Bhojpuri: भोज-भात से लेके दूसर कए गो काम में, बाड़ा महत्व बा लोटा के

एगो समय अइसन रहे, जब लोटा कटहर के लासा-अस गंवई जिनिगी से सटल रहे. फजीरे सूतिके उठते लोग एक लोटा भरि हीक पानी पीयत रहे. फेरु लोटा में पानी लेके मर-मैदान होखे गांव का बहरी निकलि जात रहे. ओने से लोटा में माटी के एगो ढेला डालिके लवटे आ इनार प भा कवनो चांपाकल पर जाके हाथ मटिआवे. फेरु भर लोटा पानी धऽके दतुअन से मुंह धोवे.

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लरिकाईं के एगो वाकया सुरता प चढ़ते आजुओ मन खटतुरुस हो जाला. गांव के एगो कंजूस काका राम जनम पांड़े जब अपना बेटी के बियाह कइलन, त संगें-संगें ओही माड़े-भाते दिन में अपना बेटा के जनेवो कऽ लिहलन. बाकिर ओह दिन गांव वालन के भोज ना दिहलन. बेटी के बियाह में त ओह घरी केहू भोज खातो ना रहे, बाकिर बेटा के जनेव में ना खिअवला के लोग अमनख माने लागल. चारू ओरि सेए थुक्का-फजीहत का बाद जाके काका गांव भर के भोज देबे खातिर दिन रोपलन. गांव के छोट-बड़ सभ केहू के अइगा (अंगेया) भेजववलन. बीजे भइल, त उन्हुका दुआर पर गांव भर के जुटान हो गइल.

पहिला पांति बइठल, त पत्तल में पुड़ी आ कोंहड़ा के तरकारी चले लागल. लोग इंतजार करे लागल कि अउर कवनो-ना-कवनो सब्जी जरूर होई. बाकिर काका आके जब खाएके निहोरा करे लगलन, त खाएवाला लोग झुंझुवा गइल. खैर, पांति के लोग खाइल शुरू कइल. जब केहू भरुका आ पानी चलावे के कहल, त राम जनम काका निठुरी मुंहें जवाब दिहलन, 'भवद्दी में भोज खाएवाला अपना घर से लोटा लेके आवेला. ई परिपाटी हमरा पुरखा-पुरनियन से चलि आवत बा, फेरु हम ओकरा के कइसे तुरितीं! एह से हम कोंहार से भरुका मंगवलहीं नइखीं. रउआं सभ जब भवद्दी में भोज खाए आइल बानीं, त लोटा लेके नू आवे के चाहीं. हाथ दुमावत अइसहीं आ गइनीं अइगा खाए! नियम नियम ह,हम ई परंपरा कबो ना तूरब.'

खैर, पहिला पांति में बइठल लोग कइसहूं पुड़ी खाइल आ घरे जाके हीक भर पानी पीयल. बाकी लोग लोटा ले आवे खातिर घर का ओरि भागल. महीनन ई वाकया चरचा में रहल आ आगा के परोजन में सभे केहू लोटा लेके भोज खाए जाए लागल.

एगो समय अइसन रहे, जब लोटा कटहर के लासा-अस गंवई जिनिगी से सटल रहे. फजीरे सूतिके उठते लोग एक लोटा भरि हीक पानी पीयत रहे. फेरु लोटा में पानी लेके मर-मैदान होखे गांव का बहरी निकलि जात रहे. ओने से लोटा में माटी के एगो ढेला डालिके लवटे आ इनार प भा कवनो चांपाकल पर जाके हाथ मटिआवे. फेरु भर लोटा पानी धऽके दतुअन से मुंह धोवे.
नहाहूं में लोटे के इस्तेमाल होखे. जलखावा आ भोजनो का बेरि लोटा में पानी भरिके धरा जात रहे. खेत-बधार में हरवाहीं का बेरि, रोपनी, सोहनी, कटनी का बेरि बाल्टी का संगें लोटा निहायत जरूरी होत रहे.हरेक परोजन में खाए-खिआवे के बेरि लोटे में भरि-भरि के पानी चलावल जात रहे. केहू जब अनेति करे, त लोटा हथियार बनिके उठि जात रहे आ अगिला के कपार फोरत देरी ना लागत रहे. उहां लोटा सोटा के भूमिका निबाहत रहे.

