Bhojpuri: शौर्य, त्याग, पराक्रम के प्रतीक हवन महाराणा प्रताप, जानीं काहें उनका के याद करेके चाहीं

महाराणा प्रताप अपना धर्म के पालन कइले। राज्य के रक्षा आ राज्यवासी के सेवा उनुकर धर्म रहे। उनकर असली नांव रहे प्रताप सिंह बाकिर उनुका वीरता, शौर्य, त्याग, पराक्रम आ दृढ़ प्रतिज्ञा के कारण उनुकर नांव परल महाराणा प्रताप।

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महाराणा प्रताप के असली नांव रहे प्रताप सिंह बाकिर उनुका वीरता, शौर्य, त्याग, पराक्रम आ दृढ़ प्रतिज्ञा के कारण उनुकर नांव परल महाराणा प्रताप. एही संदर्भ में एगो ग्रामीण कहानी सुनीं- एगो अध्यापिका महतारी से उनुकर 15 साल के बेटा पुछलस कि महाराणा प्रताप अपना राज्य के रक्षा खातिर जीवन भर संघर्ष कइले. त आखिर उनुका के का मिलल? ऊ कुछ बिंदु पर समझौता क लेले रहिते त सुख से जीवन बितइते. त महतारी कहली कि तब आजु महाराणा प्रताप के केहू नावो ना लीत. लइका पुछलस कि काहें?

त महतारी कहली कि भोग- विलास में डूबल आदमी के कौनो इतिहास ना होला. ओकरा के मनुष्य का रूप में ना, कीड़ा मकोड़ा के रूप में जानल जाला. जे पुरुषार्थ आ पराक्रम देखावेला ओकरे के याद कइल जाला आ ऊहे अमर होला. राजा मान सिंह के केहू याद करेला? ना नू. काहें से कि मान सिंह में पराक्रम तत्व गायब रहे. महतारी अपना बेटा से प्रश्न कइली कि- मनुष्य के कर्तव्य का ह? बेटा कहले कि आपन जीवन सही ढंग से जीयल मनुष्य के कर्तव्य ह. महतारी पुछली कि जीवन के सही ढंग माने? बेटा के कुछ बुझइबे ना कइल कि का कहसु. उनुका के चुप देखि के महतारी कहली कि भगवान श्री कृष्ण , गीता के सोलहवां अध्याय के 24 वां श्लोक में कहले बाड़े कि -
तस्माच्छास्त्रम् प्रमाणम् ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोंक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥

माने – का करेके चाहीं आ का ना करेके चाहीं, एकर निर्णय करे खातिर शास्त्रे प्रमाण बा. शास्त्र के विधान के जानिके तोहरा ओहीके अनुसार आचरण करेके चाहीं. शास्त्र का कहता? धर्म, अर्थ, काम आ मोक्ष के सम्यक रूप से पालन करेके कहता.

महाराणा प्रताप अपना धर्म के पालन कइले. राज्य के रक्षा आ राज्यवासी के सेवा उनुकर धर्म रहे. एही से उनुका के अर्थ मिलल. काम माने महाराणा प्रताप के कामना का रहे? कि कौनो भी परिस्थिति में मनुष्यता के हनन ना होखे, वैचारिक शुद्धता के हनन ना होखे. सबसे बड़ ई कि कठिन परिस्थिति देखि के पलायन के विचार मन में ना उठे. हार के विचार मन में ना उठे. मन कौनो भी परिस्थिति में डांवाडोल ना होखे. त बेटा के समुझ में आइल कि मनुष्य रूप में भगवान जब हमनी के पैदा कइले बाड़े त हमनियो के कुछ कर्तव्य होला. खाली इंद्रिय सुख के सुख ना कहल जाला.

