Bhojpuri: असकतियन के तीन नहान, खिंचड़ी, फगुआ आ सतुआन

भोजपुरिया समाज में मीन संक्रांति यानी सतुआन के दिने लोग कवनो अमनिया इनार-कुआं, तालाब – पोखर आउर नदी में नहाला. ओइसे त जे गंगा किनारे के बा, भा जेकरा गांव के लगे कवनो नदी बिया त ओहि में सतुआन के नहाला, ना त लोग सरयू जी में नहाए के तवज्जो देला. सरयू के बारे में भोजपुरी समाज में मान्यता ह कि ऊ कुआंर नदी हई. ई संजोग बा कि ई अकेल नदी बा, जवना पर कवनो अभी ले बांध नइखे बनल.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 14, 2021, 2:32 PM IST
  • Share this:
भोजपुरी इलाका में जब कवनो आदमी ना नहाला, साफ सुथरा ना रहेला त ओकरा बारे में एगो कहाउत कहल जाला,

असकतियन के तीन नहान

खिचड़ी,फगुआ आ सतुआन

एकर मतलब ई ह कि असकती यानी आलसी लोग साल में तीने दिन नहाला, खिचड़ी माने मकर संक्रांति के, फगुआ माने होली आ सतुआन के दिन. ऊहे सतुआन आजु ह.
भोजपुरिया समाज में मीन संक्रांति यानी सतुआन के दिने लोग कवनो अमनिया इनार-कुआं, तालाब – पोखर आउर नदी में नहाला. ओइसे त जे गंगा किनारे के बा, भा जेकरा गांव के लगे कवनो नदी बिया त ओहि में सतुआन के नहाला, ना त लोग सरयू जी में नहाए के तवज्जो देला. सरयू के बारे में भोजपुरी समाज में मान्यता ह कि ऊ कुआंर नदी हई. ई संजोग बा कि ई अकेल नदी बा, जवना पर कवनो अभी ले बांध नइखे बनल.

सरयू में सतुआन के दिने नहान के वजह का बा, एकर ठीक-ठीक पता नइखे. बाकिर ई बा कि अक्सर मीन संक्रांति यानी सतुआन रामनमी के आसपास पड़ेला. रामनमी माने रामचंद्र जी के अवतार लिहला के दिन. ई पूरा संसार जान ता कि रामजी जवना अयोध्याजी में अवतार लेले रहले, ऊ सरयू नदी के किनारहीं बा. शायेद इहे वजह बा कि लोग रामजी के अवतार वाला चइत महीना में अक्सर पड़े वाला सतुआन के नहान सरयू जी में करेला.

सतुआन के दिने भोजपुरिया समाज नहा-धोइ के पहिले बांम्हन-बिशुन खातिर आपाना सामर्थ्य भर दान करेला. अनाज-रूपिया पइसा के संगे सतुआ आ नवका टिकोढ़ा छुएला. फिर हाथ-मुंह धोई के सतुआ खाला.



सतुआ खाए के दूगो तरीका बा. नून संगे सानि के ओकर पींड़ी बना के खाईं, भा ओकरा के लिबरी बना के पीहीं. चाहीं त ओकरा में नून के जगह मीठा, गुर, चीनी, राब आदि मिला के चाहीं त सानि के पींड़ी बनाके खाईं भा लिबरी बना के पी लीहीं.

ओइसे सतुआन के दिने पहिले राति खा भोजपुरिया घरन में दुहत्थी आ गुरूम्हा बनत रहल हा. नवका पीढ़ी के ढेरे लोगन के ना त दुहत्थी रोटिए के पाता होई, ना ऊ लोग गुरूम्हे जानत होइहें.

