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Bhojpuri: सवाल कृषि उपज के मूल्य निर्धारण के बा, तीन कृषि कानून वापसी के विधेयक सदन में पास हो गईल

Bhojpuri: सवाल कृषि उपज के मूल्य निर्धारण के बा, तीन कृषि कानून वापसी के विधेयक सदन में पास हो गईल

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सरकार हर साल तेईस फसलन के समर्थन मूल्य घोषित करें लें. ओह घोषित मूल्य पर लगभग दस फीसद पैदावार के खरीद पूरा देश में अभी तक संभव भईल बा.बाकि पैदावार बिचवलियों के हवाले अथवा किसान समेत अन्य उपभोक्ताओं के उपयोग में आवेला. समर्थन मूल्य के कानूनी प्रावधान करें से सरकार एह वजह से बचें के कोशिश में बा कि पूरा पैदावार के खरीद आ रख रखाव सरकार खातिर अपने-आप में बड़ा झमेला के काम बा.

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कृषि कानून के वापसी के सवाल पर: तीन कृषि कानून वापसी के विधेयक सदन में पास हो गईल. बाकि संयुक्त किसान मोर्चा अपना ज़िद पर आजु तक अड़ल बा. केंद्र सरकार के रुख में फिलहाल कुछ नरमी के संकेत मिलत बा. बाकि संगे-संगे इहो सवाल उठत बा कि सरकार ई घोषणा अगर पहिले कर देत आ किसानन से बातचीत के रुख अपनावत तब नौबत यहां तक ना पहुंचल रहित. सरकार के मौजूदा रुख में परिवर्तन के आमतौर पर कई राज्यन में होखे वाला विधानसभा चुनाव से भी जोड़ के देखल जात बा. अब किसान के मांग ई बा कि फसल खरीद के न्यूनतम समर्थन मूल्य के कानूनी मान्यता दिहल जाय. दूसरा मांग ई बा कि कृषि मूल्य अउर लागत आयोग के संवैधानिक दर्जा दिहल जाय. अन्य मांग में आंदोलन के दौरान मृतक किसानों को उचित मुआवजा, बिजली के दाम में कटौती, किसानन पर आंदोलन के दौरान मुकदमों की वापसी और पराली जलाने के आरोपी किसानों पर दर्ज जुर्माने को खत्म करें के मुद्दा भी शामिल बा.

सरकार हर साल तेईस फसलन के समर्थन मूल्य घोषित करें लें. ओह घोषित मूल्य पर लगभग दस फीसद पैदावार के खरीद पूरा देश में अभी तक संभव भईल बा.बाकि पैदावार बिचवलियों के हवाले अथवा किसान समेत अन्य उपभोक्ताओं के उपयोग में आवेला. समर्थन मूल्य के कानूनी प्रावधान करें से सरकार एह वजह से बचें के कोशिश में बा कि पूरा पैदावार के खरीद आ रख रखाव सरकार खातिर अपने-आप में बड़ा झमेला के काम बा. एह झमेला के दूर करें के उपाय खातिर ही जनता सरकार चुनें लें. सरकार अपना ओर से एह समस्या के समाधान खातिर पूरा देश में दस हजार ‘किसान उत्पादक संघ’ बनावें के घोषणा कइले रहें, जवना पर अभी तक ठीक से अमल नइखे हो पावल. यहां ई जानल जरूरी बा कि मंडी समिति के शुरुआत देश में किसान नेता सर छोटू राम के प्रयास एह खातिर भईल रहें कि किसानन के पैदावार के उचित दाम मिलें, आ किसानन के विचवलियों के हस्तक्षेप से बचावल जा सकें. देश के चालीस फीसद के करीब गेंहू अउर धान के खरीद जवना पंजाब, हरियाणा से होला-ओह पर ढ़ाई से तीन फीसद मंडी समिति के टैक्स अउर विचवलियों को टैक्स देबे खातिर आज किसान विवश बाड़न. एकरा बाद भी पंजाब, हरियाणा के किसानन खेती खातिर जा फायदेमंद व्यवसाय बा.ओकर कईगो वजह बा. एह पैमाना पर बिहार के किसानन के बारे में केहूं सोचें के तैयार नइखे जहां मंडी समिति सन् 2005 से अस्तित्वें में नइखे. बिहार के किसानन से सस्ते दाम पर पैदावार खरीद कर पंजाब अउर हरियाणा की मंडियों में वाला पंजाब, अनाज व्यवसायियों अउर बिचवलियन खातिर सचमुच ई व्यापार खासा फायदेमंद हो गईल रहें. एह साल ओह पर कुछ हद तक पाबन्दी लागल-जब सरकारी खरीद खातिर खेती के खतौनी के दस्तावेज अनिवार्य बना दिहल गईल. मतलब ई कि एक किसान से खेती के ब्यौरा के मुताबिक ही सरकारी खरीद होई. बाकि एगो कहावत प्रचलित बा कि “ एगो राजा से सौ गुना तेज बुद्धि चोर के होला.” ओकर उपाय खेती ना करें, वाला किसान ई निकललन कि आपन खतौनी अनाज व्यवसायियन के बेंच दिहलन. अभी एह वणिकवाद के उपाय सरकार नइखे खोज पवलें.

