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Bhojpuri Spl: भोजपुरी के लोक-परंपरा में लवंडा नाच, कबो रहे वैभव के प्रदर्शन

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लवंडा क नाच जीवन में रस घोरे वाला अईसन माध्यम रहे कि ओकरा में सामूहिक मनोरंजन होखे. एह काम में लईका-सयान, बूढ़वा-जवान सब शामिल रहे. कहीं कहीं त इ रहे कि बाप-बेटा एक साथ आनंद उठावत रहलन जा.

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बहुत लमहर समय ले भोजपुरी प्रदेश में शुद्ध मनोरंजन क साधन लवंडा नाच रहल ह. केहू आत्मिक सुख खातिन नाच देखे त केहू के इ वैभव प्रदर्शन क माध्यम रहे. एगो आउर विचार क लोग एमे शामिल रहलन. जईसे कि कुछ लोगन के नाच क जूनून रहल. अपनी खित्ता में एक्को नाच उ लोग छोड़त ना रहलन. अईसन मनई जब नाच देखे जाय त उनकरा संघे दू-चार को लंगोटिया जरुर जात रहे. रस्ता में पान-बीड़ी क खर्चा उहे उठावे. एतने नाही, कुछ लोग नाच क एतना आसिक रहलन की समय-समय पर आपन पईसा लगा के नाच करवावे. नाच देखे में केहू उनके इ कह दे कि ‘एतना शउख ह त आपन करवा के देखा’, फिर का! कवनो अनमोल चीज बेच के करवावे के परे तबो ‘आपन नाच’ करवा के छोड़े.

आज त अईसन बखत आ गईल बा की घर घर में मशीनी बक्सा रख गयल बा. बक्सा में बईठ के दू-चार लोगन के जवन ठीक लागत बा उहे सुनावत बाड़न जा आउर सबरी जनता उहे सुनत बा. कला देखावे में जनता के कहीं कवनो भागीदारी ना ह. इ अलग बात ह की एकरी बादो येह बक्सा के लोग खूब पसंद करत हवे. लेकिन लोक कलाकारन की संग्हे अईसन ना रहे. आप उनकरा से आपन पसंद क गाना गवा सकत रहलीं. उनकरा संग्हे खुद झूम-नाच सकत रहलीं. मतलब की नाच में देखहू वालन क भागीदारी रहे. इ सही ह की लोग येह काम के बहुत सम्मान से ना देखे. लेकिन आनंद की संग्हे अपनी जिनगी में ओकर उपयोग खूब होखे. हमरा के याद बा की लोग कवनो प्रसिद्ध लवंडा क नक़ल क के अपनी पत्नी आउर प्रेमिका के प्रभावित करत रहलन जा. लवंडा क नाच जीवन में रस घोरे वाला अईसन माध्यम रहे कि ओकरा में सामूहिक मनोरंजन होखे. एह काम में लईका-सयान, बूढ़वा-जवान सब शामिल रहे. कहीं कहीं त इ रहे कि बाप-बेटा एक साथ आनंद उठावत रहलन जा. परिवार में जे तनी संकोच करे, छोट-बड़ क लिहाज करे उ छुपके देखे. लेकिन देखे वालन क कमी ना रहे. जेठ की दुपहरिया में खाली गोड़ लोग नाच देखे चल जायं. लुह-सुह से केहू ना डेराय.

नाच देखे एक से एक शरीफ आउर एक से एक लंठ लोग जात रहलन ह. लेकिन बिरले कवनो मूरख अईसन रहे जे लवंडा की मरयादा के ठेस पहुंचावे. आप सोची की केहू लवंडा के नीक-जबुन कुछ बोल दे त लवंडा रूसा जाय. नाचे से मना क देवे. त नाच में बयिठल रसूखदार लोग ओकरा के मनावे जाय. अईसन समय में जाति-धरम, उंच-नीच, छोट-बड़ क बंधन टूट जाय. बयिठले में अमीर-गरीब आउर जाति क भेद रहे. तबो हर तरह क लोग आपन जगह बना लें.

तब लोग दुनियादारी के साथे अपनहू खातिन जियत रहे. सब काम छोड़ के मनोरंजन खातिन समय निकाल ले. खूब आनंद होखे. बियाह-शादी, जनवासा बरात, मुरहा लईका भईले पर नाच करवावे क चलन खूब रहल ह. कहीं देखा देखी होखे, त कहीं क रीति रहे. कहीं लोग रुतबा देखावे खातिन करत रहलन जा. नाच करे/करावे वाली छोट-बड़, कई गो मंडली रहलीं सो. भोजपुरी माटी में त कुछ अयिसनो मंडली रहलिन सो जिनकर सट्टा लिखावे खातिन सोरस लगावे के परे. मुंह मागल पईसा दिहले की बादो जरूत पर सट्टा ना मिले. मंडली मशहूर उहे रहलिन सो जवनी क कलाकार बढ़िया नाचे या त जिनकरी नाच में चिक्कन दिखे वाला कम उमर क लईका मेहरारू की भेस में रहें सो, ओह नाच का मांग ढेर रहे.