दुहत्थी माने दू गो लोइया के मिला के एके में साटी के ओकर मोट-मोट दू परत वाली रोटी बनत रहल हा. तावा पर ओकरा के घीव भा खाए वाला तेल में सेंकल जात रहल हा. ई कुछु-कुछु परवठां नियर होत रहल हा. गुरूम्हा में आटा के लोरी घोरात रहल हा. ओकरा में मीठा मिलावल जात रहल हा. लोरी माने तनिका पातर घोरना. लोरी ओइसहीं बनत रहल हा, जइसे पुआ के लोरी होला. अंतर ई रही कि गुरूम्हा के लोरी पुआ के लोरी से तनी पनिगर होत रहल हा. एकरा बाद कराही भा बटलोही के आंच पर चढ़ा दियात रहल हा. कराही-बटलोही में घीव में जीरा के छौंका दियात रहल हा, फेरू ओह में घोरना कहीं भा पातर लोरी, डालि दियात रहल हा. ओह में नवका टिकोढ़ा के छिली के ओकर बिया निकालि के ओकर फांकी काटि के डालात रहल हा. एह लोरी कुछु-कुछु कढ़ी नियर पकावल जात रहल हा. तीन-चार उबाल के बाद ओकरा के उतारि लियात रहल हा. ओकरे संगे दुहत्थी रोटी के खाइल जात रहल हा.

ओइसे त पूरा भारते तीज-तेवहार के देश ह. हर मौसम के मिजाज के मोताबिक हर इलाका के आपन-आपन तेवहार बा आ ओकरा हिसाब से आपन-आपन भोजन. त पहिले सतुआन के दिने दुहत्थी आ गुरूम्हे के घरे-घरे भोग लागत रहल हा.

एगो अउरी बात, दिल्ली-मुंबई हर जगह अब सालोंभर हर फल आ तरकारी मिलता. बाकिर भोजपुरी समाज के लोग पहिला दिने कच्ची अमिया यानी टिकोढ़ा के नेवान सतुआनिए के दिने करत रहल हा. पहिला दिने आम के टिकोढ़ा के चटनी सतुआनि के दिने सिलवटि पर पिसात रहल हा. आ एही दिने गुरूम्हा में ओकर फांकि डालि के पकावल जात रहल हा. भारतीय संस्कृति में नया अन्न-फल खाए के पहिले बाम्हन-बिशुन, मंदिर-साधु, संन्यासी के दान देबे के परंपरा रहल बा. मानल जात रहल हा कि जवन चीजु मिलता, ओकरा में समाज के ओहू वर्ग के हक बा, जे एकरा उपजावत नइखे, भा जेकरा पाले एह के ले आवे के क्षमता नइखे. जइसे-जइसे नवकी शिक्षा व्यवस्था से लोग शिक्षित होत गइल, प्रकृति आ समाज से समरूप राखे वाला एह परंपरा पर चोट पहुंचत चलि गइल. लोग एकरा के पिछड़ापन आ दकियानूस माने लगले.

जमाना बदलला से भोजपुरिया समाज के ई ठेठ देहाती भोजन कथित प्रगतिशीलता के भेंट चढ़ि गइल. बाकिर दुनिया के एगो रीति ह. हर अघाइल समाज में एगो दौर अइसन जरूर आवेला, जब ऊ आपना जरि-सोरि के ओरि जाए लागेला. भोजपुरियो समाज अब पहिले नइखे रहल. इहवां के लोग सात समंदर पार तकले आपन झांडा गड़ले बाड़े. आपाना देस के बहरी ओह लोगन के अब आपना एथनिक भोजन, परंपरा आ संस्कृति खूबे यादि आवतिया. एह वजह से अब उहो लोग आपन पुरान आ ठेठ भोजन के खोजल शुरू कइ देले बा. दुहत्थी अब दिल्ली-मुंबई के कुछु परिवारन में लउके लागलि बिया. हं, गुरूम्हा से अबहीं ले मुठभेड़ ना भइल. लेकिन उमेदि बा कि ओकरो से होइए जाई.

सतुआनि अइसन संक्रमण काल ह, जहंवा से गरमी के तीखापन बढ़त जाला. गरमी में सतुआ सबसे बेहतर फास्ट फूड तो होखबे करेला, संगे-संगे ऊ गरमी में शीतलता देबे वाला भोजन ह. शायद इहे वजहि बा कि सतुआनि के दिने सतुआ खइला के सुरूआत होत रहल हा. (लेखक उमेश चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार हैं.)


अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज