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Bhojpuri Special: जिनिगी गांव के ... रोज जीए-मूवे वाला सुभाव के

गांव में सुकून त बा, लेकिन जिनिगी भी काफी मुश्किल होला.
गांव में सुकून त बा, लेकिन जिनिगी भी काफी मुश्किल होला.

गांव के जिनिगी कइसन होखेला, कइसे रोजाना दू जून के रोटी के इंतजाम में लोग लागल रहेला... एह आलेख में पढ़ीं ग्रामीण परिवेश के रोज के संघर्षगाथा.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 19, 2021, 12:02 PM IST
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बाबू! रउआं परदेसी हईं नू? जरूर देश भा सूबा के राजधानी में राउर दउलतखाना होई. बइठीं हमरा एह टुटही खटिया पर भा ओह मचान पर. कहीं, हम अपने के का सेवा करीं?--हम भला राउर का खातिरदारी कऽ सकेलीं साहेब! पहिले हाथ-मुंह धोईं आ लीहीं हई गुर के भेली,साथ में एक लोटा इनार के शीतल जल. जे हमरा दुआर-दरवाजा प आवेला, बस हम इहे सभका खातिर लेके हाथ जोड़िके हाजिर रहेलीं.
हं,अब रउआं इतमीनान से बतिआईं.

रउरा देह पर हई उज्जर धप्-धप् खादी के लिबास. कान्ह प लटकत सर्वोदयी झोरा.
हिप्पीकट कपार के बार. आंखि प ऐनक आ हाथ में कैमरा--! कहीं रउआं लेखक-वेखक भा पत्रकार-ओत्रकार त ना हईं?--
हऽ नू इहे बात! इहां रोज कवनो-ना-कवनो लेखक भा पत्रकार आवत रहेलन. रउओं त ओही लोग नियर होखबि. खूब खोदि-खोदिके पूछी लोग कि हम कवना हालात से गुजरत बानीं, कि हमार अलचारी का बा,
कि हमरा लोग-लरिकन के पढ़ाई-लिखाई कइसन चलत बा, कि किसान आन्दोलन का बिसे में हमार का राय बा, कि किसानी से आमदनी दोगिना करे के जोजना के का भइल, कि हमनीं के परिवार कलेयान के नीति के अमल में काहें नइखीं जा ले आवत--वगैरह-वगैरह.


