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Bhojpuri: गायब होत जाता कसार आ कोकड़ौर परंपरा

Bhojpuri: गायब होत जाता कसार आ कोकड़ौर परंपरा

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हमनी के भोजपुरिया समाज में बियाह- शादी में कुछ बड़ा स्वादिष्ट पारंपरिक मिठाई बनेली सन. ई मिठाई कौनो दोकान पर ना मिल सकेले. खाली बियाह-शादी के समय बनावल जाली सन. महानगरीय माहौल में एह मिठाइन के लेके बड़ा विचित्र परिस्थिति होत जाता. गांव- जवार में लगन के समय त एह मिठाइन के बनावे वाला कारीगरन के बड़ा मांग रहेला.

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बाकिर महानगर में ओकनी के बनावे वालन के कमी होत जाता. एकर कारन बा कि अब रेडीमेड परंपरा प्रतिष्ठा पा गइल बिया. जौन मिठाई लीक से हटि के बाड़ी सन, आ एकदम बियाहे का घरी बनेली सन ओकनी के कारीगर महानगर में धीरे- धीरे कम होता लोग. ओही में एगो मिठाई बा कसार आ दोसरका कोकड़ौर. महानगर में त अब टिकरियो दुर्लभ होत जाता. टिकरी बेजोड़ मिठाई ह. एगो अउरी बात बा- अब शादी- बियाह के कलेवा भेजे के बा त लोग मिठाई के दोकान पर बोलि के बनवा लेता आ ऊ दोकानदारे छोट- छोट टोकरी में पैक करवा देता. टोकरी का ऊपर रंगीन कागज सटवा देता. पहिले ई कुल मिठाई हलुवाई बोला के घर पर बनत रहली ह सन. घर के लोग मिठाई अपना देख- रेख में बनवाई ताकि जहां मिठाई भेजाता ओइजा कौनो सिकाइत ना होखे. ई नवका परंपरा सुविधाजनक बा. कौनो परेशानी नइखे. बाकिर कुछ परंपरागत मिठाई लुप्त होखत जातारी सन.

कसार त सभे जानता. बियाह का घरी लड़की के घर से वर का घरे भेजल जाला. मजाक में कसार का बीच में पांच रुपया, दस रुपया के सिक्का भी डाल दिहल जाला. जे कसार खाई ओकरा मुंह में ऊ सिक्का जाई. एही से वर के घर के लोग वधू के घर से आइल कसार सावधानी से खाला. शहर में रहे वाली नवका पीढ़ी के लोग ना जानत होई कि कसार कइसे बनेला. चाउर के पीसल आटा के कराही में भूंज के, ओकरा में घीव, चीनी, किसमिस, काजू वगैरह डालला का बाद तनी भूंजल मैदा भी डाल दिहल जाला. मैदा काहें? त मैदा कसार के चुरचुर सवाद वाला बना देला. एह मिश्रण के लड्डू बनावल जाला. एही लड्डू के नांव ह कसार. त अब महानगर के बायेन में कसार नइखे आवत. अब बायेन में रहता- खाझा, लड्डू, कहीं- कहीं बालूशाही आ टिकरी. गजा आ बालूशाही त अब बायेन में बहुते कम आवता. एकर माने अब लोग कसार बनवला से मुक्त होखे के चाहतारे. ई कुल मिठाई बड़ा धैर्य आ एकाग्रता से बनावल जाली सन. हो सकेला अब के लोगन में ऊ धैर्य ना होखे, जौन पुरनका लोगन में रहल ह. अब त लागता कि महानगर के भोजपुरिया लोग कसार भुलाइए जाई. कुछ लोग आशंका जतावता कि कहीं खाझा भी मत लुप्त हो जाउ. काहें से कि खाझा बनावे वाला कारीगर अब कम होत जातारे. अच्छा आधुनिक पीढ़ी कोकड़ौर- बुकवा ना जानत होखी.