शादियो-बियाह में लोटा के महातम कमतर ना रहे.दुलहा जदी परदेसी भा सेना में तैनात होखे, त छुट्टी ना मिलला के स्थिति में लोटे दुलहा के रूप में हाजिर हो जात रहे आ बरइछा भा तिलक लोटे प होखे.दुलहा सीधे बरिआतिए का दिने बियाह करे आवत रहे.

लोटा के महातम के देखत तिलक में लोटा जरूर चढ़ावल जात रहे.बियाह का बाद माड़ो में खाए बइठल दुलहा के थरिया का संगें लोटा परोसात रहे.दुलहिन के विदाई का बेरि सबेरे ओही लोटा में पानी भरिके असवारी में धऽ दिहल जात रहे, जवना से कि पियासि लगला प कनिया पानी पी सकसु.



एक हाली जब अंसवारी से राह में पानी टपके लागल, त कहांर कुनमुनाए लगलन स कि कइसन कनिया बाड़ी,डोलिए में ई हरकत!इशारा कइले रहिती, त अंसवारी उतारिके कवनो फेंड़-खूंट का अलोता जाके--बाकिर बाद में पता चलल कि लोटा के लुढ़ुकला से पानी चूवे लागल रहे.

खाली तिलके-बियाह में ना,एह असार संसार से नाता तूरि लिहला का बाद लोटे से घंट में पानी दियात रहे, जवना से कि मृतक के कंठ मत सूखो.दाह लेबेवाला चौबीसों घंटा लोटा के पानी अपना लगे राखत रहे.

तब किसिम-किसिम के लोटा आवत रहलन स. फुलहा लोटा, पितरिहा लोटा,तांबा के लोटा, जस्ता के लोटा, अल्मूनिया के लोटा.

गोल मटोल लोटा.चौकोर लोटा.पेनीवाला लोटा.बेपेनी के लोटा. बेपेनी के लोटा के कवनो ठेकान ना रहत रहे कि कब केने लुढ़ुकि जाई. एह से अइसन चाल-चरीत्तर वाला लोग बेपेनी के लोटा कहाए लागल.

तांबा के लोटा में जल भरिके पहिले देवतन के चढ़ावल जात रहे.फेरु ई बतावल गइल कि रात में तांबा के लोटा में पानी राखिके जदी फजीरे पीयल जाउ,त ऊ सेहत खातिर फायदेमंद होला.फेरु त देवता प जल ढारे का जगहा खुदे ओकर सेवन होखे लागल रहे.कहाए लागल, पहिले भीतर, तब देवता-पितर!

लोटा के छोटहन आकार लोटकी कहात रहे आ ओही लोटकी से देवी-देवता के जल चढ़ावल जात रहे.ऊ लोटकी तांबा भा पीतर के होत रहे. मुअला का बाद सराध करत दान में ऊहे लोटकी दियाए लागल-

उधिआइल सातू पितरन के!

बियाह में जेवनार का बेरि जब गारी गवात रहे,त लोटा के उपमा सभे के हंसत-हंसत लोटपोट कऽ देत रहे-

बकरी के पोंछि अइसन मोंछि ए फलाना भड़ुआ,

लोटा अइसन तोहार हेठा,

लंगोटा कसऽ!

प्लास्टिक जुग में त प्लास्टिको के लोटा बने लागल रहे, जवन बरियतिहा लोगन खातिर इस्तेमाल होखे-दिशा मैदान होखे खातिर, बाकिर अधिकतर के हाल अइसन रहत रहे कि मैदान होखे आ पानी छूवे का पहिलहीं चू-चाके लोटा के पानी साफ! फेरु त आपन हारल आ मेहरी के मारल केकरा से कहल जाउ!

जइसे गांव में अब ना पनघट रहल, ना डांड़ पर गगरिया लेके लचकत नारी.ओइसहीं जग-मग आ गिलास के एह नफासत वाला दौर में लोटा के लुटिया डूबि गइल, ठीक ओइसहीं, जइसे गांव से नेह-छोह के गगरिया नदारद हो गइल-

लोटा डूबल, लोटकी डूबल

डूबल प्रीत गगरिया रे! (डिस्क्लेमर- लेखक भगवती प्रसाद द्विवेदी वरिष्ठ साहित्यकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)
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