सरकार के एगो आकड़ा के मुताबिक देश में 14 करोड़ किसानन के पास खेती लायक जमीन बा. लगभग 11 करोड़ परिवार खेती के काम मे लागल बा. लगभग सत्तर फीसद से कम किसानन के पास एक हेक्टेयर से कम जमीन बा. पंजाब, हरियाणा के एक औसत किसान के पास ग्यारह से चौदह बीघा जमीन बा-जब कि ओकरा तुलना में बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसानन के खेती के दायरा डेढ़ से तीन बीघा से ज्यादा नइखे. पैदावार के मामले में भी जहां पंजाब के किसान एक हेक्टेयर खेती से 50 कुन्तल गेहूँ पैदा होखें के उम्मीद कर सकेला. पूर्वी उत्तरप्रदेश आ बिहार के किसान एक हेक्टेयर से 35 कुन्तल से ज्यादा गेहूँ पैदावार के उम्मीद ना कर सकें.अब सरकारी खरीद पर फायदा के आकलन कईल जाय, तब एक हेक्टेयर जमीन पर गेहूँ के पैदावार से जहां पंजाब के किसान पैंतीस हजार आमदनी के उम्मीद कर सकेला. अतने जमीन पर पूर्वी उत्तर प्रदेश आ बिहार के किसान पंद्रह हजार से ज्यादा आमदनी के उम्मीद ना कर सकें. यहां ई ध्यान दिहल जरूरी बा कि पंजाब, हरियाणा अउर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान -जवना हरित क्रांति से सबसे ज्यादा फायदा उठवलें, उहें ज्यादातर आंदोलन के जरिये, किसानन के शहादत के बल पर सरकार के झुकें खातिर विवश करत बाड़न. एह इलाका के कुलक किसानन के खेती से मुनाफा हर तरह से चाहीं. बाकि देश के खेती-किसानी से जइसे एह लोगन के कवनों मतलब नइखे.

कृषि मूल्य अउर लागत आयोग के संवैधानिक दर्जा के मांग भी सरकार से होत बा. किसान आयोग के गठन के मांग भी एक अरसा से होत रहें. बाकि असल सवाल ई बा कि जब खेती के लागत अलग-अलग इलाका में एक जइसन नइखे, ओह स्थिति में खेती के पैदावार के एक तरह के मूल्य निर्धारण कहां तक जायज बा? खेती के मामला संविधान के समवर्ती सूची में बा. केन्द्र सरकार खातिर सबसे मुफीद उपाय ई होत कि कृषि कानून से संबंधित मामला राज्यन पर ही छोड़ देत. बाकि इहो तय बा कि खेती – किसानी के सवाल पर कवनों अब हाथ लगावें के कोशिश ना करीं. राष्ट्रीय स्तर पर सकल घरेलू उत्पाद में भले खेती के योगदान 18%से ज्यादा नइखे. बाकि सबसे ज्यादा कामगार खेती-किसानी में लागल बाड़न. तब इहो एगो मुश्किले सवाल बा कि अतना कामगारमन के खेती से निकाल के ज्यादा उत्पादक काम में कहां आ कइसे लगावल जाय? सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य के निर्धारण खातिर एगो समिति गठित करें सुझाव देत बिया. संयुक्त किसान मोर्चा से चार सदस्य भेजें के प्रस्ताव भी, सरकार की ओर से कईल गईल बा. सरकार के सामने न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करें के पहिले स्वामीनाथन समिति के सिफारिशों के माने के भी दबाव बा. संगवे एह बात के भी दबाव बा कि उपभोक्ता अउर उत्पादक के हित के बीच उचित संतुलन बनल रहें. केहूं के हित के हकतल्फ़ी अउर अनदेखी ना होखें. एह तरह से देखल जाय, खेती-किसानी बहुत पेचीदा आ संवेदनशील मामला बा. सरकार आ किसान नेताओं के बीच सद्भावना पूर्ण माहौल में ही कवनों समाधान निकल सकेला.

(मोहन सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे उनके विचार निजी हैं.)

Tags: Bhojpuri Articles, Bhojpuri News

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