शादी में जब वर पक्ष वधू पक्ष का लगे बरात लेके जाला त अपना संगे वधू परिवार के देबे खातिर कोकड़ौर- बुकवा ले जाला. पहिले कोकड़ौर के बनावे के विधि सुनीं- पहिले बुनिया (बूंदी) बनावल जाला, ऊहे बुनिया जौना के लड्डू बनेला. फेर चाउर के भूंजल आटा लेके ओकरा में तनी चीनी आ बुनिया के डाल दिहल जाला. त ई हो गइल कोकड़ौर. मानल जाला कि कोकड़ौर खाइल बड़ा शुभ ह. घर के सबका तनी- तनी खा लेबे के चाहीं. अब महानगर में कोकड़ौर केहू बनावते नइखे. कोकड़ौर के जगह तरह- तरह के स्वादिष्ट मिठाई ले लेले बाड़ी सन. अच्छा बुकवा का ह? बुकवा एक तरह के उबटन ह. जौ के आटा में हल्दी डाल दिहल जाला. ओकर पेस्ट लगावल बड़ा शुभ मानल जाला. जौ के आटा में सोडियम आ मैंगनीज होला. सोडियम हमनी के शरीर के मेटाबोलिज्म संतुलित करेला आ हड्डी खातिर भी लाभदायक ह. मैंगनीज से शरीर के कौनो अंग में भइल सूजन दूर होला. एकरा अलावा मैंगनीज मांसपेशियन के दर्द दूर करेला, कैंसर कोशिका के नष्ट करेला.

त ई उबटन जरूरे फायदा करत होई. तबे वर पक्ष का घर से वधू पक्ष के घरे भेजे के परंपरा बा. अब रहल हल्दी त एकर गुन त सभे जानता. हल्दी हमनी के शरीर के इम्युनिटी (रोग प्रतिरोधक क्षमता) बढ़ावेले हल्दी के कारन हमनी के शरीर में संक्रामक बीमारी ना होली सन. हल्दी में वात आ कफ दोष के कम करे वाला गुण होला. पुरान मान्यता बा कि हल्दी शरीर में खून बढ़ावे में मदद करेले. पहिले आयुर्वेद के डाक्टर लोग सुगर (डायबिटीज) के मरीज के हल्दी सेवन बढ़ावे के कहत रहल ह लोग.

अब रउरा पूछ सकेनी कि बालूशाही आ गजा नियर मिठाई त मैदा से बनेली सन. एकनी में त कौनो पोषक तत्व नइखे. त ई काहें बियाह में बनेली सन? त कुछ परंपरा अइसन बाड़ी सन जौन मनुष्य के स्वाद पर आधारित बाड़ी सन. जइसे पूड़ी वाला भोज में बुनिया. ढेर लोग पूड़ी- तरकारी आ बुनिया के चरम आनंददायी मानेला. स्वाद के जीवन के आधार माने वाला लोगन के कहनाम बा कि एकरा में हमनी के स्वास्थ्य के तत्व ना खोजेके चाहीं. काहें से कि बूढ़ आदमी त तनी मानियो जाई, नौजवान एकरा से परहेज ना क सकेलन स. त एकरा में अच्छा ईहे कहाई कि हमनी का महटिया जाईं जा. त स्वाद के जीवन आधार माने वाला लोगन के बात मानल भा ना मानल रउरा ऊपर निर्भर करता.

अब कुछ लोग कहता कि हर चीजे रेडीमेड होता त अब टिकरी- खाझा के भी हटा के कौनो दोसर सूखा मिठाई भेजे के परंपरा शुरू होखेके चाहीं. त बियाह वाला लड्डू- टिकरी के सवाद आ मिठाई के दोकान पर बने वाला लड्डू- टिकरी के सवाद में अंतर होइए जाला. रउरा खाइब त एकर प्रमाण मिल जाई. बाकिर संकट ई बा कि एकरा के बनावे वाला मिस्त्री/कारीगर कम होत जातारे सन. हम त कोलकाता में एह मिठाई के बनावे वालन के खोज के थाकत रहनी. तले अचानके एगो बिहार के कारीगर मिल गउवे. तब जाके खाझा आ टिकरी बनुए. मिठाई का दोकान पर खाझा बनववला पर ढेर महंग परत रहुए. त हमनी के परंपरा जारी राखे खातिर एह कुल मिठइयन के अपना मीनू में जरूर राखे के चाहीं. आरे साल भर में कबो- कबो त खाए के बा. अचानक चुरचुर खाझा खाके केकरा आनंद ना आई? घर के चूल्हा पर बनल टिकरी आ कसार केकरा अच्छा ना लागी?  चिंता के बात ई बा कि नवकी पीढ़ी एकरा बारे में गंभीरता से सोचे के तेयार नइखे. नवका पीढ़ी जौन चीज सहज- सुलभ बा, ओही के महत्व देता. त जब तक ले हमनी के पुरान परंपरा निबाह सकेनी जा, निबाहीं जा.

(विनय बिहारी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

Tags: Bhojpuri Articles, Bhojpuri News

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