महाराणा प्रताप अपना संघर्ष से ई सिखा के गइले कि एगो मनुष्य के कइसे अपना जिम्मेदारी के पूरा करेके प्रति दृढ़ रहे के चाहीं. शत्रु के ह? ई एगो व्यापक प्रश्न बा. ऋषि- मुनि लोग इंद्रिय के शत्रु कहले बा, गीता में भी इंद्रिय के शत्रु बतावल बा. जदि इंद्रिय कंट्रोल में नइखे त ऊ शत्रु बिया आ जदि कंट्रोल में बिया त राउर विजय बा. राणाप्रताप के क्षमता अपना भीतर आ बाहर दूनो के कंट्रोल करेके रहे. पूरा सेना उनुका नियंत्रण में रहे. इहे नियंत्रण जेकरा में आ जाई ऊ असली पुरुषार्थ के मालिक हो जाई. बाकिर बेटा फेर पुछलस कि मनुष्य खाली संघर्षे करे खातिर धरती पर आइल बा का? आखिर ओकरा सुख भोग करेके अधिकार नइखे? त महतारी पुछली कि सुख- भोग के परिभाषा का ह? बेटा कहले कि मनुष्य के हमेशा कड़ा ना रहेके चाहीं. लचकदार रहे के चाहीं, शांति खातिर कहीं- कहीं समझौता क लेबे के चाहीं. तबे सुख के परिस्थिति बनी. महतारी पुछली कि जदि हमरा पर केहू अत्याचार करे आई त तूं ओकरा से शांति करे खातिर समझौता क लेब? त बेटा कहले कि सवाले नइखे पैदा होखत. हम तोहरा रक्षा खातिर जान दे देब. त महतारी कहली कि ओहीतरे अपना मातृभूमि खातिर महाराणा प्रताप अंत तक संघर्ष कइले, अपना सिद्धांत पर अड़ल रहि गइले, भले कुछ हाली दुख उठवले बाकिर ऊहे उनकर सुख रहे. जब आदमी बड़ आ सार्थक उद्देश्य खातिर दुख उठावेला त ऊहे दुख सुख में रूपांतरित हो जाला.

महाराणा प्रताप कौनो जाति भा धर्म के विरोधी ना रहले बल्कि एगो आदर्श भारतीय वीर के प्रतीक रहले ह. अपना राज्य के सीमा के रक्षा आ कर्तव्यपरायणता पर दृढ़ता उनुका के महान बनवलस. उनकरा संगे भामा शाह के नांव भी अमर बा. अपना मित्र के सैद्धांतिक लड़ाई खातिर एगो बड़ राशि के दान के कारण भामा शाह हमेशा अमर रहिहें. जे जइसन रहेला ओकरा के ओइसने संग- साथ मिल जाला. जइसे उनुकर घोड़ा चेतक. बिजली के फुर्ती वाला चेतक, अपना मालिक के बचावे खातिर कुछू करेके तेयार रहे. ओकर दउरे के स्पीड के तुलना तेज हवा से कइल जात रहे. ओकरा में कतना गुण रहे एकर गणना आजु ले केहू ना क पावल. हल्दी घाटी (1576) के युद्ध में चेतक अपना अद्वितीय स्वामिभक्ति, बुद्धिमत्ता आ वीरता के परिचय दिहलस. युद्ध में बुरी तरह घायल भइला पर भी महाराणा प्रताप के सुरक्षित रणभूमि से निकालि के चेतक एगो बरसाती नाला के लांघि के अंत में वीरगति के प्राप्त भइल.

हिंदी कवि श्याम नारायण पाण्डेय रचित प्रसिद्ध महाकाव्य “हल्दी घाटी” में चेतक के पराक्रम आ ओकर स्वामिभक्ति के मार्मिक वर्णन बा. आज भी राजसमंद के हल्दी घाटी गांव में चेतक के समाधि बा. मेवाड़ में चेतक के स्वामीभक्ति पर आज भी लोकगीत गावल जाला. महाराणा प्रताप के भाला के वजन 81 किलो रहे. उनका कवच के वजन 72 किलो रहे. महाराणा प्रताप भाला, ढाल, दू गो तलवारें, कवच लेके युद्ध में जात रहले ह, जौना के कुल वजन 208 किलो रहे. त सोचीं 208 किलो के हथियार लेके महाराणा प्रताप एतना आक्रामक ढंग से लड़सु कि विरोधी सेना भय से कांपि जाउ. त एतना पराक्रम वाला व्यक्ति के काहें ना बार- बार याद कइल जाई. बाकिर महाराणा प्रताप के कौनो जाति- धर्म से ना जोड़ि के भारतीय पुरुष के प्रतीक के रूप में याद कइल जाउ आ उनुका से प्रेरणा लिहल जाउ त बहुत कुछ सीखे के मिली. काहें से कि महाराणा प्रताप भारत के शक्ति पुरुष रहले. उनुका के बार- बार प्रणाम बा. (विनय बिहारी सिंह वरिष्ठ स्ंतभकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

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