Bhojpuri Special: बनारस में बीतल रहल उमराव जान क अंतिम समय, जानीं उनका बारे में

उमराव जान के जिनगी के बारे में कवनों ऐतिहासिक तथ्य मौजूद नाहीं हौ, खाली मिर्जा हादी रुस्वा क लिखल उपन्यास के छोड़ि के. इ उपन्यास ’उमराव जान अदा’ नाम से पहिली बार 1899 में छपल रहल. उमराव जान बेहतरीन शायर भी रहलिन अउर उ ’अदा’ उपनाम से शायरी करय.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 24, 2021, 2:22 PM IST
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लखनऊ क मशहूर तवायफ उमराव जान क नाम त हर कोई जानत होई, लेकिन ओनके जिनगी क शाम बनारस के तंग गली में बीतल रहल, एकरे बारे में कमय लोगन के पता होई. उमराव जान के जिनगी क जवन कहानी सबके सामने हौ, ओहमें एक औरत क बेबसी अउर संघर्ष साफ तौर पर देखाई देला. लेकिन इ संघर्ष ओन्हय अंत में शांति के तलाश में लेइके काशी आइ गयल, अउर उ इहां एक गली में गुमनामी क जिनगी जियलिन अउर एही ठिअन अंतिम सांस लेेहलिन. उमराव जान के जिनगी की नाईं ओनकर कबर भी इहां फातमान कब्रिस्तान में लंबे समय तक गुमनाम रहल. लेकिन 2004 में जब एकर पता चलल तब इहां उमराव जान के सूरत की नाईं शानदार मकबरा बनि के तइयार होइ गयल हौ. बेेजोड़ फनकारा से मोहब्बत करय वाले इहां अब सलाम करय आवय लगल हयन.

उमराव जान के जिनगी के बारे में कवनों ऐतिहासिक तथ्य मौजूद नाहीं हौ, खाली मिर्जा हादी रुस्वा क लिखल उपन्यास के छोड़ि के. इ उपन्यास ’उमराव जान अदा’ नाम से पहिली बार 1899 में छपल रहल. उमराव जान बेहतरीन शायर भी रहलिन अउर उ ’अदा’ उपनाम से शायरी करय. उमराव जान के जिनगी पर जेतना भी फिल्म अउर नाटक बनल हयन, एही उपन्यास पर आधारित हयन. लेकिन एह उपन्यास में भी उमराव जान के जीवन के अंत क कवनो कहानी नाहीं हौ, काहे से कि उपन्यास ओनकर अंत होवय से पहिले ही प्रकाशित होइ गयल रहल. जवने लखनऊ में कवनो जमाने में उमराव जान के हुस्न अउर अवाज क जादू तैरत रहल, उहां भी ओनकर कवनो निशानी उपलब्ध नाहीं हौ. उमराव जान एक बार लखनऊ में आयोजित एक मुशायरा में एक शेर सुनउलिन -

किसको सुनायें हाले-दिले जार ऐ अदा,
आवारगी में हमने जमाने की सैर की.
इ शेर मिर्जा हादी रुस्वा के दिल में एतना धंसि गयल कि ओनके भीतर उमराव जान के बारे में जानय क दर्द पैदा होइ गयल. उमराव जान के लाख मना कइले के बाद भी मिर्जा हादी मनलन नाहीं अउर अंत में उमराव जान अपने जिनगी क बचपन से लेइके पूरी कहानी मिर्जा हादी के बताइ देहलिन. मिर्जा हादी रुस्वा एही कहानी के कागज पर उतारि देहलन. इहय किताब आज उमराव जान के जीवन इतिहास क आईना हौ. उमराव जान के जीवन पर कई फिल्म अउर नाटक बनल, लेकिन 1981 में मुजफ्फर अली क फिल्म उमराव जान के जवन कामयाबी हासिल भइल, उ दूसरे के नाहीं. अभिनेत्री रेखा उमराव जान क किरदार अइसन जीवंत कइलिन लोग ओनही के असली उमराव जान मानि बइठलन. अभिनेत्री रेखा क जिनगी भी उमराव जान से काफी कुछ मेल खाला, शायद इहय कारण हौ कि उ पर्दा पर उमराव जान क किरदार एतने संजीदगी से उतारि पउलिन. रेखा के बारे में फिर कभौ, अबहीं उमराव जान पर.



