिहास बा, लोहा चिबावे भोजपुरिया.
ललकार सुने जब अरि दल के, तब तेगा उठावे भोजपुरिया..

दुश्मन दल के ललकार सुनि के बागी बनल रहले मंगल पांडे एही भोजपुरिया माटी के मनईं रहले. उनुका के आजुए के दिने ईस्ट इंडिया कंपनी सरकार फांसी पर लटकवले रहे. 8 अप्रैल 1857 के दिने कलकता के बैरकपुर छावनी में जब एह बीर के फांसी दियाइल, ओह घरी उनुकर उमिर महज 26 साल रहे. उत्तर प्रदेश के बलिया जिला के जवना नगवां गांव में अंग्रेज सरकार पर क्रांति के दौरान पहिलका गोली दागे वाला में मंगल पांडे जनम लेले रहले, ऊ आजुओ ठीक गंगाजी के किनारहीं बा.
गंगा के माटी के असरे कहल जाई कि इहवां जनमल लोग के केतनो दुख झेले के परो, बाकिर ऊ आपाना स्वाभिमान पर आंच ना आवे देला. एह भोजपुरिया मानस के कवि राजेश्वर सिंह राजेश ठीके चित्रण कइले बाड़े,



करे गड़िवानी, दरवानी, हरमुठाहीं,
बने के चाहेला बेसी पलटन सिपाही..

माने भले भोजपुरिया आदमी के गाड़ी हांके के परी, ड्राइवरे करे के परी, चाहे ऊ दरवाने बनि के आपन रोजी कमाई, चाहे ओकरा खेती करे के परी, लेकिन भोजपुरिया माटी में कुछु खास जरूर बा कि इहवां पैदा भइल लोग आपना मातृभूमि पर सबकुछ कुरबान करे के हमेशा तेयार रहेला. इहे वजह बा कि भोजपुरिया समाज के बहुते लोग पलटन में सदियन से सेवा करत रहल बा.

बलिया के साधारण घर-परिवार में जनमल मंगल पांडे 1857 में अइसन असाधारण काम कइले, जवना से लंदन तक ले हिलि गइल. 30 जनवरी 1831 के जनमल मंगल पांडे 1849 में ईस्ट इंडिया कंपनी के पलटन में भरती हो गइले. बंगाल नैटिव इन्फैंटरी में उनुकर कामकाज ठीक से चलत रहे. एही बीचे 1853 में सिपाही लोगन के एनफील्ड बंदूक दिहल गइल. ई बंदूक बरसन से इस्तेमाल होत रहे ब्राऊन बैस बंदूक के मुकाबले अचूक रहे. लेकिन एह में जवन गोली भरात रहे, ओकरा के भरे के पहिले दांत से काटे के परत रहे. दरअसल कारतूस के दांत से काटि के खोले के परत रहे आ ओकर बारूद बंदूक के नली में डालि के फेरू कारतूस चढ़ावे के परत रहे. ओह कारतूस के बाहरी हिस्सा में चरबी के इस्तेमाल होत रहे, ताकि ऊ सीलन में भी सही रहे. ओह घरी कहात रहे कि ई चरबी या ता गाय के ह भा सूअर के. गाय जहां हिंदू समाज के पूज्य ह त सूअर से मुसलमान समाज के परहेज रहे. एह वजह से दूनों वर्ग के सिपाही गुस्सा में रहले.

एही बीचे ईस्ट इंडिया कंपनी के लूट-खसोट के नीति के चलते अंदरे अंदर क्रांति के बीज सुलगत रहे. क्रांतिकारी लोगन के प्रतीक रहे कमल के फूल आ रोटी. क्रांति खातिर तीस मई 1857 के तारीख तय भइल रहे. पता न एकर जानकारी मंगल पांडे के रहे कि ना रहे. एही बीचे 29 मार्च 1857 के दिने कारतूस भरे से मना कइ दिहले आ अपना रेजिमेंट के अफसर के मारि दिहले. बाद में जब उनुका गिरफ्तार करे खातिर जमादार ईश्वरी प्रसाद के आदेश दियाइल त ऊ मना कइ दिहले. शेख पलटू छोड़ि के कवनो सिपाही उनुका के गिरफ्तार ना कइलसि.

आपाना मसहूर कविता विद्रोह में कवि प्रसिद्ध नारायण सिंह एह घटना के बारे में लिखले बाड़े,

‘मंगल’ मस्ती में चूर चलल, पहिला बागी मसहूर चलल.
गोरन का पलटनि का आगे, बलिया के बाँका शूर चलल ॥
गोली के तुरत निसान भइल, जननी के भेंट परान भइल.
आजादी का बलिवेदी पर, ‘मंगल पांडे’ बलिदान भइल ॥

भले मंगल पांडे गिरफ्तार कइ लिहल गइले, बाकिर एह घटना के बाद जइसे देश में सुतल पड़ल रहे बारूद में आगि लागि गइल. मेरठ से दिल्ली, लखनऊ होत बंगाल जलि उठल. जगह-जगह ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ लोग-बाग, सैनिक, किसान बहरि निकलि गइले. वीर सावरकर एह क्रांति के भारत के पहिलका स्वाधीनता संग्राम कहले ठीके कहले बाड़े.
क्रांति के एह रूप पर हिंदी कवि सुभद्रा कुमारी चौहान लोमहर्षक चित्रण कइले बाड़ी. उनुका मोताबिक अंग्रेजन के गुलामी के खिलाफ मुक्ति के पहिलका पत्थर आपन बलिदान कइ के मंगल पांडे रखले,

युग से सुलगे ज्वालामुखियों ने करवट ले आग उगल दी,
तोपों के मुंह तोड़ मचलती दीवानों की टोली चल दी,
आजादी के प्रथम पृष्ठ वह गरम खून से लिखा गया था,
मंगल पांडे मरे, मुक्ति का पहला पत्थर रखा गया था.

इतिहासकार लोग मानेला कि मंगल पांडे के जरावल क्रांति ई ज्वाला के असर रहे कि आजादी कुछुए दूरि रहि गइल रहे. विद्रोह कविता में प्रसिद्ध बाबू लिखले बाड़े,

तनिकी-सा दूर किनार रहल, भारत के बेड़ा पार रहल.
लउकत खूनी दरिआव पर, मंजलि के छोर हमार रहल ॥

लोग पूछेला कि कम पढ़ल-लिखल आ मामूली सिपाही मंगल पांडे के बलिदान के का असर रहे. ई समझे खातिर इतिहास की ओर झांके के पड़ी. इ मंगल पांडे के बलिदाने के असर रहे कि पूरा भारत जलि उठल. मंगल पांडे कंपनी सरकार के खिलाफ भारतीय जनमानस के अंदर पइठल बारूद के चिंगारी रहले. जवना के पहिलका असर 10 मई 1857 के मेरठ छावनी में बगावत के रूप में लउकल. ओकरा बाद क्रांतिकारी लोग आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के बादशाह घोषित कइ दिहल लोग. दिल्ली में भी बगावत हो गइल. दिल्ली पर त अंग्रेजन के कब्जा करे में चौबीस घंटा लागल. देखते-देखत ई विप्लव पूरा भारत में फइल गइल. एकरा बादे ब्रिटेन के महारानी विक्टोरिया के शासन के लागल कि भारत पर शासन कइल आसान नइखे. एकरा बादे भारत पर ईस्ट इंडिया कंपनी के बजाय सीधे ब्रिटिश राजा के शासन शुरू भइल. ई मंगल पांडे के देखावल चिंगारिये रहे कि अंग्रेज सरकार भारत पर शासन करे खातिर जतन शुरू कइलसि आ देखते देखत भारत पर चौंतीस हजार सात सौ पैंतीस अंग्रेजी कानून इहवां लागू कइ दिहलसि.

बाद में जब फेरू आजादी के आंदोलन शुरू भइल, तबो मंगल पांडे प्रेरणा के स्रोत रहले. गंगा किनारे के माटी के सपूत के बारे में सुभद्रा कुमारी चौहान जवन लिखले बाड़ी, ऊ आजुओ बहुते प्रासंगिक बा,

उन्ही शहीदों के सपनों को उठो आज साकार बना दो,
अकर्मण्यता के सागर मे महाक्रांति का ज्वार उठा दो,
मंगल पांडे बनो, आज फ़िर देशभक्ति का दुर्गम पथ लो,
महापर्व के पुण्यस्मरण पर मर मिटने की उठो शपथ लो.
(डिस्क्लेमर- लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)
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