फेरु रउओं गांव के दह-पोखरा का ओरि चुंबक-अस खिंचात चलि जाइबि. हमरा बेटी-पतोहि के खिलखिलाहट आ हंसी-ठट्ठा के, उन्हनीं के गंवई गीतन के वीडियो बनाइबि, उन्हनीं के रूप के मादकता के, उन्हनीं के कुदरती खूबसूरती के अपना कैमरा में कैद करबि, खेतन में लहलहात हरियरी के फोटो खींचबि--अमराई में कुहुकत कोइलरि के बोली पर मंत्रमुग्ध होखबि. कबो उफनत बाढ़ के मनभावन छटा देखिके विहंसबि, त कबो अकाल-सुखार के चित्र उकेरबि. हमरा भुखाइल-पियासल, करिया-भुचेंग लांगट बेटा-नातिन के ठाढ़ कऽके फोटो खींचिके छापबि-देखऽ, तसवीर बोलऽतिया!
रजधानी में जाके रउआं एगो सनसनीखेज लेख तेयार करबि,जवन रउरा चमकत-दमकत फोटो का साथे कवनो बड़हन निठाह पत्र-पत्रिका में छपी. फेरु रउरा लेख प ढेर खानी चिट्ठी-चपाठी के अंबार लागि जाई आ नांव-जश का संगहीं दमगर मेहनताना गंठियाके रउआं 'आम के आम आ अंठिली के दाम' वाली कहाउत के चरितारथ करबि!
बिसवास करीं,साहेब! अब ले अनगिनत नामी-गिरामी विदवान लोग इहां आइल, हमनीं के खोज-खबर लिहल. हमनीं के लांगट-उघार जिनिगी के परत-दर-परत उतारिके धऽ दिहल लोग,बाकिर हमनीं के लांगट के लांगटे रहि गइलीं जा. अलबत्ता हमनीं के लंगटे ठाढ़ कऽके किछु लोग हमनीं के देह ढांपे खातिर, हमनीं के कांट नियर जिनिगी के खुशहाली से गमकावे खातिर सरकार से बहुत किछु मंजूर करावल आ हमनीं के नांव पर आपन पाकिट गरमावल. एने हमनीं के भरि गगरी लोर बहावत रहि गइलीं जा.
--हम मानत बानीं कि रउआं ओह लोगन में से ना हईं.अपने के आजु ले कबहीं केहू के शोषन ना कइनीं, ई त अउर नीमन बात बा.
नेता लोग के दिन अब लदि गइल, बाबू! वादा आ आश्वासन से पेट त ना भरल, गैस जरूर भरि गइल,जवना से ऊखी-बीखी लेले बा. कतना पचाईं जा ई कुल्हि! का रउरा लेखा पढ़ुवा लोग हमनीं गंवई खातिर,
हमरा गांव खातिर किछु ना करि सके? बाबू, सभका के त हमनीं के देखि लिहलीं जा. अब रउएं लोग हमनीं खातिर किछु करि सकींले, अइसन हमनीं के अटल बिसवास बा. हम रउरा नियर साहित्यकार से का उमेदि करीं, बाबू?
--एं? का कहत बानीं! रउआं हमनीं खातिर
मउवत से जुझहूं बदे तेयार बानीं? तब त रउआं हमनीं के मसीहा भइनीं. असल में हमनीं के आजुओ मनई ना मानल जाला. गोरू हईं जा--गोरू--निरा माल-मवेशी.
हर-बैल का संगें रोज सबेर से गुधबेर ले हमनिएं के नू जोतानीं जा.दुपहरिया में खेसारी के सतुआ हमनीं के रबड़ी-अस चाटेनीं जा--ओही खेसारी के सतुआ, जवना के खइला से 'लंगड़ी' हो जाले. जहवां ई खेसारी बिकाला नू साहेब, उहंवो लिखिके टांगल रहेला--'पशुखाद्य'. रात खानी माल-गोरू के खिआवल-पियावल, उन्हनिएं से बोलल-बतिआवल आ हुक्का गुड़गुड़ावत सूति गइल-इहे हमनीं के दिनचर्या ह.
--हमरा जिनिगी का बिसे में पूछत बानीं नू!
देखीं हमार जिनिगी! उमिर अबहीं चालीस के लछुमन-रेखा पार नइखे कइले. खइनी के लुफुत दांतन के हाल बनाके धऽ देले बा!
बस, हई आगा के चारि गो दांत बांचल बा.
देह के ठठरी, निकलल कूबर. छाती के हाड़ त रउआं गिनिओ सकेनीं. इहंवां जवानी-बुढ़ौती एके संगें आ जाले,बाबू!
खांसी त जिनिगी के संघतिया बनि गइल बिया. कबहीं-कभार खूनो आवेला. किछु लोग कहेला कि टीबी ह. खैर, जवन होखो.
दवाई-बीरो थोड़हीं करवावे के बा! सुबहित खाए के त ठेकाने नइखे, दवा-बीरो का करवाईं-खाक-पथल!
रउआं परिवारकलेयान के बात दोहरावत बानीं नू? हई देखीं, सोझा के तिनमहला वाला बाबू साहेब डागडर हउवन. बेमरिता से नोट अंइठे में कवनो कोर-कसर उठाइ ना धरसु. अपने आठ गो बेटा-बेटी जनमवले बाड़न. एगो तिवारिओ जी ,जवन पराइवेट परेटिस करेलन, दरजनो संतान पएदा कइले बाड़न. बड़ लोगन का त रोपेया-पइसा के कवनो फिकिर बा ना, फेरु जतना जनमावसु, कमे बा. हमनीं के त जून प भोजनो मोहाल हो जाई, साहेब! अगर बेटी भइल, त बियाह कइसे होई? बस, दूगो बेटे बाड़न स-कलुआ आ मलुआ. दूनो मदरसा जाए का जगहा मजूरी करे जालन स. तब कहीं जाके रोटी-नून के जोगाड़ हो पावेला.