उमराव जान के कोठा पर पहुंचय क कहानी जादातर लोगन के पता हौ, एह के नाते ओकर जिक्र इहां नाहीं करत हई. लेकिन एक औरत के रूप में उमराव जान क का तमन्ना रहल, ओकर जिक्र जरूरी हौ. एक भरपूर औरत क जिनगी जीअय क सपना आजीवन ओनके दिल में जिंदा रहल. लेकिन जेकरे भी ऊपर उ भरोसा कइलिन, हर जगह धोखा मिलल, अउर अंत में निराशा. फैजाबाद के एक इज्जतदार परिवार में जनम लेवय वाली अमीरन एह मामले में किस्मत क बहुत दरिद्र साबित भइलिन. बचपन में ही किस्मत ओन्हय परिवार के बीच से उठाइके लखनऊ में खानम जान के कोठा पर पहुंचाइ देहलस. फिर लाख कोशिश के बाद भी उ उहां से निकलि नाहीं पइलिन. उमराव जान अंत में फैज अली नाम के एक आदमी के साथ घर बसावय क अंतिम कोशिश कइलिन. कोठा से भागि के फर्रुखाबाद के तरफ गइलिन. लेकिन रस्ते में ही पुलिस क छापा पड़ल. फैज त कवनों तरीके से उहां से भागि गयल, उमराव जान फंसि गइलिन. तब उमराव जान के पता चलल कि फैज एक डाकू हौ. ब्रिटिश दस्तावेज में भी फैज नाम के डाकू क जिक्र मिलयला. उमराव के हाथ एक बार फिर निराशा लगल. इहां से रिहा भइले के बाद उमराव जान एक शेर लिखलिन-

कैदी उल्फते सैयाद रिहा होते हैं,
आज हम बा दिले नाशाद रिहा होते हैं,
ऐ अदा कैदे मुहब्बत से रिहाई मालूम,
कब असीरे गमे सैयाद रिहा होते हैं.

उमराव जान एह घटना के बाद पूरी तरह टूटि गइलिन. मुजरा अउर नाच-गाना से अलग होइ गइलिन अउर हज क रुख कइलिन. हज से लौटले के बाद कुछ दिन लखनऊ में बितउलिन अउर एक दिन अचानक बनारस पहुंचि गइलिन. बनारस में चैक इलाके के पत्थर गली में ओन्हय ठेकाना मिलल. एही ठिअन एक मकान में गुमनामी क जिंदगी बितावय लगलिन.

स्थानीय जानकार बतावयलन कि उमराव जान बनारस में न मुजरा करय, न महफिल सजावय. बस पांच वक्त क नमाज अदा करय अउर कुरान पढ़य. खुदा के खिदमत में दिन बितावय. अंतिम सांस तक उ बनारस में ही रहलिन. बतावल जाला कि 26 दिसंबर, 1937 के ओनकर बनारस में ही अंतिम सांस लेहलिन. लेकिन बनारस में ओनके कब्र क पता 2004 में चलल. फातमान कब्रिस्तान में शहनाई सम्राट भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्ला खां क कब्र हौ. ओनकर मकबरा बनावय बदे जब घास क सफाई होत रहल तब शिल्पकार अरुण सिंह के एक जमीन के बराबर में कब्र मिलल. कब्र क पता खाली उहां लगल एक पत्थर से चलल. पत्थर पर अरबी में उमराव जान क एक शेर लिखल रहल-

कितने आराम से हैं कब्र में सोने वाले,
कभी दुनिया में था फिरदौस में अब हैं मसकन.
कब्र किस अहले वफा की है अल्ला अल्ला,
सबको गम जिसका है वह दोस्त हो या दुश्मन.
-उमराव बेगम, लखनवी

शेर के अलावा लिखल रहल -वफात उमराव बेगम लखनवी यौमे-जुमा 27 जिकदा 1359 हिजरी. उमराव जान के कब्र क पता चलले के बाद कद्रदानन के इहां आवय क सिलसिला शुरू होइ गयल. बाद में अरुण सिंह ही अपने खर्चा से उमराव जान क शानदार मकबरा बनउलन. इ अपने आप में एक संयोग ही हौ कि दुइ महान फनकारन क मकबरा एक-दूसरे के अगल-बगल में ही मौजूद हौ अउर दूनों क डिजाइन अउर निर्माण एक ही शिल्पकार के हाथे कयल गयल हौ. कुछ इतिहासकारन क कहना हौ कि उमराव जान क कब्र लखनऊ में अजीमुल्ला खां के करबला में हौ. लेकिन एकर कवनो प्रमाण उपलब्ध नाहीं हौ. (लेखक सरोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
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