ओह संस्कृति क खासियत देखीं. लोग दिनभर खेती-किसानी में काम करे आउर रात भर नाच देखे. बहुत धैर्य की संग्हे इ कुल होखे. आज लोग बात बात पर लड़ जात हवे लेकिन तब सब तरह क दबाव आउर अभाव नाच में जाके लोग बाग़ भुला जाय. ओईसे त श्रमिक समाज हमेशा से रचनात्कम रहल ह. हमेशा कुछ न कुछ करत रहले क परम्परा उनहन लोगन की इहां रहल हिय. लेकिन होली-दिवाली में नाच गाना क विशेष प्रचलन रहे. खासकर होली में त एक महीना नाच होखे.

सरसती पूजा से लेके बूढ़वा मंगर ले लोग लागल रहे. एह आयोजन में बढ़िया खर्च आवे. एक महीना लवंडा खाय आउर गांवे में रहे. एह बीच में ओकर खायल-पीयल आउर सिंगार-पटार क पूरा खयाल रखल जाय. काजर, टिकुली, लाली, पाउडर सब जुटावे के परे. एह समय पूरा गाँव ओकर सेवा करे. ठीक वोईसे जईसे कि दमाद क होखे ले. लोग अपना घरे से अनाज देके लवंडा खातिर पईसा जुटावत रहलन. गाँव में नाच ना देखे वाला लोग खूब भुनभुनाय लेकिन केहू उनकर ना सुने. दूसर बात इ की उहो मने-मने भुनभुनाय. खुल के विरोध करे ना आवे. एह स्वाभाव के लोगन के मालूम रहे कि बहुमत नाचदेखावा लोगन क ह. चुपे रहले में भलाई ह.

नाच में परिवर्तन आईल फिलिम से. हिंदी में जब फिलिम बने लागल त नाचे वाला कलाकार ओकरा के नक़ल उतारे लगलन जा. इ नक़ल उतारे क काम एसे शुरू भयल कि जनता में एकर मांग बढ़ गईल. नाच देखे वाला नवछेड़िया लईका एही पर लोटे लगलन जा. फिलिम क गाना गावल लवंडन क मज़बूरी हो गईल. येह मांग की जड़ में जाईब त समझ आई कि इ समय क बदलाव रहे. जे अपना के समय की संग्हे आगे ना बढ़वलस ओकरा के समाज नकार दिहलस. एह मामले में आप देखब की जनता बड़ी निर्दयी ह. ओकरा के अपनी पसंद क चीज चाही. जे ना दे सकेला ओकर समाज में खोज-पूछ ना होले. सनीमा अयिले की बाद नाच-गाना के भरपूर मान्यता मिल गईल. आज परिवार क लोग लईका-लईकीन के नाचे-गावे सिखावत हवन जा. बल्कि छोट-बड़ शहर/क़स्बा में नाच-गाना सिखावे वाला इस्कूल बन गयल बाड़न स. अब हमहन के इ जरुर सोचे के चाही की फिलिम में नाचल-गावल बहुत बड़हर काम मानल जाला, आउर कलाकार अपनी लईका/लईकी के नाचल गावल सिखावत हवे लोग. लेकिन लोक में जवन गावे/नाचे वाले लोग हवे उनकरा के इ कुल कहीं से बाउर ना लगे.

अब एकर दूसर पहलू देखीं. पाहिले लवंडा नाच के समाज ठीक ना माने. कवनो लईका नाच क हिस्सा बनल चाहे त परिवार में केहू तईयार ना होखे. लवंडा बनल त दूर क बात हिय. गांव-समाज क लोग अपनी लईका-लईकी के नाच-गाना में कवनो रूप में भाग ना लेवे दे. जबकि इ तबो बढ़िया कला रहे आउर आजो उहे ह. तब कुछ परिवार आउर जाति विशेष क लोग येह काम से जुड़ल रहलन जा. जब आप येह काम करे वालन की बारे में खोजब त मिली की अईसन नाचे-गावे वाला लोग ज्यादातर गरीबी में जियत रहलन जा. खेती-बारी ना रहे. मजूरी से जीवन चले. कईगो लवंडा त अयिसनो रहलन की खेती-किसानी की समय खेत में मजूरी करें आउर फिर कटिया-बिनिया की बाद खाली समय में नाचे-गावे. त कुल मिला के खोजबीन से पता चलल कि नाचल-गावल कला प्रेम से अधिक गरीबी/बेरोजगारी क नतीजा रहे. (लेखक रमाशंकर कुशवाहा वरिष्ठ स्तंभकार हैं.)

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