--बाढ़ में परु साल खूब तबाही भइल,बाबू!
सुने में आइल जे बड़-बड़ मंतरी लोग हेलिकॉप्टर से नजारा देखे आइल रहे. चिरई के जान जाइ, लइका के खेलवना!
ओइसे इहां हर साल कबो बाढ़,त कबो सुखार! एक ओरि कुंइया, दोसरा ओरि खाई. पटवन के बात मत पूछीं, साहेब!
बहुत पहिले जंगल के आगी-अस ई खबर पाटि गइल कि गांव में सरकार टिउबेल लगवावे जा रहल बिया. खम्भो गड़इले स,
बाकिर ओकरा बाद वाली कार्रवाई आजु ले ना भइल. किछु धनी-मानी लोग आपन-आपन पंपिंग सेट बइठवले बा, बाकिर ओह लोग के पानी देबे के रेट अइसन बा जे जतना के बबुआ ना, ओतना के झुनझुना परि जाला.
---परेमभाव के बात रउआंपूछत त बानीं, बाकिर हमरा बतावे में शरम बुझात बा.
चोरी-चकारी, देखजरुई के बात मति पूछीं त बेहतर बा. इहां के लोग एक-दोसरा के जान के गांहक बनल बइठल बा. बाप-बेटा में कटुता,मरद-मेहरारू में कड़ुआहट,महतारी-बेटी में तनातनी. बाबू,एगो कहनी मन परत बिया. पता ना, कब के सुनवले रहे. दूगो बैल रहलन स. दूनों में अतना निठाह मिताई रहे कि पूछीं मत. दूनों खेत से हांकल-पियासल लवटत रहलन स. राह में बड़ा जोर से दूनों के पियास लागल. बुझाइल जइसे परान अब निकलल,तब निकलल. तलहीं एगो गड़ही में थोरकी भर पानी लउकत. बाकिर पानी अतने रहे कि खाली एगो के पियास बुता सकत रहे. ऊ एक-दोसरा से निहोरा-पाती करे लगलन स-'पहिले तूं पी लऽ!' 'ना-ना,
पहिले तूं पी लऽ!'-आ एह तरी एक-दोसरा से गिड़गिड़ात दूनों दम तूरि दिहलन स. बाकिर आजु त स्थिति एकदम उलटा बा.
दूनों बैल आजुओ मूवत बाड़न स, बाकिर वजह ई बा कि ऊ एक-दोसरा से एह बात प भिड़ि जात बाड़न स जे 'पहिले हम पियबि', त 'पहिले हम पियबि!' आ इहे 'हम' हमनीं के कबाड़ा करत बा.
बाबू, का अइसन ना हो सकत रहे कि दूनों बैल मिलि-जुलिके थोरकी-थोरकी पानी पीके एक-दोसरा के मउवत का मुंह में जाए से बचा लिहतन आ हंसी-खुशी से सुख-दु:ख के संघतिया बनितन. काश,अइसन हो पाइत!
ओही बैलन नियर हमनीं के आपुस में जुझार कऽ रहल बानीं जा, बस एह बात पर कि खाली हमहीं खाइबि-पियबि,सुख से जीयबि, बाकिर दोसरा के जीयल मोहाल कऽ देबि. बाबू, का हम बड़-छोट एक-दोसरा के सुख-दुःख बांटिके ना जी सकेलीं जा? जदी हं, त ऊ दिन कब आई,साहेब--
ऊ दिन कब आई? (लेखक भगवती प्रसाद द्विवेदी जी प्रसिद्ध स्तंभकार हईं)
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